15 अगस्त के बाद संसद में होगा सबसे बड़ा सियासी धमाका? बदल सकती है लोकसभा की पूरी तस्वीर!
नई दिल्ली। देश की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित संविधान संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी में जुटी हुई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि संसद का मौजूदा मानसून सत्र समाप्त होने के तुरंत बाद सत्रावसान नहीं किया जाएगा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर बहुत कम समय में एक विशेष सत्र बुलाया जा सके।
सूत्रों के अनुसार यदि सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का भरोसा हासिल कर लेती है, तो तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर इन महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद से पारित कराने की कोशिश की जा सकती है। यह कदम देश की संसदीय राजनीति में लंबे समय तक असर डालने वाला माना जा रहा है।
क्या है सरकार की रणनीति?
सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इस मुद्दे पर विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस, से सहमति बनाने का प्रयास कर रही है। बताया जा रहा है कि सरकार चाहती है कि मानसून सत्र समाप्त होने के बाद 16, 17 और 18 अगस्त को विशेष सत्र बुलाया जाए, जिसमें परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों पर चर्चा और मतदान कराया जा सके।
हालांकि कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर तुरंत सहमति नहीं दी है। पार्टी का कहना है कि वह पहले अपने सहयोगी दलों और विपक्षी गठबंधन के अन्य नेताओं से चर्चा करेगी, उसके बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
इस बीच राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकार इस बार विपक्ष को साथ लेकर आगे बढ़ेगी या फिर संख्या बल के आधार पर विधेयक पारित कराने की कोशिश करेगी।
राहुल गांधी और किरेन रिजिजू की अहम मुलाकात
संसद में जारी गतिरोध समाप्त करने के उद्देश्य से संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। यह बैठक करीब 50 मिनट तक चली, जिसमें कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी भी मौजूद रहीं।
सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान सरकार की ओर से परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों पर कांग्रेस के सहयोग की मांग की गई।
हालांकि राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया कि संसद की कार्यवाही सामान्य रूप से चलाने के लिए सरकार को पहले विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों पर जवाब देना होगा। बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और चंदा चोरी से जुड़े मामलों पर गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग दोहराई।
बैठक में दोनों पक्षों ने संसद में जारी गतिरोध और उसे समाप्त करने के संभावित विकल्पों पर भी चर्चा की।
परिसीमन को लेकर पहले भी हुआ था विरोध
परिसीमन का मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले भी विपक्ष इस प्रस्ताव का विरोध करता रहा है।
अप्रैल में कई विपक्षी दलों ने यह चिंता जताई थी कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत और छोटे राज्यों की संसद में भागीदारी कम हो सकती है। उनका कहना था कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने से कुछ राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घट सकता है।
हालांकि केंद्र सरकार ने उस समय भरोसा दिलाया था कि सभी राज्यों के साथ संतुलित व्यवहार किया जाएगा और सीटों की संख्या बढ़ाते समय मौजूदा अनुपात को ध्यान में रखा जाएगा। इसके बावजूद विपक्ष पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ था।
50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?
सूत्रों का दावा है कि सरकार अब परिसीमन विधेयक में एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ सकती है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का स्पष्ट उल्लेख किया जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सीटों में पर्याप्त वृद्धि की जाती है, तो उन राज्यों की आशंकाएं कम हो सकती हैं जिन्हें अपनी हिस्सेदारी घटने का डर है।
यदि वर्तमान सांसदों और विधायकों की संख्या में व्यापक वृद्धि होती है, तो तेजी से बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी बेहतर हो सकता है।
हालांकि इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय संसद में होने वाली चर्चा और राजनीतिक सहमति के बाद ही सामने आएगा।
महिला आरक्षण को लेकर क्या हो सकता है बदलाव?
महिला आरक्षण देश की राजनीति का लंबे समय से चर्चा में रहने वाला विषय है।
सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित संशोधन में यह व्यवस्था की जा सकती है कि अगले लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए।
यदि ऐसा होता है तो संसद और कई विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच सकती है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं की अधिक भागीदारी से नीति निर्माण में नए दृष्टिकोण जुड़ सकते हैं और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित बन सकता है।
सरकार के सामने कौन-कौन से विकल्प हैं?
सूत्रों के मुताबिक सरकार फिलहाल दो प्रमुख विकल्पों पर विचार कर रही है।
पहला विकल्प यह है कि विपक्ष के साथ सहमति बनाकर मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह में ही परिसीमन और महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पेश कर दिया जाए।
दूसरा विकल्प यह माना जा रहा है कि 15 अगस्त के बाद संसद का कार्यकाल कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ाया जाए या फिर अलग से विशेष सत्र बुलाया जाए, ताकि इन विधेयकों पर विस्तृत चर्चा और मतदान कराया जा सके।
इन दोनों विकल्पों पर अंतिम फैसला राजनीतिक परिस्थितियों और आवश्यक समर्थन मिलने के बाद लिया जाएगा।
दो-तिहाई बहुमत क्यों जरूरी है?
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव यदि संविधान संशोधन के रूप में लाए जाते हैं, तो उन्हें पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
इसका अर्थ है कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या का भी आवश्यक बहुमत मिलना चाहिए।
यही कारण है कि सरकार विपक्षी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों से लगातार बातचीत कर रही है।
क्षेत्रीय दलों की भूमिका होगी अहम
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में क्षेत्रीय दल निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
यदि सरकार सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का स्पष्ट प्रावधान विधेयक में शामिल करती है, तो कुछ ऐसे दल भी समर्थन देने पर विचार कर सकते हैं जो पहले परिसीमन का विरोध कर रहे थे।
हालांकि कई दल अभी भी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किसी भी राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो और संघीय ढांचे का संतुलन बना रहे।
देश की राजनीति पर क्या होगा असर?
यदि सरकार इन संशोधनों को संसद से पारित कराने में सफल होती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे बड़े संसदीय बदलावों में से एक माना जाएगा।
लोकसभा और विधानसभा सीटों में वृद्धि से प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदल सकता है। वहीं महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने से संसद की संरचना में भी बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
हालांकि इन प्रस्तावों पर अंतिम फैसला संसद की बहस, राजनीतिक सहमति और मतदान के बाद ही होगा।
देश की निगाहें अब संसद के आगामी घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। केंद्र सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाने में लगी है। कांग्रेस समेत विपक्ष से बातचीत जारी है और विशेष सत्र बुलाने की संभावना भी चर्चा में है।
यदि सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लेती है, तो आने वाले दिनों में संसद में ऐसा ऐतिहासिक फैसला देखने को मिल सकता है जो देश की चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की दिशा बदल सकता है। फिलहाल सभी राजनीतिक दलों की रणनीति और संसद के अगले कदम पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।

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