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करोड़ों की संपत्ति, आलीशान दो मंजिला मकान… फिर भी 84 साल की उम्र में साथी की तलाश क्यों? वजह जानकर चौंक जाएंगे



करोड़ों की संपत्ति, दो मंजिला मकान और परिवार में बेटे होने के बावजूद अगर किसी बुजुर्ग की रातें अकेले गुजरें तो यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर जिंदगी के इस पड़ाव पर उन्हें किस चीज की कमी महसूस हो रही है? मध्य प्रदेश के विदिशा से अपनी नातिन के साथ लखनऊ पहुंचे 84 वर्षीय एक बुजुर्ग की कहानी कुछ ऐसी ही है। पत्नी के निधन के बाद उन्हें परिवार के बीच रहते हुए भी अकेलेपन का एहसास होने लगा। यही वजह रही कि वह जीवन के इस पड़ाव पर एक बार फिर किसी साथी की तलाश में वरिष्ठ नागरिक परिचय सम्मेलन में पहुंचे।

लखनऊ में आयोजित इस अनोखे सम्मेलन में अलग-अलग शहरों से बड़ी संख्या में बुजुर्ग पहुंचे। किसी की जिंदगी में जीवनसाथी का निधन वर्षों पहले हो चुका था तो कोई तलाक या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अकेला रह रहा था। कुछ बुजुर्ग ऐसे भी थे जिन्होंने कभी विवाह नहीं किया। कार्यक्रम में पहुंचे लोगों ने एक-दूसरे से मुलाकात की, अपनी जिंदगी के अनुभव साझा किए और भविष्य के लिए किसी साथी की संभावना तलाशने की कोशिश की।

84 वर्षीय बुजुर्ग की कहानी ने खींचा ध्यान

मध्य प्रदेश के विदिशा से लखनऊ पहुंचे 84 वर्षीय बुजुर्ग सम्मेलन में आने वाले लोगों के बीच चर्चा का विषय बने। बताया गया कि उनके पास करोड़ों की संपत्ति और दो मंजिला मकान है। परिवार में बेटे भी हैं, लेकिन पत्नी के निधन के बाद उनकी जिंदगी में एक ऐसा खालीपन आया जिसे संपत्ति और परिवार की मौजूदगी भी पूरी तरह भर नहीं सकी।

वह अपनी नातिन के साथ लखनऊ पहुंचे थे। सम्मेलन में उनका उद्देश्य किसी आर्थिक मदद की तलाश करना नहीं था, बल्कि अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में ऐसा साथी तलाशना था जिसके साथ वह बातचीत कर सकें और रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-बड़े अनुभव साझा कर सकें।

उनकी कहानी इस बात की ओर भी ध्यान खींचती है कि बुजुर्गों की जरूरतें केवल आर्थिक सुरक्षा तक सीमित नहीं होतीं। कई बार परिवार और संपत्ति होने के बावजूद भावनात्मक साथ की कमी उन्हें परेशान कर सकती है।

लखनऊ में जुटे करीब 90 वरिष्ठ नागरिक

रविवार को लखनऊ में आयोजित वरिष्ठ नागरिक परिचय सम्मेलन में करीब 50 से 90 वर्ष की आयु के लगभग 90 बुजुर्ग पहुंचे। इनमें करीब 75 पुरुष और 15 महिलाएं शामिल थीं।

सम्मेलन में आने वाले अधिकांश बुजुर्ग विधुर, विधवा, तलाकशुदा या अविवाहित बताए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे लोगों को एक-दूसरे से मिलने का अवसर देना था, जो जीवन के इस पड़ाव पर किसी साथी की तलाश कर रहे हैं।

कार्यक्रम में पहुंचे लोगों ने एक-दूसरे से बातचीत की। किसी ने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में बताया तो किसी ने अकेलेपन से जुड़े अनुभव साझा किए। कई बुजुर्गों के लिए यह केवल परिचय का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अपनी भावनाओं को किसी के सामने रखने का एक अवसर भी बना।

30 साल से अकेली रह रहीं दिल्ली की महिला

सम्मेलन में दिल्ली से पहुंची 55 वर्षीय महिला ने भी अपनी जिंदगी की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि पति की मृत्यु के बाद वह लगभग 30 वर्षों से अकेली रह रही हैं।

समय के साथ उनके बेटे बड़े हुए और अलग-अलग शहरों में जाकर बस गए। बच्चों की अपनी जिंदगी और जिम्मेदारियां हैं, लेकिन उनके दूर चले जाने के बाद घर की खामोशी कई बार उन्हें परेशान करती है।

महिला ने बताया कि शाम के समय अकेलापन ज्यादा महसूस होता है। जिंदगी के इस पड़ाव पर उनकी इच्छा है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके साथ बैठकर दिनभर की बातें की जा सकें। उनके मुताबिक, साथी होने से केवल साथ नहीं मिलता, बल्कि अपनी बात सुनाने और दूसरे की बात सुनने का अवसर भी मिलता है।

पूर्व पुलिसकर्मी ने भी सुनाई अपनी कहानी

सम्मेलन में 67 वर्षीय एक पूर्व पुलिसकर्मी भी पहुंचे। उन्होंने बताया कि जीवन का बड़ा हिस्सा माता-पिता की सेवा और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने में बीत गया।

नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल दूसरों की जरूरतों को पूरा करने में लगा दिए। लेकिन अब जब जीवन अपेक्षाकृत शांत हो गया है तो उन्हें अकेलापन ज्यादा महसूस होने लगा है।

उनकी कहानी भी सम्मेलन में मौजूद अन्य बुजुर्गों से अलग नहीं थी। उन्होंने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ इंसान को किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत महसूस हो सकती है जिसके साथ वह अपने अनुभव साझा कर सके।

प्रयागराज से आई महिला ने बताई समाज की चुनौती

प्रयागराज से सम्मेलन में पहुंची एक महिला ने बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति को लेकर अपनी बात रखी। उनका कहना था कि उम्र बढ़ने के बाद महिलाओं को भी साथी की जरूरत महसूस होती है, लेकिन समाज की सोच और पारिवारिक दबाव कई बार उन्हें अपने लिए फैसला लेने से रोकता है।

भारत जैसे समाज में बुजुर्ग अवस्था में दोबारा साथी तलाशने को लेकर आज भी कई तरह की सामाजिक धारणाएं मौजूद हैं। खासतौर पर महिलाओं के लिए ऐसी परिस्थितियां कई बार और कठिन हो जाती हैं।

सम्मेलन में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में काफी कम रही। आयोजकों के मुताबिक, इसका एक कारण सामाजिक रूढ़ियां और परिवार का दबाव भी हो सकता है।

संपत्ति से ज्यादा जरूरी हो जाता है साथ

सम्मेलन की सबसे अहम बात यह रही कि कई बुजुर्गों ने संपत्ति और आर्थिक सुरक्षा के बावजूद भावनात्मक अकेलेपन की बात कही।

कई लोगों के पास रहने के लिए घर है, आर्थिक संसाधन हैं और परिवार भी है। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में बातचीत करने वाला, साथ बैठकर भोजन करने वाला या अपने अनुभव साझा करने वाला व्यक्ति नहीं है।

84 वर्षीय बुजुर्ग की कहानी इसी अंतर को सामने लाती है। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद वह अपने जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं जिसके साथ वह अकेलेपन को कम कर सकें।

यह स्थिति यह भी बताती है कि बुजुर्गों की खुशहाली को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव भी उनके जीवन की महत्वपूर्ण जरूरत हो सकता है।

महिलाओं की कम भागीदारी पर भी चर्चा

सम्मेलन के आयोजकों ने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों में आमतौर पर पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक रहती है। इस कार्यक्रम में भी यही देखने को मिला।

जहां करीब 75 पुरुष पहुंचे, वहीं महिलाओं की संख्या लगभग 15 रही। आयोजकों का कहना है कि सामाजिक धारणाएं, परिवार की प्रतिक्रिया और समाज में दोबारा विवाह या साथी चुनने को लेकर मौजूद सोच महिलाओं के लिए बड़ी बाधा हो सकती है।

बुजुर्ग महिलाओं के सामने कई बार यह सवाल भी होता है कि परिवार और समाज उनके इस फैसले को किस तरह देखेगा। इसके कारण कुछ महिलाएं इच्छा होने के बावजूद ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने से बच सकती हैं।

साथी की जरूरत सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं

सम्मेलन से जुड़े लोगों ने यह भी कहा कि बुजुर्गों के लिए साथी की जरूरत केवल भावनात्मक कारणों से नहीं होती। उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते हैं।

अगर बुजुर्ग के साथ कोई भरोसेमंद व्यक्ति हो तो बीमारी, अस्पताल जाने, रोजमर्रा के काम या आपात स्थिति में सहायता मिल सकती है। हालांकि हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं और साथी का फैसला व्यक्तिगत पसंद, परिवार तथा कानूनी और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

बुजुर्गों के अकेलेपन पर गंभीर चर्चा जरूरी

बढ़ती उम्र में अकेलापन आज कई परिवारों के सामने एक चुनौती बन रहा है। बच्चों का दूसरे शहरों या विदेशों में बस जाना, जीवनसाथी का निधन और सामाजिक संपर्क कम होना इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक गतिविधियां, मित्र मंडली, सामुदायिक कार्यक्रम और संवाद के अवसर महत्वपूर्ण हो सकते हैं। परिवार के सदस्यों की भूमिका भी अहम है। बुजुर्गों के साथ नियमित बातचीत करना और उन्हें परिवार की गतिविधियों में शामिल रखना उनके सामाजिक जुड़ाव को मजबूत कर सकता है।

सम्मेलन में साझा किए संपर्क

कार्यक्रम में कई बुजुर्गों ने एक-दूसरे से बातचीत की और अपनी पसंद तथा जीवन से जुड़े अनुभव साझा किए। कुछ लोगों ने आपसी संपर्क के लिए नाम और फोन नंबर भी साझा किए।

हालांकि किसी भी नए रिश्ते को आगे बढ़ाने से पहले व्यक्तिगत जानकारी, आर्थिक स्थिति और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की सावधानीपूर्वक जांच करना जरूरी है। विशेष रूप से संपत्ति से जुड़े मामलों में बुजुर्गों को कानूनी सलाह और परिवार के विश्वसनीय सदस्यों की मदद लेना उपयोगी हो सकता है।

लखनऊ का यह वरिष्ठ नागरिक परिचय सम्मेलन एक अलग तरह की सामाजिक जरूरत को सामने लाता है। 84 वर्षीय बुजुर्ग से लेकर 55 वर्षीय महिला और 67 वर्षीय पूर्व पुलिसकर्मी तक, अलग-अलग लोगों की कहानियों में एक बात समान नजर आई—उम्र बढ़ने के साथ इंसान को सिर्फ आर्थिक सुरक्षा नहीं, बल्कि बातचीत, अपनापन और साथ की भी जरूरत महसूस हो सकती है।

करोड़ों की संपत्ति और बड़ा घर जीवन की सुविधाएं दे सकते हैं, लेकिन किसी के साथ बैठकर दो बातें करने की इच्छा का विकल्प हमेशा संपत्ति नहीं बन सकती। यही वजह है कि वरिष्ठ नागरिकों के बीच ऐसे परिचय कार्यक्रम अब अकेलेपन और सामाजिक जुड़ाव जैसे मुद्दों पर चर्चा का एक माध्यम बन रहे हैं।

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