त्योहारों से पहले महंगाई का बड़ा खेल! दाल के दाम अचानक 11% तक उछले… अब रसोई में क्या होने वाला है?
त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले ही आम परिवारों की रसोई पर महंगाई का दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। सितंबर के आखिरी दिनों में चना, मूंग, तूर और मटर जैसी प्रमुख दालों की थोक कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, कुछ प्रमुख दालों की कीमतें पिछले एक महीने में करीब 10 से 11 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। वहीं, पिछले एक सप्ताह के दौरान भी कई दालों के भाव में 3 से 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।
दालों की कीमतों में यह तेजी ऐसे समय आई है जब देश में त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है। इस दौरान घरों में मिठाई, पकवान और रोजमर्रा के खाने की मांग बढ़ती है। दाल भारतीय परिवारों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए इसके दाम बढ़ने का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है।
चना, मूंग, तूर और मटर के दाम में तेजी
इंडियन पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन यानी IPGA के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में चने की कीमत में लगभग 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। तूर की कीमत करीब 6.5 प्रतिशत और मूंग की कीमत लगभग 10.6 प्रतिशत बढ़ी है। इसी अवधि में मटर के दाम में करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सिर्फ एक महीने का आंकड़ा ही चिंता बढ़ाने वाला नहीं है। कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में भी काफी ज्यादा बताई जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चने की कीमत में सालाना आधार पर लगभग 23 प्रतिशत, उड़द में 24 प्रतिशत और मटर में करीब 47 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
हालांकि हर दाल की कीमत में एक जैसी तेजी नहीं है। मसूर और मूंग में पिछले एक साल के दौरान अपेक्षाकृत कम वृद्धि बताई गई है। इसका मतलब यह है कि महंगाई का असर अलग-अलग दालों पर अलग-अलग दिखाई दे रहा है।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं दालों के दाम?
बाजार विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, दालों की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें फसल को लेकर चिंता, मिट्टी में नमी की कमी, कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और त्योहारों से पहले बढ़ती मांग शामिल हैं।
इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश भी सामान्य से कम रही है। 30 सितंबर तक उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, देश में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 12 प्रतिशत कम रही। बारिश का वितरण भी कई इलाकों में असमान रहा, जिसके कारण कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और सिंचाई को लेकर चिंता बढ़ी है।
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति और कर्नाटक में भी बारिश से जुड़ी परेशानी ने कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है। इसका असर कमोडिटी बाजार में दिखाई देने लगा है और दालों की कीमतों में तेजी इसी दबाव का एक हिस्सा मानी जा रही है।
रबी की फसल पर भी नजर
दालों की कीमतों के लिए आने वाली रबी फसल बेहद महत्वपूर्ण होगी। रबी सीजन की बुआई अक्टूबर से शुरू होती है। ऐसे में किसानों के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी और सिंचाई की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।
सरकार ने भी रबी सीजन की तैयारियों को लेकर राज्यों को पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी के आधार पर फसल योजना बनाने को कहा है। दाल और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
सरकार ने 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य भी पहले के मुकाबले कम करके 373.93 मिलियन टन किया है। इसके पीछे मौसम संबंधी जोखिम और संभावित El Niño प्रभाव को लेकर चिंता प्रमुख कारणों में शामिल है।
खाद्य महंगाई पहले ही बढ़ चुकी है
दालों की कीमतों में मौजूदा तेजी को देश की व्यापक खाद्य महंगाई के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। अगस्त 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर 4.82 प्रतिशत रही, जबकि खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत दर्ज की गई। जुलाई में खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत थी। यानी अगस्त में खाद्य कीमतों का दबाव बढ़ा था।
ग्रामीण क्षेत्रों में अगस्त की खाद्य महंगाई 6.13 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.64 प्रतिशत रही। यह अंतर बताता है कि खाद्य कीमतों का असर देश के अलग-अलग हिस्सों में समान नहीं है।
सितंबर की आधिकारिक खुदरा महंगाई के आंकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं। सरकार के अनुसार सितंबर 2026 का CPI आंकड़ा 12 अक्टूबर को जारी किया जाना है।
खाने के तेल को लेकर सरकार ने उठाया कदम
दालों के अलावा खाद्य तेल की कीमतों को लेकर भी हाल के दिनों में दबाव देखा गया है। इसी वजह से सरकार ने सितंबर में कई खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाया। कच्चे पाम ऑयल और कच्चे सोया ऑयल पर मूल आयात शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया गया। वहीं कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल आयात शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया।
सरकार का यह कदम त्योहारों के दौरान खाद्य तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने और घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है। भारत अपनी वनस्पति तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आयात शुल्क में बदलाव का घरेलू बाजार पर प्रभाव पड़ सकता है।
आम परिवार की जेब पर क्या पड़ेगा असर?
दालों की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ दाल खरीदने तक सीमित नहीं रहता। घरों में दाल का इस्तेमाल रोजाना भोजन में होता है। इसके अलावा रेस्तरां, ढाबे, कैंटीन और तैयार खाद्य पदार्थ बनाने वाले कारोबार भी दालों की खरीद करते हैं।
अगर थोक कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका कुछ हिस्सा खुदरा बाजार तक पहुंच सकता है। हालांकि थोक कीमतों में बढ़ोतरी का पूरा असर तुरंत खुदरा कीमतों में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। दुकानदारों के पुराने स्टॉक, नई खरीद कीमत, स्थानीय मांग और परिवहन लागत जैसे कई कारक अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
इसलिए आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दालों की मौजूदा तेजी कितने समय तक बनी रहती है और नई फसल की स्थिति कैसी रहती है।
त्योहारों से पहले बढ़ी चिंता
सितंबर के अंत में दालों की कीमतों में तेजी और मानसून की कमी ने महंगाई को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। एक तरफ त्योहारों के कारण खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने वाली है, वहीं दूसरी तरफ फसल और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
अगर रबी सीजन में पर्याप्त उत्पादन होता है और बाजार में आपूर्ति सुधरती है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन यदि मौसम और उत्पादन से जुड़ी समस्याएं बनी रहती हैं, तो दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आगे भी देखने को मिल सकता है।
फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि दालों की कीमतों में आई मौजूदा तेजी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन आने वाले महीनों की वास्तविक स्थिति नई फसल, बारिश, उत्पादन और बाजार में आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

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