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ISRO के हाथ से निकलेगी रॉकेट बनाने की कमान? प्राइवेट कंपनियों को सौंपे जा रहे राज, अंतरिक्ष सेक्टर में आने वाला है बड़ा उलटफेर



नई दिल्ली: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO आने वाले समय में रॉकेट और कुछ नियमित सैटेलाइट के निर्माण जैसे कामों को धीरे-धीरे निजी उद्योग की ओर ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके बदले ISRO का फोकस रिसर्च एंड डेवलपमेंट, नई अंतरिक्ष तकनीकों, वैज्ञानिक मिशनों और महत्वपूर्ण स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर बढ़ सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ISRO रॉकेट लॉन्च करना या अंतरिक्ष मिशन चलाना बंद कर देगा। असल बदलाव नियमित उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने से जुड़ा है। ISRO अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल नई तकनीक विकसित करने और जटिल मिशनों को आगे बढ़ाने में कर सकता है, जबकि निजी उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन और कमर्शियल लॉन्च सेवाओं को संभाल सकता है।

ISRO की भूमिका में क्यों हो रहा बड़ा बदलाव?

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम पिछले कुछ दशकों में काफी तेजी से आगे बढ़ा है। चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-L1 और गगनयान जैसे मिशनों ने भारत की क्षमता को दुनिया के सामने रखा है। लेकिन जैसे-जैसे अंतरिक्ष गतिविधियों का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ISRO के सामने नई जिम्मेदारियां भी बढ़ रही हैं।

ऐसे में नियमित रूप से रॉकेट बनाने और सैटेलाइट तैयार करने का काम यदि उद्योग को सौंपा जाता है तो ISRO के वैज्ञानिक और इंजीनियर अधिक उन्नत तकनीकों और वैज्ञानिक मिशनों पर ध्यान दे सकते हैं।

IN-SPACe के चेयरमैन डॉ. पवन कुमार गोयनका ने इसी दिशा में बदलाव की जानकारी दी है। उनके अनुसार, ISRO को धीरे-धीरे एक ऐसे R&D संगठन के रूप में विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है जो नई तकनीक और स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा ध्यान दे।

SSLV से शुरू हो चुका है बदलाव

निजी क्षेत्र को तकनीक सौंपने की प्रक्रिया की सबसे बड़ी शुरुआत Small Satellite Launch Vehicle यानी SSLV से हो चुकी है।

SSLV को खास तौर पर छोटे सैटेलाइट को तेजी से लॉन्च करने के लिए विकसित किया गया है। इसे छोटे उपग्रहों को लो अर्थ ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।

तकनीक के निजी क्षेत्र तक पहुंचने के बाद इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल संभव हो सकेगा। इससे छोटे सैटेलाइट लॉन्च करने वाली कंपनियों और ग्राहकों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

अब PSLV और LVM3 की भी बारी?

SSLV के बाद अगला बड़ा कदम PSLV और LVM3 को लेकर हो सकता है।

PSLV भारत का बेहद भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल रहा है और इसका इस्तेमाल पृथ्वी अवलोकन, नेविगेशन, संचार तथा वैज्ञानिक मिशनों के लिए किया गया है। वहीं LVM3 भारत का सबसे शक्तिशाली परिचालन रॉकेट है और इसे गगनयान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों के लिए भी इस्तेमाल किया जाना है।

इन प्रक्षेपण यानों के निर्माण में उद्योग की भूमिका बढ़ाने की दिशा में तैयारी चल रही है। इससे भविष्य में बड़े पैमाने पर रॉकेट उत्पादन और कमर्शियल लॉन्च सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है।

प्राइवेट कंपनियों को मिलेगा बड़ा बाजार

अगर रॉकेट निर्माण का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों के हाथ में आता है तो इससे भारत के स्पेस सेक्टर में एक बड़ा कमर्शियल बाजार विकसित हो सकता है।

निजी कंपनियां सिर्फ ISRO के लिए रॉकेट बनाने तक सीमित नहीं रहेंगी। भविष्य में वे अपने ग्राहकों के लिए लॉन्च सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं, विदेशी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेज सकती हैं और अपनी तकनीक का अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस्तेमाल कर सकती हैं।

इससे भारत के लिए स्पेस लॉन्च सर्विस, सैटेलाइट निर्माण, स्पेस डेटा और कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में नए कारोबारी अवसर पैदा हो सकते हैं।

सैटेलाइट से भी कमाई का बढ़ेगा रास्ता

बदलाव केवल रॉकेट तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां सैटेलाइट बनाने और उन्हें संचालित करने में भी बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

उदाहरण के लिए, कोई कंपनी पृथ्वी की तस्वीरें लेने वाले सैटेलाइट का नेटवर्क तैयार कर सकती है। इन सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल कृषि, मौसम, शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन, खनन और इंश्योरेंस जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

इसी तरह कम्युनिकेशन सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट और दूसरी सेवाओं के लिए भी बड़ा बाजार तैयार हो सकता है।

यानी भविष्य में रॉकेट लॉन्च से लेकर सैटेलाइट डेटा तक पूरी वैल्यू चेन में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ सकती है।

120 तकनीकों के ट्रांसफर की बात

डॉ. पवन गोयनका ने निजी क्षेत्र को तकनीक ट्रांसफर किए जाने को लेकर भी जानकारी दी है। उनके मुताबिक, अब तक करीब 120 तकनीकों को निजी क्षेत्र तक पहुंचाया गया है।

यह प्रक्रिया केवल रॉकेट तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष से जुड़ी कई तकनीकों को उद्योग के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराने का उद्देश्य यह है कि सरकारी संस्थानों द्वारा विकसित तकनीक बड़े स्तर पर व्यावसायिक उपयोग में लाई जा सके।

SSLV को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

भारत में बढ़ रहे स्पेस स्टार्टअप

इस बदलाव के पीछे भारत में तेजी से बढ़ता निजी स्पेस इकोसिस्टम भी एक बड़ी वजह है।

देश में कई स्पेस टेक्नोलॉजी स्टार्टअप रॉकेट, सैटेलाइट, इंजन, स्पेस डेटा और पृथ्वी अवलोकन जैसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

इन कंपनियों में कोई रॉकेट इंजन पर काम कर रहा है, कोई सैटेलाइट बना रहा है तो कोई स्पेस डेटा और पृथ्वी अवलोकन से जुड़ी सेवाएं विकसित कर रहा है।

यह पूरा इकोसिस्टम आने वाले समय में भारत को एक बड़े कमर्शियल स्पेस हब के रूप में विकसित करने में मदद कर सकता है।

ISRO क्या करेगा फिर?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर निजी कंपनियां रॉकेट और सैटेलाइट बनाएंगी तो ISRO की भूमिका क्या रह जाएगी?

इसका जवाब है—ISRO की भूमिका खत्म नहीं होगी, बल्कि और ज्यादा रणनीतिक हो सकती है।

ISRO नई पीढ़ी के रॉकेट, पुन: उपयोग योग्य लॉन्च व्हीकल, मानव अंतरिक्ष उड़ान, ग्रहों के मिशन, डीप स्पेस रिसर्च, नई propulsion technology और दूसरे अत्याधुनिक सिस्टम पर काम कर सकता है।

सरल शब्दों में कहें तो निजी कंपनियां “बनाने और बेचने” पर ज्यादा ध्यान देंगी, जबकि ISRO “नई तकनीक बनाने और मिशन विकसित करने” पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकता है।

LVM3 और गगनयान के कारण ISRO की भूमिका अभी भी अहम

यह भी समझना जरूरी है कि LVM3 जैसे रॉकेट सिर्फ कमर्शियल लॉन्च के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। LVM3 भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान से भी जुड़ा है।

इसलिए ISRO पूरी तरह लॉन्च व्हीकल से बाहर नहीं जा सकता। महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और रणनीतिक मिशनों में संगठन की तकनीकी भूमिका बनी रहेगी।

भविष्य में भी ISRO ऐसे मिशनों के लिए डिजाइन, तकनीक, परीक्षण और मिशन संचालन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है।

भारत की स्पेस इकोनॉमी को मिलेगा बड़ा फायदा

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा भारत की स्पेस इकोनॉमी को हो सकता है।

अगर निजी कंपनियां बड़े स्तर पर रॉकेट और सैटेलाइट बनाने लगती हैं तो उत्पादन बढ़ेगा, लागत कम करने की संभावना बनेगी और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए प्रतिस्पर्धी सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं।

भारत पहले से ही कम लागत में अंतरिक्ष मिशन पूरा करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी इस क्षमता को व्यावसायिक रूप से और आगे ले जा सकती है।

चुनौतियां भी कम नहीं होंगी

हालांकि, निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़ी जिम्मेदारी देना आसान नहीं है। रॉकेट निर्माण बेहद जटिल और जोखिम भरा काम है। किसी छोटी तकनीकी गलती से पूरा मिशन असफल हो सकता है।

इसके अलावा सुरक्षा, गुणवत्ता नियंत्रण, निवेश, बीमा, नियामकीय मंजूरी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां भी रहेंगी।

इसलिए निजी क्षेत्र को जिम्मेदारी देने के साथ सरकार और ISRO को तकनीकी मानकों और सुरक्षा व्यवस्था पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखना होगा।

क्या सच में बदल जाएगा भारत का अंतरिक्ष मॉडल?

ताजा घटनाक्रम से संकेत मिल रहे हैं कि भारत धीरे-धीरे अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक नए मॉडल की तरफ ले जा रहा है। इस मॉडल में ISRO रिसर्च और अत्याधुनिक तकनीक का केंद्र होगा, जबकि निजी कंपनियां उत्पादन, लॉन्च और कमर्शियल सेवाओं में बड़ी भूमिका निभाएंगी।

SSLV की तकनीक का निजी क्षेत्र तक पहुंचना इस बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं PSLV और LVM3 जैसे बड़े लॉन्च व्हीकल के निर्माण में उद्योग की भूमिका बढ़ाने की दिशा में भी तैयारी चल रही है।

यानी ISRO का रॉकेट निर्माण से धीरे-धीरे पीछे हटना किसी अंत की कहानी नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत हो सकता है। आने वाले समय में भारत में ऐसे रॉकेट और सैटेलाइट निजी कंपनियां बना सकती हैं, जिनके जरिए देश न केवल अपने मिशन पूरे करेगा, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों के लिए भी अंतरिक्ष सेवाओं का बड़ा बाजार बन सकता है।

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