शरीर का ऐसा अंग जिसका जन्म के बाद नहीं रहता कोई बड़ा काम! फिर क्यों होती है पेट पर नाभि? वजह जानकर चौंक जाएंगे
मानव शरीर प्रकृति की सबसे जटिल संरचनाओं में से एक है। विज्ञान ने शरीर से जुड़ी कई ऐसी गुत्थियों को सुलझा लिया है, जिनके बारे में कभी सोचना भी मुश्किल था। इसके बावजूद इंसानी शरीर को लेकर आज भी कई सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब वैज्ञानिक लगातार खोज रहे हैं। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया, इंसान की अधिकतम संभावित आयु और शरीर के अलग-अलग अंगों के बीच होने वाली जटिल क्रियाएं आज भी शोध का विषय हैं।
हमारे शरीर का लगभग हर अंग किसी न किसी महत्वपूर्ण काम से जुड़ा है। आंखें हमें देखने में मदद करती हैं, कान सुनने के लिए जरूरी हैं, फेफड़े सांस लेने का काम करते हैं, दिल पूरे शरीर में रक्त पहुंचाता है और त्वचा शरीर को बाहरी वातावरण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यहां तक कि नाखून जैसे छोटे हिस्से भी शरीर के लिए उपयोगी भूमिका निभाते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी अपने पेट के बीचों-बीच मौजूद एक छोटे से गड्ढे के बारे में सोचा है? यह गड्ढा आखिर क्यों होता है? क्या इसका शरीर में कोई काम है? और अगर इसका कोई बड़ा काम नहीं है तो प्रकृति ने इसे बनाया ही क्यों?
यहां बात हो रही है नाभि यानी बेली बटन की।
नाभि देखने में शरीर का एक छोटा और साधारण हिस्सा लगती है, लेकिन इसके पीछे इंसान के जन्म से पहले के जीवन की बेहद महत्वपूर्ण कहानी छिपी हुई है। दरअसल, नाभि अपने आप में कोई अलग अंग नहीं है, बल्कि यह उस स्थान का निशान है जहां कभी गर्भनाल यानी Umbilical Cord जुड़ी हुई थी।
मां के गर्भ में नाभि से जुड़ी होती है पूरी कहानी
जब बच्चा मां के गर्भ में विकसित हो रहा होता है, तब वह अपने शरीर से खुद भोजन या ऑक्सीजन प्राप्त नहीं करता। गर्भ में विकसित हो रहे भ्रूण को पोषण और ऑक्सीजन मां के शरीर से मिलता है। इस पूरी प्रक्रिया में गर्भनाल की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
गर्भनाल एक नली जैसी संरचना होती है, जो भ्रूण को प्लेसेंटा यानी अपरा से जोड़ती है। प्लेसेंटा गर्भाशय में विकसित होने वाली वह संरचना है, जिसके माध्यम से मां और भ्रूण के बीच पोषक तत्वों, ऑक्सीजन और अपशिष्ट पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
भ्रूण के विकास के दौरान गर्भनाल के जरिए जरूरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन भ्रूण तक पहुंचते हैं। वहीं भ्रूण के शरीर से बनने वाले कुछ अपशिष्ट पदार्थ मां के शरीर तक पहुंचाए जाते हैं, जहां उन्हें बाहर निकालने की प्रक्रिया होती है।
यानी जन्म से पहले गर्भनाल बच्चे के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण जीवन-रेखा की तरह काम करती है।
गर्भनाल आखिर बच्चे से कहां जुड़ी होती है?
यह सवाल भी काफी दिलचस्प है। गर्भनाल का एक सिरा प्लेसेंटा से जुड़ा होता है, जबकि दूसरा सिरा भ्रूण के पेट से जुड़ा होता है।
भ्रूण के पेट पर जहां गर्भनाल जुड़ी होती है, वही स्थान जन्म के बाद नाभि का निशान बन जाता है।
यानी हमारे पेट पर मौजूद नाभि वास्तव में इस बात का स्थायी निशान है कि जन्म से पहले हमारा शरीर गर्भनाल के जरिए मां के शरीर से जुड़ा हुआ था।
यह संबंध बच्चे के विकास के लिए बेहद जरूरी होता है। गर्भ में रहने के दौरान बच्चा सीधे मुंह से खाना नहीं खाता और न ही अपने फेफड़ों से हवा लेकर सांस लेता है। इसलिए उसके विकास के लिए मां और भ्रूण के बीच होने वाला यह जैविक आदान-प्रदान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जन्म के बाद बदल जाती है पूरी व्यवस्था
बच्चे के जन्म के साथ ही स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। जन्म के बाद बच्चा गर्भ से बाहर आ जाता है और उसके शरीर की कई प्रणालियां स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू करती हैं।
वह सांस लेने के लिए अपने फेफड़ों का इस्तेमाल करता है और भोजन के लिए मुंह तथा पाचन तंत्र का उपयोग करता है। ऐसे में अब उसे मां से सीधे पोषण और ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए गर्भनाल की जरूरत नहीं रहती।
इसी कारण प्रसव के बाद गर्भनाल को काट दिया जाता है। गर्भनाल काटने के बाद बच्चे के पेट से जुड़ा छोटा-सा हिस्सा कुछ समय तक बचा रह सकता है। यह धीरे-धीरे सूखता है और आमतौर पर कुछ दिनों के भीतर अलग हो जाता है।
इसके बाद वहां जो निशान बचता है, वही आगे चलकर नाभि के रूप में दिखाई देता है।
फिर नाभि का जन्म के बाद क्या काम है?
यहीं इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा आता है। जन्म के बाद नाभि का कोई बड़ा स्वतंत्र जैविक कार्य नहीं होता। यानी नाभि के जरिए हमें भोजन, पानी या ऑक्सीजन नहीं मिलती और न ही यह शरीर में किसी मुख्य प्रक्रिया को संचालित करती है।
इसे मुख्य रूप से गर्भनाल के जुड़ाव का स्थायी निशान माना जाता है।
हालांकि, इसका यह मतलब भी नहीं है कि नाभि के आसपास शरीर में बिल्कुल कोई संरचना नहीं होती। गर्भ के विकास के दौरान महत्वपूर्ण रहे कुछ रक्त वाहिकाओं और ऊतकों के अवशेष शरीर के भीतर मौजूद रह सकते हैं। लेकिन नाभि स्वयं जन्म के बाद गर्भनाल की तरह काम नहीं करती।
यही वजह है कि इसे शरीर का ऐसा हिस्सा कहा जा सकता है जिसका जन्म के बाद कोई बड़ा स्वतंत्र कार्य नहीं रहता।
हर व्यक्ति की नाभि अलग क्यों दिखती है?
आपने गौर किया होगा कि सभी लोगों की नाभि एक जैसी नहीं होती। किसी की नाभि अंदर की ओर धंसी हुई दिखाई देती है, जबकि कुछ लोगों की नाभि बाहर की ओर उभरी हुई हो सकती है।
नाभि का आकार और रूप कई चीजों पर निर्भर कर सकता है। गर्भनाल काटने के बाद उस स्थान पर बनने वाला निशान, त्वचा की बनावट और व्यक्ति के शरीर की संरचना इसके स्वरूप को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए किसी व्यक्ति की नाभि देखकर उसके स्वास्थ्य या व्यक्तित्व के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना सही नहीं माना जाता।
नाभि को लेकर कई भ्रांतियां भी हैं
नाभि को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं और घरेलू मान्यताएं भी देखने को मिलती हैं। कई लोग मानते हैं कि नाभि शरीर के बहुत बड़े हिस्से को नियंत्रित करती है या उसमें विशेष प्रकार की ऊर्जा मौजूद होती है।
लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से नाभि को किसी अलग ऊर्जा केंद्र या शरीर की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले अंग के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
हां, नाभि के आसपास नसें, त्वचा, मांसपेशियां और अन्य ऊतक मौजूद होते हैं, इसलिए इस क्षेत्र में चोट, संक्रमण या किसी अन्य समस्या की स्थिति में दर्द या परेशानी हो सकती है।
नाभि में गंदगी क्यों जमा होती है?
नाभि शरीर की त्वचा पर मौजूद एक गड्ढेनुमा जगह है। इसलिए इसमें कपड़ों के रेशे, पसीना, मृत त्वचा कोशिकाएं और दूसरी छोटी चीजें जमा हो सकती हैं। खासकर गहरी नाभि में सफाई न रखने पर गंदगी जमा होने की संभावना बढ़ सकती है।
इसीलिए सामान्य स्वच्छता के दौरान नाभि को भी हल्के हाथ से साफ रखना चाहिए। बहुत जोर से रगड़ना या किसी नुकीली चीज से अंदर की सफाई करना नुकसान पहुंचा सकता है।
अगर नाभि के आसपास लगातार दर्द, सूजन, लालिमा, बदबूदार स्राव या खून दिखाई दे तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर होता है।
जन्म से पहले की जिंदगी की निशानी है नाभि
हम रोज अपने शरीर को देखते हैं, लेकिन कई बार उसके छोटे-छोटे हिस्सों के पीछे छिपी कहानी पर ध्यान नहीं देते। नाभि भी ऐसी ही एक संरचना है।
जन्म के बाद इसका कोई बड़ा स्वतंत्र जैविक काम नहीं रह जाता, लेकिन यह हमारे जीवन के उस दौर की स्थायी निशानी है जब हम अपनी मां के गर्भ में थे और गर्भनाल के जरिए प्लेसेंटा से जुड़े हुए थे।
इस लिहाज से पेट पर मौजूद यह छोटा-सा निशान इंसान के जन्म से पहले के जीवन की पूरी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है। जिस नाभि को हम रोजमर्रा की जिंदगी में शायद ही कभी महत्व देते हैं, वह वास्तव में इस बात की याद दिलाती है कि जन्म से पहले हमारा अस्तित्व अपनी मां के शरीर से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ था।

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