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₹1 करोड़ की नौकरी भी नहीं रोक पाई, 20 हजार से शुरू हुआ सफर… अब फार्म पर बिता रही हैं जिंदगी

 


कभी सालाना करीब 1 करोड़ रुपये की सैलरी, देश की बड़ी कंपनियों में लीडरशिप की जिम्मेदारी और कॉर्पोरेट जगत में दो दशक से ज्यादा का अनुभव—ऐसी जिंदगी छोड़कर अगर कोई व्यक्ति हजारों पेड़ों और सैकड़ों किस्म की फसलों के बीच रहने का फैसला करे, तो यह कहानी निश्चित रूप से लोगों का ध्यान खींचती है। मनीषा लाथ गुप्ता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

मनीषा गुप्ता Uber इंडिया की चीफ मार्केटिंग ऑफिसर यानी CMO रह चुकी हैं। साल 2020 में उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। उस समय उनकी सालाना कमाई करीब 1 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसके बाद उन्होंने शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूरी बनाकर पंचकूला के पास एक पर्माकल्चर फार्म पर रहने का फैसला किया।

लेकिन यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। मनीषा के मुताबिक, इस बदलाव की तैयारी करीब 12 साल पहले शुरू हो चुकी थी। उन्होंने और उनके पति ने कई वर्षों तक इस जीवनशैली को समझने, जमीन तैयार करने और आर्थिक रूप से खुद को सुरक्षित बनाने पर काम किया।

आज वह ‘आनंदा’ नाम के अपने फार्म पर रहती हैं, जहां हजारों पेड़ों और कई तरह की फसलों के बीच उनकी जिंदगी कॉर्पोरेट ऑफिस की डेडलाइन से काफी अलग हो चुकी है।

20 हजार रुपये की नौकरी से 1 करोड़ रुपये की सैलरी तक पहुंचीं

मनीषा गुप्ता ने अपने करियर की शुरुआत साल 1997 में यूनिलीवर से की थी। उस समय उनकी मासिक सैलरी करीब 20 हजार रुपये थी। यह उनके करियर का शुरुआती दौर था, लेकिन आने वाले वर्षों में उन्होंने कई बड़ी कंपनियों में काम किया और लगातार अपने करियर को आगे बढ़ाया।

यूनिलीवर के बाद उन्होंने कोलगेट-पामोलिव, एक्सिस बैंक, क्लिक्स कैपिटल और उबर जैसी कंपनियों में अलग-अलग नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाईं।

उनके मुताबिक करियर की शुरुआत से लेकर उस समय तक उनकी आय में करीब 50 गुना तक बढ़ोतरी हुई थी। जिस नौकरी से उन्होंने शुरुआत की थी, वहां मिलने वाली करीब 20 हजार रुपये मासिक आय से लेकर करियर के अंतिम दौर में करीब 1 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंचना उनके पेशेवर सफर की बड़ी उपलब्धि रही।

लेकिन इतनी बड़ी आय के बावजूद उन्होंने आखिरकार कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का फैसला किया।

नौकरी छोड़ते समय पैसे का त्याग महसूस नहीं हुआ

मनीषा के लिए नौकरी छोड़ने का फैसला सिर्फ आर्थिक नहीं था। उनका कहना है कि जब उन्होंने अपनी आखिरी नौकरी छोड़ी तो उन्हें ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वह पैसे का त्याग कर रही हैं।

उनके अनुसार, मानसिक रूप से वह पहले ही उस नौकरी से अलग हो चुकी थीं। उनके लिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कितनी सैलरी मिल रही है, बल्कि यह भी था कि वह अपनी जिंदगी का इस्तेमाल किस तरह करना चाहती हैं।

यही सोच धीरे-धीरे उन्हें शहर से दूर प्राकृतिक वातावरण में जीवन बिताने की ओर ले गई।

हालांकि, इस बदलाव से पहले उन्होंने और उनके पति ने कई वर्षों तक बचत और निवेश किया। इसका मकसद यह था कि कॉर्पोरेट आय खत्म होने के बाद परिवार को आर्थिक असुरक्षा का सामना न करना पड़े।

आर्थिक आजादी के लिए पहले की फाइनेंशियल प्लानिंग

मनीषा के अनुसार, नौकरी छोड़ने से पहले परिवार ने अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने पर काफी ध्यान दिया। उनकी संपत्ति का एक हिस्सा रियल एस्टेट में है, जबकि इक्विटी म्यूचुअल फंड, डेट म्यूचुअल फंड और सोने में भी निवेश किया गया।

बताया गया है कि उनके वेल्थ एलोकेशन में करीब 40 प्रतिशत हिस्सा रियल एस्टेट में, करीब 25 प्रतिशत डेट म्यूचुअल फंड में और लगभग 10 प्रतिशत सोने में है। बाकी हिस्सा अन्य निवेश माध्यमों में है।

उनकी सोच थी कि जब तक परिवार की आय खर्च से अधिक है, तब तक उस अतिरिक्त राशि को बचाकर भविष्य की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए इस्तेमाल किया जाए।

उनके अनुसार, असली सवाल यह था कि पैसा कैसे बचाया जाए, किस तरह एक फंड बनाया जाए और धीरे-धीरे आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में कैसे आगे बढ़ा जाए।

यही वित्तीय तैयारी बाद में उनके लिए कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का आधार बनी।

2010 में खरीदी खराब जमीन, फिर शुरू हुआ सपना

फार्म पर जीवन बिताने की योजना के लिए इस दंपती ने साल 2010 में हरियाणा में एक जमीन खरीदी थी। उस समय दोनों नौकरी कर रहे थे। जमीन ऐसी स्थिति में थी जिसे बेहतर बनाने के लिए लंबे समय तक काम करना पड़ा।

उनका जीवन भी एकदम से मुंबई से फार्म पर नहीं पहुंचा। पहले मुंबई से गुड़गांव और फिर पंचकूला की ओर उनका सफर हुआ। पंचकूला फार्म के सबसे नजदीकी बड़े शहरों में से एक था।

स्थायी रूप से फार्म पर रहने से पहले उन्होंने वहां करीब दो साल बिताए। इस दौरान उन्हें धीरे-धीरे समझ आया कि शहर की जिंदगी और फार्म की जिंदगी में कितना अंतर है।

मुंबई से फार्म और फार्म से वापस शहर की यात्राओं ने उनकी सोच को और बदला। उन्हें लगने लगा कि जिस समय और ऊर्जा को रोजाना आने-जाने में लगाया जा रहा है, उसका इस्तेमाल किसी दूसरी दिशा में किया जा सकता है।

खेती का मतलब सिर्फ फसल उगाना नहीं

मनीषा की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि उन्होंने फार्म लाइफ को सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रखा।

उनके अनुसार, केवल खेती से उतनी आय नहीं हो सकती जितनी कोई बाहर से कल्पना करता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ऑर्गेनिक पालक की बिक्री का जिक्र किया।

यदि पालक सीधे ग्राहक को बेची जाए तो एक बंडल के करीब 40 रुपये तक मिल सकते हैं। लेकिन जब अधिक उत्पादन थोक बाजार में भेजना पड़ता है, तो कीमत काफी कम हो सकती है।

यानी खेती में उत्पादन करना एक बात है और उस उत्पादन को लाभदायक कीमत पर बेचना दूसरी बात।

इसी अनुभव के आधार पर मनीषा का कहना है कि फार्म या ग्रामीण जीवन को अपनाने वाले लोगों को अपनी कमाई के कई स्रोत तैयार करने चाहिए।

फार्म से कमाई के 8 अलग-अलग स्रोत

मनीषा ने अपने फार्म के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें सिर्फ फसल बेचने पर निर्भरता नहीं है।

आज उनके फार्म से करीब आठ अलग-अलग माध्यमों से आय होने की बात कही गई है। इनमें ऑनलाइन बीज की दुकान, पर्माकल्चर टूर, सस्टेनेबल होम टूर, फार्म स्टे, कंसल्टेशन, ट्रेनिंग प्रोग्राम, YouTube विज्ञापन से होने वाली कमाई और अतिरिक्त कृषि उपज की बिक्री शामिल है।

इस मॉडल का उद्देश्य यह है कि यदि किसी एक स्रोत से आय कम हो जाए तो बाकी गतिविधियों से आर्थिक सहायता मिल सके।

यही कारण है कि मनीषा खेती को सिर्फ फसल उत्पादन नहीं बल्कि एक व्यापक सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल के रूप में देखती हैं।

शहर की जिंदगी से बिल्कुल अलग है फार्म लाइफ

शहर में रहने वाले लोगों के लिए फार्म की जिंदगी बाहर से बेहद आकर्षक लग सकती है। हरियाली, खुली हवा, पेड़-पौधे और शांति इसे खूबसूरत बनाते हैं। लेकिन मनीषा के मुताबिक इसकी अपनी कई चुनौतियां भी हैं।

फार्म पर वह सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जिनकी शहरों में लोग आदत डाल चुके हैं। न तुरंत ऑनलाइन ग्रोसरी डिलीवरी, न फूड डिलीवरी और न ही हर जरूरत की चीज कुछ मिनटों में घर पहुंचने की सुविधा।

यहां कचरे से लेकर पानी और खेती तक कई चीजों की जिम्मेदारी खुद संभालनी पड़ती है।

सामाजिक जीवन भी शहर से बिल्कुल अलग है। शहरों में लोग लगातार लोगों के बीच रहते हैं, जबकि फार्म लाइफ में एकांत और सीमित सामाजिक संपर्क का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए मनीषा का मानना है कि जो व्यक्ति शहर छोड़कर फार्म पर बसना चाहता है, उसे पहले इस जीवनशैली को समझना चाहिए।

कॉर्पोरेट डेडलाइन की जगह अब मौसम की चिंता

शहर में उनकी चिंताएं अलग थीं। ऑफिस की डेडलाइन, मीटिंग, ट्रैफिक और काम का दबाव रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।

फार्म पर जीवन अपेक्षाकृत शांत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तनाव पूरी तरह खत्म हो गया है।

अब चिंता का कारण मौसम और फसलें हैं।

अगर बहुत ज्यादा बारिश होती है तो बाढ़ का खतरा चिंता पैदा करता है। अगर बारिश कम हो जाए तो फसलों और पानी को लेकर तनाव बढ़ जाता है।

यानी तनाव का स्वरूप बदल गया है। पहले चिंता कॉर्पोरेट लक्ष्यों से जुड़ी थी, अब चिंता प्राकृतिक परिस्थितियों और खेती से जुड़ी है।

पर्यावरण भी बना बदलाव की बड़ी वजह

मनीषा के लिए फार्म लाइफ सिर्फ व्यक्तिगत शांति हासिल करने का तरीका नहीं है। इसके पीछे पर्यावरण को लेकर भी चिंता है।

उनका मानना है कि आर्थिक सुरक्षा हासिल करना महत्वपूर्ण है, लेकिन साफ हवा, साफ पानी और सुरक्षित भोजन जैसी प्राकृतिक जरूरतों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

फार्म पर रहने के जरिए वह अपने जीवन को प्रकृति के करीब लाने की कोशिश कर रही हैं।

दूसरों के लिए सबसे बड़ी सलाह—पहले आजमाकर देखें

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर सीधे फार्म पर बसने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए मनीषा की सलाह काफी व्यावहारिक है।

उनका कहना है कि स्थिर नौकरी और आय को तुरंत छोड़ने के बजाय पहले इस जीवनशैली को कुछ समय के लिए आजमाना चाहिए।

यानी नौकरी करते हुए धीरे-धीरे फार्म, खेती, पर्माकल्चर या ग्रामीण जीवन से जुड़ी गतिविधियों पर काम किया जा सकता है। इससे व्यक्ति को यह समझने का मौका मिलता है कि वास्तविक जीवन में वह इस बदलाव के लिए तैयार है या नहीं।

उनके अनुभव से सबसे महत्वपूर्ण बात यही निकलती है कि बड़ा बदलाव हमेशा रातों-रात करने की जरूरत नहीं होती।

मनीषा गुप्ता की कहानी एक ऐसे करियर सफर को दिखाती है जिसमें 20 हजार रुपये महीने की शुरुआती नौकरी से लेकर करीब 1 करोड़ रुपये सालाना की कॉर्पोरेट आय तक का सफर तय किया गया और फिर एक पूरी तरह अलग जीवनशैली चुनी गई।

लेकिन इस कहानी का सबसे अहम पहलू सिर्फ नौकरी छोड़ना नहीं है। असली बात यह है कि इस बदलाव के पीछे करीब 12 साल की तैयारी, वित्तीय योजना, जमीन तैयार करने का काम और धीरे-धीरे नई जीवनशैली को अपनाने की प्रक्रिया रही।

उनका अनुभव यह भी बताता है कि फार्म लाइफ बाहर से जितनी सरल और खूबसूरत दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही मेहनत, अनिश्चितता और जिम्मेदारी होती है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति कॉर्पोरेट दुनिया छोड़कर ऐसा जीवन अपनाना चाहता है, तो पहले आर्थिक सुरक्षा, जीवनशैली, आय के स्रोत और वास्तविक चुनौतियों को समझना जरूरी है।

मनीषा के शब्दों में उनकी सबसे सीधी सलाह है—इसे साथ-साथ शुरू करें। यानी बदलाव की तैयारी नौकरी और मौजूदा जीवन के साथ धीरे-धीरे की जाए, ताकि नया रास्ता अपनाने से पहले उसकी वास्तविकता को समझा जा सके।

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