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मेले में मजाक-मजाक में कही एक बात… फिर 16 साल में बदल गई 162 बेटियों की जिंदगी! आखिर क्या था वो जुमला?



गुग्गा नवमी मेला। कभी हंसी-ठिठोली के बीच कही गई एक छोटी सी बात किसी के दिल में इस कदर उतर गई कि उसने एक पूरी सेवा परंपरा का रूप ले लिया। सवाल था—“गरीब की शादी कैसे होती है?” बात उस समय भले ही मजाक में कही गई थी, लेकिन इस एक जुमले ने कुछ लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आखिर उस गरीब पिता का क्या, जिसके पास अपनी बेटी की शादी के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं? वह बेटी के हाथ कैसे पीले करेगा और उसकी डोली कैसे उठाएगा?

इसी सवाल से शुरू हुई एक पहल आज 16 साल बाद सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद बन चुकी है। गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी के नाम से संचालित संस्था पिछले 16 वर्षों से आर्थिक रूप से कमजोर, गरीब और बेसहारा बेटियों के विवाह में सहयोग करती आ रही है। अब तक 162 जरूरतमंद बेटियां संस्था की मदद से परिणय सूत्र में बंध चुकी हैं और अपना नया जीवन शुरू कर चुकी हैं।

संस्था की खास बात यह है कि यहां शादी को महज आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखा जाता। संस्था के सदस्य विवाह की तमाम रस्मों में परिवार के सदस्य की तरह शामिल होते हैं। कन्यादान से लेकर विदाई तक की जिम्मेदारी को वे एक पिता और भाई के भाव से निभाने का प्रयास करते हैं, ताकि बेटी को विवाह के दिन यह महसूस न हो कि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है या उसका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है।

मेले में कही बात बनी सेवा की वजह

गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी के प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा के मुताबिक इस पूरी पहल की शुरुआत वर्ष 2010 में गुग्गा नवमी मेले के दौरान हुई थी। उस समय संस्था से जुड़े कुछ लोग मेले में आपस में हंसी-मजाक कर रहे थे। इसी दौरान मजाक-मजाक में एक युवक को दूल्हा बना दिया गया।

माहौल पूरी तरह हल्का-फुल्का था, लेकिन इसी दौरान किसी ने सवालिया अंदाज में कह दिया—गरीब की शादी कैसे होती है?

यह बात सुनने में भले ही सामान्य लगी हो, लेकिन वहां मौजूद लोगों के मन में यह सवाल गहराई से उतर गया। लोगों ने सोचा कि जिन परिवारों के पास रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं हैं, उनके लिए बेटी की शादी कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती होगी।

शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं है। इसके साथ कपड़े, आभूषण, घरेलू सामान, भोजन, मेहमानों की व्यवस्था और तमाम दूसरी जरूरतें जुड़ी होती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए इन खर्चों को पूरा करना कई बार बेहद मुश्किल हो जाता है।

यही सोच धीरे-धीरे संकल्प में बदल गई।

तय हुआ-मेले का दूसरा दिन बेटियों के नाम

राजेंद्र पाल वर्मा के अनुसार, उसी समय यह तय किया गया कि गुग्गा नवमी मेले का दूसरा दिन जरूरतमंद बेटियों के नाम किया जाएगा। उद्देश्य था कि ऐसी बेटियों का विवाह कराया जाए, जिनके परिवार आर्थिक परेशानी के कारण शादी का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं।

वर्ष 2010 में इस पहल के तहत पहली बार तीन जरूरतमंद परिवारों की बेटियों का विवाह कराया गया। किसी ने शायद उस समय कल्पना भी नहीं की होगी कि यह छोटा सा प्रयास आने वाले वर्षों में एक बड़ी सेवा परंपरा बन जाएगा।

पहले साल तीन बेटियों से शुरू हुआ यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ता गया। संस्था से जुड़े लोगों ने जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचना शुरू किया। सहयोग जुटाया गया और विवाह के आयोजन को व्यवस्थित रूप दिया गया।

आज स्थिति यह है कि हर वर्ष गुग्गा नवमी मेले के दूसरे दिन करीब 12 से 13 जरूरतमंद बेटियों का विवाह कराया जाता है।

16 साल में 162 बेटियों का बसा घर

16 वर्षों की इस सेवा यात्रा में अब तक 162 बेटियां विवाह के बंधन में बंध चुकी हैं। इन बेटियों के लिए संस्था केवल शादी का खर्च उठाने वाली संस्था नहीं, बल्कि एक ऐसे परिवार की भूमिका निभाती है जो विवाह की पूरी प्रक्रिया में उनके साथ खड़ा रहता है।

संस्था के प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा और महासचिव मक्खन सिंह बताते हैं कि विवाह की रस्में गुरुद्वारा साहिब में धार्मिक रीति-रिवाज और विधि-विधान के साथ कराई जाती हैं।

संस्था के सदस्य इस दौरान वर-वधू और उनके परिवारों के साथ रहते हैं। उनका प्रयास होता है कि शादी में किसी भी बेटी को यह कमी महसूस न हो कि उसके पिता या परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है।

कन्यादान से विदाई तक निभाते हैं पिता का फर्ज

इस पहल का सबसे भावुक हिस्सा कन्यादान और विदाई का समय बताया जाता है। कई परिवार ऐसे होते हैं, जहां बेटी के सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका होता है। कुछ परिवारों में पिता मौजूद होने के बावजूद आर्थिक परिस्थितियां इतनी खराब होती हैं कि बेटी की शादी का खर्च उठाना बेहद कठिन हो जाता है।

ऐसे समय संस्था के सदस्य खुद को बेटी के परिवार का हिस्सा मानकर जिम्मेदारियां निभाते हैं।

जब विवाह के दौरान कोई गरीब पिता अपनी बेटी का हाथ संस्था के सदस्यों को सौंपता है और भावुक होकर यह कहता है कि “आज आप ही इसके बाबुल हो”, तो माहौल भावुक हो जाता है। संस्था से जुड़े लोग इसे सिर्फ एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक पिता का फर्ज मानते हैं।

बेटी की विदाई के समय परिवार और संस्था के सदस्यों की आंखों में आंसू होना इस आयोजन की संवेदनशीलता को दर्शाता है।

एक शादी पर करीब सवा लाख रुपये का बजट

संस्था के अनुसार, प्रत्येक शादी को सम्मानजनक तरीके से संपन्न कराने के लिए करीब सवा लाख रुपये का बजट निर्धारित किया जाता है। इसमें शादी के दौरान दिए जाने वाले उपहार और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं शामिल होती हैं।

इस हिसाब से हर वर्ष होने वाली 12 से 13 शादियों में बड़ी राशि खर्च होती है। संस्था इस खर्च को सहयोग और फंड जुटाकर पूरा करती है।

आयोजन में केवल विवाह की मुख्य रस्म ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी अन्य आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है। उद्देश्य यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की बेटी की शादी भी सम्मान और गरिमा के साथ हो।

तीन महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी

गुग्गा नवमी मेले के दूसरे दिन होने वाले इस बड़े आयोजन की तैयारी अंतिम समय में नहीं होती। संस्था के सदस्य करीब तीन महीने पहले से तैयारियों में जुट जाते हैं।

सबसे पहले जरूरतमंद परिवारों की पहचान की जाती है। इसके बाद यह देखा जाता है कि किन परिवारों को वास्तव में आर्थिक सहायता की जरूरत है। बेटियों और उनके परिवारों से संपर्क करने के साथ विवाह की दूसरी तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।

साथ ही आयोजन के लिए फंड जुटाने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। उपहार, विवाह की व्यवस्थाएं और अन्य जरूरी सामान जुटाने की योजना बनाई जाती है। इतने बड़े आयोजन में कई लोगों की भूमिका होती है और संस्था के सदस्य अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हैं।

सेवा का कारवां लगातार बढ़ रहा

2010 में तीन बेटियों से शुरू हुई यह पहल अब 162 बेटियों के विवाह तक पहुंच चुकी है। संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि उनका उद्देश्य इस सेवा को लगातार जारी रखना है, ताकि आर्थिक मजबूरी किसी गरीब परिवार की बेटी की शादी में बाधा न बने।

इस पहल की खासियत यह भी है कि इसका केंद्र केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन है। विवाह के दिन बेटी और उसके परिवार को यह एहसास दिलाने की कोशिश की जाती है कि वे अकेले नहीं हैं।

गुग्गा नवमी मेले में कभी मजाक के दौरान उठा सवाल आज एक सामाजिक जिम्मेदारी में बदल चुका है। एक जुमले से शुरू हुई सोच ने 162 बेटियों के जीवन में नई शुरुआत की वजह बनाई है।

यह कहानी इस बात की मिसाल भी है कि समाज में बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों या बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। कई बार एक छोटा सा सवाल ही लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर देता है। अगर उस सवाल को गंभीरता से लिया जाए और उसे सेवा का रूप दे दिया जाए, तो उसका असर वर्षों तक दिखाई दे सकता है।

आज गुग्गा नवमी मेले का दूसरा दिन सिर्फ धार्मिक आयोजन या मेले की परंपरा तक सीमित नहीं रह गया है। यह उन बेटियों के लिए उम्मीद का दिन बन चुका है, जिनके परिवार आर्थिक मुश्किलों के कारण उनकी शादी को लेकर चिंतित रहते हैं।

एक मजाक में पूछा गया सवाल—“गरीब की शादी कैसे होती है?”—आज 162 बेटियों की नई जिंदगी की कहानी बन चुका है। पिछले 16 वर्षों से जारी यह सेवा यात्रा बताती है कि किसी जरूरतमंद के जीवन में सहारा बनने के लिए सबसे जरूरी चीज पैसा ही नहीं, बल्कि मदद करने की सच्ची इच्छा भी है।

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