Breaking News

गोदामों में कैद हैं 98 हजार करोड़! ऑटो पार्ट्स सेक्टर की इस रिपोर्ट ने खोला ऐसा राज, जिसे जानकर चौंक जाएंगे



नई दिल्ली। भारत के वाहन उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले वाहन कलपुर्जा उद्योग के सामने कार्यशील पूंजी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। देश के ऑटो कंपोनेंट सेक्टर की करीब 98 हजार करोड़ रुपये की पूंजी माल भंडार यानी इन्वेंट्री में फंसी हुई है। उद्योग का मानना है कि अगर इन्वेंट्री का बेहतर प्रबंधन किया जाए तो इस फंसी हुई पूंजी के बड़े हिस्से को दोबारा कारोबार में लगाया जा सकता है।

वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, बेहतर इन्वेंट्री प्रबंधन के जरिए करीब 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये की पूंजी मुक्त की जा सकती है। इसमें से लगभग 4,000 से 5,600 करोड़ रुपये की कार्यशील पूंजी अकेले सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम यानी MSME क्षेत्र से निकल सकती है।

यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के वाहन कलपुर्जा विनिर्माण क्षेत्र में करीब 80 फीसदी हिस्सेदारी MSME कंपनियों की है। ऐसे में इन कंपनियों के लिए माल भंडार में फंसी पूंजी को बाहर निकालना सिर्फ नकदी की समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि भविष्य के विस्तार और नई तकनीक में निवेश के लिए भी अहम साबित हो सकता है।

वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट 'द ब्रोकन फ्लाईव्हील: बिल्डिंग ए फ्यूचर-रेडी ऑटोमोटिव सप्लाई इकोसिस्टम' में भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग की मौजूदा स्थिति और भविष्य की चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन भारतीय कलपुर्जा विनिर्माता संघ यानी ACMA के सहयोग से किया गया है।

98 हजार करोड़ की पूंजी आखिर फंसी कहां है?

वाहन कलपुर्जा उद्योग में कंपनियों को लगातार उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा माल और तैयार माल रखना पड़ता है। मांग में बदलाव, सप्लाई चेन की अनिश्चितता और उत्पादन की योजना में अंतर के कारण कई बार कंपनियों के पास जरूरत से अधिक स्टॉक जमा हो जाता है।

ऐसे में कंपनी की रकम बैंक खाते या नए कारोबार में इस्तेमाल होने के बजाय गोदाम में पड़े माल के रूप में फंसी रहती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग में ऐसी फंसी हुई पूंजी का आकार करीब 98,000 करोड़ रुपये है।

अगर कंपनियां अपनी सप्लाई और इन्वेंट्री व्यवस्था को बेहतर तरीके से संचालित करें तो इस रकम के करीब 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये को कारोबार में वापस लाया जा सकता है।

इसका सीधा फायदा कंपनियों की नकदी स्थिति पर पड़ सकता है। उन्हें अतिरिक्त कर्ज लेने की जरूरत कम हो सकती है और बची हुई रकम को उत्पादन, तकनीक, मशीनरी, अनुसंधान और क्षमता विस्तार में लगाया जा सकता है।

MSME के लिए क्यों बड़ा है यह मुद्दा?

ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में MSME कंपनियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। वाहन बनाने वाली बड़ी कंपनियों के लिए हजारों छोटे और मध्यम सप्लायर अलग-अलग प्रकार के कलपुर्जे उपलब्ध कराते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, वाहन कलपुर्जा विनिर्माताओं में करीब 80 फीसदी हिस्सेदारी MSME क्षेत्र की है। ऐसे में अगर इन कंपनियों की पूंजी लंबे समय तक स्टॉक में फंसी रहती है तो उनकी कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ता है।

रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक इन्वेंट्री सुधार के जरिए MSME क्षेत्र से करीब 4,000 से 5,600 करोड़ रुपये की पूंजी मुक्त की जा सकती है।

यह रकम इन कंपनियों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे वे नई मशीनें खरीदने, कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने, तकनीक अपनाने और उत्पादन प्रक्रिया को आधुनिक बनाने में निवेश कर सकती हैं।

3 लाख करोड़ रुपये के करीब है MSME ऑटो कंपोनेंट कारोबार

अध्ययन में भारतीय वाहन कलपुर्जा क्षेत्र में MSME कंपनियों के कारोबार को भी लेकर महत्वपूर्ण अनुमान सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र की MSME कंपनियों का कुल कारोबार करीब 2.4 से 2.9 लाख करोड़ रुपये के बीच है।

यानी देश के ऑटो कंपोनेंट उद्योग में छोटे और मध्यम उद्यम सिर्फ सप्लायर की भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरे वाहन मूल्य शृंखला का एक बड़ा आर्थिक आधार हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इस क्षेत्र की उत्पादकता में करीब 30 फीसदी सुधार किया जाए तो सालाना 74,000 से 88,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कारोबार हासिल किया जा सकता है।

यह आंकड़ा बताता है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए हर बार नई फैक्ट्री या बड़ी मशीनरी में निवेश करना जरूरी नहीं है। मौजूदा संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके भी कारोबार में बड़ी वृद्धि हासिल की जा सकती है।

कंपनियां 75-85 फीसदी क्षमता पर ही कर रही हैं काम

रिपोर्ट में भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग की क्षमता उपयोग को लेकर भी चिंता जताई गई है। अध्ययन के मुताबिक कारखाने औसतन 75 से 85 फीसदी क्षमता पर काम कर रहे हैं।

यानी कंपनियों के पास उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश पहले से मौजूद है, लेकिन मौजूदा क्षमता का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

सर्वे में शामिल करीब 91 फीसदी उद्योग विशेषज्ञों ने क्षमता को एक बड़ी चुनौती माना। इसका मतलब है कि ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के सामने समस्या केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने की नहीं है, बल्कि उपलब्ध क्षमता को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की भी है।

अगर मौजूदा मशीनरी और उत्पादन व्यवस्था का बेहतर इस्तेमाल किया जाए तो कंपनियां बिना बहुत बड़े अतिरिक्त निवेश के उत्पादन बढ़ा सकती हैं।

95 फीसदी उद्योग प्रमुखों ने जताई चिंता

रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष MSME कंपनियों के निवेश से जुड़ा है। अध्ययन में शामिल करीब 95 फीसदी उद्योग प्रमुखों का मानना है कि MSME कंपनियां भविष्य की वृद्धि के लिए जरूरी क्षमताओं में पर्याप्त तेजी से निवेश नहीं कर रही हैं।

ऑटोमोबाइल उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, सेंसर और नई विनिर्माण तकनीक की तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में कलपुर्जा कंपनियों के लिए केवल मौजूदा उत्पाद बनाते रहना पर्याप्त नहीं होगा।

उन्हें भविष्य की तकनीक और बदलती मांग के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा। इसके लिए मशीनरी, ऑटोमेशन, कौशल और अनुसंधान एवं विकास में निवेश की जरूरत होगी।

लेकिन अगर कंपनियों की पूंजी पहले से ही बड़ी मात्रा में इन्वेंट्री में फंसी है तो उनके लिए नए निवेश के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो सकता है।

मेक इन इंडिया और PLI से मिल सकता है फायदा

भारत सरकार की मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI जैसी योजनाओं ने देश में विनिर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए अवसर पैदा किए हैं। ऑटो और ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र भी इस बदलाव से लाभ उठाने की स्थिति में है।

लेकिन उद्योग विशेषज्ञों के सामने सवाल यह है कि इन अवसरों का पूरा फायदा कैसे उठाया जाए।

रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों को पहले अपनी मौजूदा परिचालन व्यवस्था को मजबूत करना होगा। माल भंडार में फंसी पूंजी को मुक्त करना, उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करना और मौजूदा कारोबार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना इस दिशा में शुरुआती कदम हो सकते हैं।

इसके बाद बची हुई पूंजी को भविष्य की उत्पादन क्षमता और तकनीक में लगाया जा सकता है।

सिर्फ फैक्ट्री बढ़ाना समाधान नहीं

वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के प्रबंध साझेदार रवींद्र पाटकी के मुताबिक चुनौती केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने की नहीं है। भारतीय कंपनियों के पास पहले से मौजूद क्षमता का भी एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

उनके अनुसार, सबसे पहले परिचालन में फंसी पूंजी को बाहर निकालना जरूरी है। इसके बाद मौजूदा कारोबार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करके अतिरिक्त धन को क्षमता विस्तार में लगाया जाना चाहिए।

इसका मतलब यह है कि कंपनियों को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। सिर्फ नई मशीन खरीदने या फैक्ट्री का विस्तार करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

उन्हें यह भी देखना होगा कि गोदाम में कितना माल पड़ा है, उत्पादन की योजना वास्तविक मांग के अनुरूप है या नहीं, सप्लायर से माल कब मंगाया जा रहा है और तैयार माल कितने समय तक स्टॉक में पड़ा रहता है।

'जरूरत के हिसाब से आपूर्ति' मॉडल बन सकता है गेमचेंजर

रिपोर्ट में इन्वेंट्री कम करने के एक प्रभावी तरीके की ओर भी इशारा किया गया है। इसके मुताबिक जो कंपनियां माल खत्म होने के बाद उसकी खपत के आधार पर दोबारा आपूर्ति करती हैं, वे अपने माल भंडार में फंसी पूंजी को आमतौर पर 30 से 40 फीसदी तक कम कर सकती हैं।

यह मॉडल कंपनियों को जरूरत से ज्यादा स्टॉक रखने से बचाता है। इसके जरिए गोदाम में पड़ा माल कम किया जा सकता है और नकदी का इस्तेमाल दूसरे कारोबारी कामों में किया जा सकता है।

हालांकि इसके लिए सप्लाई चेन का बेहतर तालमेल जरूरी होगा। वाहन निर्माता, कलपुर्जा निर्माता और उनके सप्लायर अगर मांग और आपूर्ति से जुड़ा डेटा समय पर साझा करें तो इन्वेंट्री को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

ऑटो उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट?

भारत दुनिया के बड़े ऑटोमोबाइल बाजारों में शामिल है और देश में वाहनों की मांग बढ़ने के साथ ऑटो कंपोनेंट उद्योग की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण हो रही है।

इलेक्ट्रिक वाहनों और नई तकनीक के आने से कलपुर्जा उद्योग में बदलाव और तेज हो गया है। ऐसे में भारतीय कंपनियों को वैश्विक सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका हासिल करने का अवसर मिल सकता है।

लेकिन इसके लिए कंपनियों को लागत, गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और तकनीकी क्षमता के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना होगा।

फंसी हुई पूंजी और कम क्षमता उपयोग इस रास्ते में बड़ी बाधा बन सकते हैं। इसलिए रिपोर्ट का मूल संदेश यही है कि पहले मौजूदा संसाधनों से अधिक उत्पादन और अधिक मूल्य हासिल किया जाए, फिर नई क्षमता में निवेश किया जाए।

आगे क्या करना होगा?

ऑटो कंपोनेंट उद्योग के लिए आने वाला समय अवसर और चुनौती दोनों लेकर आया है। एक तरफ भारत में वाहन निर्माण बढ़ रहा है और वैश्विक कंपनियां देश को अपनी सप्लाई चेन का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी तरफ तकनीक तेजी से बदल रही है।

ऐसे में भारतीय कलपुर्जा कंपनियों को अपनी कार्यशील पूंजी का बेहतर इस्तेमाल करना होगा। इन्वेंट्री कम करना, उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग, डिजिटल सप्लाई चेन, ऑटोमेशन और कर्मचारियों के कौशल में निवेश जैसे कदम महत्वपूर्ण होंगे।

अगर 98 हजार करोड़ रुपये की फंसी हुई पूंजी में से अनुमानित 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये वास्तव में मुक्त किए जा सकें तो यह रकम उद्योग के लिए बड़ा वित्तीय संसाधन बन सकती है।

यानी भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग के सामने चुनौती सिर्फ ज्यादा उत्पादन करने की नहीं है। असली सवाल यह है कि मौजूदा पूंजी और क्षमता का कितना बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि उद्योग इस दिशा में सफल रहता है तो MSME कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ भारत के ऑटो सेक्टर की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी बढ़ सकती है।

कोई टिप्पणी नहीं