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साल के अंत में मौसम मचाएगा तबाही? 70 साल का सबसे ताकतवर ‘सुपर अल नीनो’ भारत के लिए ला सकता है बड़ा संकट!



नई दिल्ली: प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो इस साल के अंत और 2027 की शुरुआत में वैश्विक मौसम के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के ताजा पूर्वानुमानों के मुताबिक 2026 के आखिरी महीनों में अल नीनो के बेहद मजबूत होने की संभावना बढ़ गई है। NOAA के जुलाई के आधिकारिक आकलन में अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान ‘बहुत मजबूत’ अल नीनो की संभावना 81 फीसदी बताई गई थी। एजेंसी ने यह भी कहा है कि यह घटना 1950 के बाद दर्ज किए गए सबसे बड़े अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में निश्चित रूप से सूखा पड़ने वाला है या देश के हर हिस्से में बारिश कम ही होगी। अल नीनो का असर क्षेत्र, मौसम और अन्य समुद्री-वायुमंडलीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। खुद NOAA भी चेतावनी देता है कि मजबूत अल नीनो होने का मतलब हर जगह एक जैसा प्रभाव होना नहीं है।

फिर भी भारत के लिए चिंता की वजह इसलिए है क्योंकि देश का दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रशांत महासागर की ENSO परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है। ऐसे में 2026 के मानसून के अंतिम चरण और उसके बाद आने वाले मौसम पर वैज्ञानिकों की नजर बनी हुई है।

NOAA के पूर्वानुमान ने बढ़ाई चिंता

NOAA के जुलाई 2026 के ENSO आकलन के अनुसार, अल नीनो पहले से मौजूद है और 2026 के अंत तक इसके मजबूत होने का अनुमान है। जुलाई की रिपोर्ट में अक्टूबर से दिसंबर के दौरान बहुत मजबूत अल नीनो की 81 फीसदी संभावना जताई गई थी। इसके अलावा इसके 2027 की शुरुआती वसंत तक बने रहने की संभावना भी 97 फीसदी बताई गई थी।

NOAA के मुताबिक जुलाई की शुरुआत तक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर था। Niño-3.4 क्षेत्र में साप्ताहिक सूचकांक +1.2°C तक पहुंच गया था। ये संकेत बताते हैं कि समुद्र और वायुमंडल के बीच अल नीनो से जुड़ी परिस्थितियां मजबूत हो रही थीं।

यही वजह है कि वैज्ञानिक 2026 के अंतिम महीनों को लेकर खास तौर पर सतर्क हैं।

आखिर अल नीनो होता क्या है?

अल नीनो को आसान भाषा में समझें तो यह प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने और उससे जुड़ी वायुमंडलीय परिस्थितियों का बदलाव है।

सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं गर्म सतही पानी को पश्चिमी प्रशांत की ओर धकेलती हैं। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं तो मध्य और पूर्वी प्रशांत में समुद्र की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म होने लगता है।

इस समुद्री गर्मी का असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। इससे वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आ सकता है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और तूफानी गतिविधियों के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

यही कारण है कि अल नीनो को केवल समुद्र की घटना नहीं, बल्कि वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करने वाली जलवायु घटना माना जाता है।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल—मानसून

भारत के लिए अल नीनो की चर्चा सबसे ज्यादा मानसून को लेकर होती है। ऐतिहासिक रूप से कई मजबूत अल नीनो घटनाओं के दौरान भारतीय मानसून कमजोर रहा है, हालांकि हर अल नीनो वर्ष में ऐसा होना जरूरी नहीं है।

इस साल भी मानसून की शुरुआत से पहले भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने कमजोर मानसून की आशंका जताई थी। मई 2026 के अपने अपडेटेड लॉन्ग-रेंज पूर्वानुमान में IMD ने जून-सितंबर के पूरे मानसून सीजन में देशभर की बारिश को दीर्घावधि औसत की लगभग 90 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था, जिसमें ±4 फीसदी का मॉडल एरर बताया गया था। विभाग ने मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत तथा मानसून कोर जोन के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई थी।

इससे साफ है कि भारत के मौसम वैज्ञानिक पहले से ही 2026 के मानसून को लेकर सतर्क थे।

लेकिन क्या अब भारत में सूखा तय है?

नहीं। यह बात समझना बेहद जरूरी है।

अल नीनो मजबूत होने का मतलब यह नहीं कि भारत में निश्चित रूप से सूखा पड़ेगा। मानसून पर सिर्फ ENSO का प्रभाव नहीं होता। हिंद महासागर की परिस्थितियां, इंडियन ओशन डायपोल यानी IOD, मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन और अन्य वायुमंडलीय प्रणालियां भी भारतीय बारिश को प्रभावित करती हैं।

IMD ने भी अपने पूर्वानुमानों में ENSO के साथ IOD को महत्वपूर्ण कारक माना है। अप्रैल 2026 में विभाग ने कहा था कि प्रशांत में अल नीनो विकसित होने की संभावना के साथ मानसून के अंतिम चरण में पॉजिटिव IOD विकसित होने का अनुमान है।

यानी एक तरफ अल नीनो मानसून के लिए दबाव बढ़ा सकता है, तो दूसरी तरफ हिंद महासागर की अनुकूल परिस्थितियां उसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती हैं।

IOD से मिल सकती है भारत को राहत

Indian Ocean Dipole यानी IOD हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री तापमान में अंतर से जुड़ी जलवायु घटना है।

जब पॉजिटिव IOD की स्थिति बनती है तो इसके कारण भारतीय मानसून पर कुछ परिस्थितियों में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक अल नीनो के साथ-साथ IOD की स्थिति पर भी नजर रखते हैं।

IMD के अप्रैल के ENSO-IOD बुलेटिन में कहा गया था कि उस समय IOD न्यूट्रल था, लेकिन मॉडल सकारात्मक IOD के मानसून के अंतिम हिस्से में विकसित होने की संभावना दिखा रहे थे।

इसलिए आने वाले महीनों में केवल प्रशांत महासागर का तापमान देखना पर्याप्त नहीं होगा। हिंद महासागर की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

खेती पर पड़ सकता है सीधा असर

भारत की कृषि व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है। खासकर वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों में जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश फसल उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।

अगर किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश कम रहती है तो मिट्टी में नमी घट सकती है। इससे धान, दालें, तिलहन और दूसरी खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। सिंचाई की सुविधा वाले इलाकों में किसान कुछ हद तक स्थिति संभाल सकते हैं, लेकिन पूरी तरह मानसून पर निर्भर क्षेत्रों में जोखिम ज्यादा रहता है।

हालांकि, यहां भी पूरे देश के लिए एक ही तस्वीर बनाना सही नहीं होगा। किसी राज्य में कम बारिश हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में सामान्य या अधिक बारिश हो सकती है।

इसलिए अल नीनो को देशव्यापी सूखे की सीधी भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मौसम में अचानक बदलाव क्यों संभव?

अल नीनो के मजबूत होने पर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान और वर्षा के पैटर्न सामान्य से अलग हो सकते हैं।

कहीं गर्मी ज्यादा पड़ सकती है तो कहीं बारिश का वितरण बदल सकता है। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं।

यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल कुल बारिश का आंकड़ा नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि बारिश कहां, कब और कितनी तीव्रता से हो रही है।

2026 के अंत में क्यों बढ़ेगी चिंता?

NOAA के पूर्वानुमान के मुताबिक अल नीनो का प्रभाव 2026 के अंत तक और मजबूत हो सकता है। अक्टूबर-दिसंबर के दौरान बहुत मजबूत अल नीनो की संभावना 81 फीसदी बताई गई है।

भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून का मुख्य मौसम जून से सितंबर तक रहता है। इसलिए अल नीनो के सबसे मजबूत चरण का समय मानसून के अंतिम हिस्से के बाद या उसके आसपास पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत पर इसका सीधा असर कितना होगा, यह अभी निश्चित रूप से कहना जल्दबाजी होगी।

IMD के अनुसार भारत से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी भी चरणबद्ध तरीके से होती है और उत्तर-पश्चिम भारत से वापसी की प्रक्रिया आमतौर पर सितंबर से पहले शुरू नहीं मानी जाती।

इसलिए आने वाले हफ्तों में मौसम का वास्तविक रुझान काफी महत्वपूर्ण रहेगा।

क्या यह 1950 के बाद का सबसे ताकतवर अल नीनो होगा?

इस दावे को थोड़ा सावधानी से समझना जरूरी है। NOAA के जुलाई पूर्वानुमान में कहा गया था कि अक्टूबर-दिसंबर 2026 का संभावित बहुत मजबूत अल नीनो 1950 के बाद के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में सबसे बड़े घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है। यह कहना कि यह निश्चित रूप से 1950 के बाद का सबसे शक्तिशाली अल नीनो होगा, अभी वैज्ञानिक पूर्वानुमान से ज्यादा मजबूत दावा होगा।

NOAA के आधिकारिक strength probabilities में अक्टूबर-दिसंबर के लिए बहुत मजबूत श्रेणी की संभावना 81 फीसदी तक पहुंचती है।

यानी खतरा वास्तविक है, लेकिन इसकी अंतिम तीव्रता अभी भी मौसम मॉडल और समुद्री परिस्थितियों के साथ बदल सकती है।

भारत को अभी क्या करना चाहिए?

मौसम विशेषज्ञों के लिए सबसे जरूरी चीज लगातार निगरानी है। किसानों के लिए भी मौसम आधारित सलाह महत्वपूर्ण होगी। यदि किसी क्षेत्र में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना हो तो फसल चयन, सिंचाई, बुवाई और जल संरक्षण से जुड़े फैसले स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर लिए जा सकते हैं।

सरकार के लिए भी जलाशयों, सिंचाई व्यवस्था, कृषि सलाह और सूखा प्रबंधन की तैयारियां महत्वपूर्ण होंगी।

शहरी इलाकों में भी पानी की उपलब्धता पर नजर रखना जरूरी हो सकता है, खासकर अगर लंबे समय तक बारिश कम रहती है।

फिलहाल घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत

प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो निश्चित रूप से 2026 के अंत की सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक मौसम घटनाओं में से एक बन सकता है। NOAA के अनुसार इसके बहुत मजबूत होने की संभावना काफी बढ़ चुकी है और यह 1950 के बाद के सबसे बड़े अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।

भारत के लिए इसका असर मुख्य रूप से मानसून, तापमान और कृषि परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में सूखा निश्चित है। अल नीनो के साथ IOD और दूसरी मौसम प्रणालियां भी भूमिका निभाएंगी।

यानी आने वाले महीने बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रशांत महासागर में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ समुद्र तक सीमित कहानी नहीं रह गई है—इसके संकेत भारत के खेतों, पानी के भंडार और आने वाले मौसम तक पहुंच सकते हैं। असली तस्वीर तब साफ होगी जब 2026 के अंतिम महीनों में अल नीनो अपनी संभावित चरम ताकत के करीब पहुंचेगा।

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