नागपुर से निकली 770 करोड़ की डिफेंस डील ने यूरोप में मचाया हड़कंप, यूक्रेन को गोला-बारूद वाले सौदे में रक्षा मंत्री ने दिया इस्तीफा!
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूरोप से एक बड़ी कूटनीतिक और रक्षा संबंधी खबर सामने आई है। एस्टोनिया में यूक्रेन को 155 एमएम आर्टिलरी गोला-बारूद की आपूर्ति से जुड़े करीब 70 मिलियन यूरो (लगभग 770 करोड़ रुपये) के रक्षा सौदे को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि देश के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस पूरे मामले की खास बात यह है कि विवादित रक्षा सौदे का एक महत्वपूर्ण कनेक्शन भारत के महाराष्ट्र स्थित नागपुर से जुड़ता है।
मामला केवल एक रक्षा अनुबंध के रद्द होने तक सीमित नहीं है। एस्टोनिया के नेशनल ऑडिट ऑफिस की रिपोर्ट, रक्षा खरीद प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल और आपराधिक जांच शुरू होने के बाद राजनीतिक दबाव बढ़ा। आखिरकार पेवकुर ने पूरे रक्षा क्षेत्र की राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद छोड़ने का फैसला किया।
रक्षा मंत्री ने क्यों दिया इस्तीफा?
हन्नो पेवकुर जुलाई 2022 से एस्टोनिया के रक्षा मंत्री के पद पर थे। वह देश के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों में शामिल रहे हैं। रक्षा खरीद से जुड़े विवाद के बाद उन्होंने राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की घोषणा की।
सोशल मीडिया पर अपने फैसले की जानकारी देते हुए पेवकुर ने कहा कि एस्टोनिया की सुरक्षा किसी एक व्यक्ति की परियोजना नहीं है, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है। इसलिए उन्होंने रक्षा क्षेत्र से जुड़े घटनाक्रम की राजनीतिक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का फैसला किया।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोपीय देशों में हथियारों और तोपखाने के गोला-बारूद की मांग काफी बढ़ी हुई है। 155 एमएम के आर्टिलरी शेल यूक्रेन की युद्ध संबंधी जरूरतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आखिर नागपुर का नाम इस मामले में क्यों आया?
इस पूरे विवाद में भारत के नागपुर शहर का नाम सामने आने की वजह नीको डिफेंस म्यूनिशंस है। यह कंपनी नागपुर स्थित जयसवाल नीको ग्रुप की सहायक कंपनी बताई गई है।
विवाद वर्ष 2024 में एस्टोनिया के Estonian Centre for Defence Investments (ECDI) द्वारा दिए गए एक अनुबंध से जुड़ा है। इस अनुबंध के तहत इटली में पंजीकृत कंपनी Datasel S.R.L. को यूक्रेन के लिए 155 एमएम आर्टिलरी गोला-बारूद की आपूर्ति करनी थी।
बताया गया है कि मार्च 2024 में नागपुर स्थित जयसवाल नीको ग्रुप की सहायक कंपनी नीको डिफेंस म्यूनिशंस ने Datasel का अधिग्रहण किया था। इसके बाद एस्टोनिया की रक्षा खरीद प्रक्रिया से जुड़ा यह अनुबंध भारतीय कंपनी समूह से भी जुड़ गया।
यही वजह है कि यूरोप में शुरू हुए इस रक्षा सौदे के विवाद की कड़ी अब नागपुर तक पहुंच गई है।
करीब 770 करोड़ रुपये का था सौदा
यूक्रेन में युद्ध जारी रहने के बीच यूरोपीय देशों पर अपने सहयोगी देश को सैन्य सहायता उपलब्ध कराने का दबाव लगातार बना हुआ है। इसी क्रम में यूरोपीय संघ के European Peace Facility के तहत इस सौदे के लिए फंडिंग की व्यवस्था की गई थी।
रिपोर्टों के अनुसार, अनुबंध का कुल मूल्य लगभग 70 मिलियन यूरो था। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत करीब 770 करोड़ रुपये बैठती है।
हालांकि, बाद में अनुबंध को लेकर विवाद खड़ा हो गया। एस्टोनियाई अधिकारियों ने खरीद प्रक्रिया और अनुबंध के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए, जबकि कंपनी ने सरकार के आरोपों को खारिज किया।
कंपनी ने क्या कहा?
जयसवाल नीको और Datasel की ओर से एस्टोनियाई सरकार के आरोपों का विरोध किया गया है। कंपनी का कहना है कि पूरा विवाद गोला-बारूद की गुणवत्ता में किसी विफलता की वजह से नहीं, बल्कि यूरोपीय नियमों और फंडिंग व्यवस्था में बदलाव के कारण पैदा हुआ।
Datasel ने एस्टोनियाई सरकार के खिलाफ काउंटर-क्लेम भी दाखिल किया है। कंपनी ने अनुबंध को समय से पहले समाप्त किए जाने के लिए मुआवजे की मांग की है।
कंपनी के मुताबिक उसे लगभग 59 मिलियन यूरो का एडवांस मिला था। इसके बदले करीब 58 मिलियन यूरो मूल्य के सामान की डिलीवरी और बिलिंग की जा चुकी थी। कंपनी का यह भी दावा है कि एस्टोनियाई अधिकारियों ने सामान का निरीक्षण किया था।
कंपनी का आरोप है कि बाद में यूरोपीय संघ से मिलने वाली फंडिंग की अवधि समाप्त होने का हवाला देकर एस्टोनिया सरकार ने अनुबंध रद्द कर दिया। इसके चलते तैयार गोला-बारूद का एक बड़ा स्टॉक उपयोग से बाहर रह गया।
क्या था एस्टोनिया सरकार का पक्ष?
दूसरी तरफ, एस्टोनिया की ओर से रक्षा खरीद प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। नेशनल ऑडिट ऑफिस की रिपोर्ट के बाद मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया। इसके साथ ही आपराधिक जांच शुरू होने से सरकार पर दबाव और बढ़ गया।
हालांकि, इस मामले में अंतिम निष्कर्ष और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच तथा कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। कंपनी और एस्टोनियाई अधिकारियों के दावों में महत्वपूर्ण अंतर है, इसलिए विवाद को केवल एक पक्ष के बयान के आधार पर देखना उचित नहीं होगा।
यूक्रेन की जरूरतों से जुड़ा था पूरा मामला
रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी युद्ध में आर्टिलरी गोला-बारूद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। यूक्रेन को पश्चिमी देशों से लगातार सैन्य सहायता मिलती रही है। ऐसे में 155 एमएम के शेल की सप्लाई से जुड़े किसी भी बड़े अनुबंध का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
इसी वजह से एस्टोनिया का यह सौदा भी सामान्य व्यावसायिक अनुबंध नहीं था। इसमें यूरोपीय फंडिंग, यूक्रेन की युद्ध संबंधी जरूरतें, एस्टोनिया की रक्षा खरीद व्यवस्था और एक भारतीय कारोबारी समूह से जुड़ी कंपनी—सभी की कड़ियां एक साथ जुड़ गईं।
एस्टोनिया क्यों महत्वपूर्ण है?
एस्टोनिया यूरोप का छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बाल्टिक देश है। इसकी सीमाएं लातविया और रूस से लगती हैं, जबकि समुद्री सीमा फिनलैंड और स्वीडन के करीब है। रूस के साथ भौगोलिक निकटता के कारण यूक्रेन युद्ध के बाद एस्टोनिया की सुरक्षा चिंताएं और ज्यादा बढ़ी हैं।
देश को अपनी डिजिटल व्यवस्था के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है। सरकारी सेवाओं से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक डिजिटल तकनीक का व्यापक इस्तेमाल एस्टोनिया की पहचान बन चुका है।
इस्तीफे ने बढ़ाई मामले की गंभीरता
रक्षा खरीद से जुड़े विवाद के बीच किसी देश के रक्षा मंत्री का राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना निश्चित तौर पर गंभीर घटनाक्रम माना जा रहा है। खासकर तब, जब मामला यूक्रेन के लिए सैन्य सहायता और यूरोपीय फंडिंग से जुड़ा हो।
अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 770 करोड़ रुपये के इस रक्षा सौदे में आखिर गलती कहां हुई—खरीद प्रक्रिया में, फंडिंग व्यवस्था में या अनुबंध के क्रियान्वयन में?
एक तरफ कंपनी अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बता रही है और मुआवजे की कानूनी लड़ाई लड़ रही है, वहीं एस्टोनिया में ऑडिट रिपोर्ट और आपराधिक जांच ने इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक संकट में बदल दिया है। फिलहाल मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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