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सोने-चांदी में अचानक क्यों मचा हाहाकार? ₹6,000 से ज्यादा टूटा सोना, सितंबर में फेड के फैसले से आएगा बड़ा मोड़!



अगस्त का आखिरी हफ्ता सोने और चांदी के निवेशकों के लिए भारी उतार-चढ़ाव वाला रहा। एक तरफ जहां कुछ दिन पहले तक सोना रिकॉर्ड ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा था, वहीं सप्ताह के अंत तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख, महंगाई के ऊंचे आंकड़ों और मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ा दिया।

सबसे बड़ा झटका शुक्रवार यानी 28 अगस्त को देखने को मिला। फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श के जैक्सन होल भाषण के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत तेजी से नीचे आई। वॉर्श ने महंगाई को लेकर सख्त रुख अपनाया और संकेत दिया कि अगर महंगाई 2 फीसदी के लक्ष्य की तरफ पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ती है, तो फेड को आगे सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।

इस बयान के बाद अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में मजबूती देखने को मिली। सोने के लिए यह संकेत नकारात्मक माना गया, क्योंकि ऊंची ब्याज दरें आम तौर पर बिना ब्याज वाले निवेश यानी सोने की आकर्षकता को कम करती हैं।

भारत में भी इसका असर MCX पर दिखाई दिया। 28 अगस्त को अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना करीब ₹1,56,281 प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। एक ही दिन में इसकी कीमत करीब ₹2,600 नीचे आ गई। पूरे सप्ताह में सोने की गिरावट इससे भी ज्यादा रही।

चांदी की स्थिति भी अलग नहीं रही। सितंबर डिलीवरी वाली चांदी 28 अगस्त को करीब ₹2,36,704 प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। यानी सप्ताह के दौरान चांदी में भी हजारों रुपये की गिरावट देखने को मिली।

MCX पर सोना कितने रुपये टूटा?

MCX के आंकड़ों के मुताबिक 21 अगस्त को सोने का भाव करीब ₹1,62,438 प्रति 10 ग्राम था। इसके मुकाबले 28 अगस्त को कीमत करीब ₹1,56,281 रही।

यानी केवल एक सप्ताह में MCX पर सोना लगभग ₹6,157 प्रति 10 ग्राम सस्ता हो गया।

प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह करीब 3.79 फीसदी की गिरावट है।

सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह है कि गिरावट के बावजूद सोना अभी भी बेहद ऊंचे स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसका मतलब है कि बाजार में अब तेजी और गिरावट दोनों ही काफी तेज हो सकती हैं।

यही वजह है कि सोने में निवेश करने वालों की नजर अब सितंबर के अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले पर टिक गई है।

चांदी में भी आया बड़ा भूचाल

सोने के साथ चांदी ने भी निवेशकों को निराश किया।

28 अगस्त को सितंबर डिलीवरी वाली चांदी करीब ₹2,36,704 प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। पिछले सप्ताह की तुलना में इसकी कीमत करीब ₹9,893 प्रति किलोग्राम कम हो गई।

यानी चांदी में लगभग 4 फीसदी की साप्ताहिक गिरावट देखने को मिली।

चांदी पर सोने की तरह ही डॉलर और अमेरिकी ब्याज दरों का असर पड़ता है, लेकिन इसके अलावा औद्योगिक मांग भी इसकी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए चांदी की चाल कई बार सोने से ज्यादा तेज हो सकती है।

IBJA के बाजार में भी नरमी

भारतीय सर्राफा बाजार में भी सप्ताह के दौरान सोने की कीमत में कमजोरी देखी गई।

28 अगस्त को 24 कैरेट यानी 999 शुद्धता वाले सोने का भाव करीब ₹1,59,578 प्रति 10 ग्राम रहा। सप्ताह की शुरुआत में यह लगभग ₹1,62,603 के स्तर पर था।

इस तरह सप्ताह के दौरान हाजिर बाजार में भी सोना करीब ₹3,025 प्रति 10 ग्राम नीचे आया।

वहीं 999 शुद्धता वाली चांदी करीब ₹2,43,892 प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। पिछले सप्ताह के अंत में यह करीब ₹2,46,630 के आसपास थी।

इस तरह भारतीय हाजिर बाजार में भी चांदी करीब ₹2,738 प्रति किलोग्राम फिसली।

हालांकि सर्राफा बाजार में आभूषणों की अंतिम कीमत इससे अलग हो सकती है। इसमें GST, मेकिंग चार्ज और अन्य लागतें जुड़ती हैं।

असल खेल अमेरिका से शुरू हुआ

अब सवाल है कि आखिर सोना अचानक इतना क्यों गिरा?

इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका से आए महंगाई और मौद्रिक नीति से जुड़े संकेत हैं।

अमेरिका में जुलाई के Personal Consumption Expenditures यानी PCE Price Index में सालाना आधार पर 3.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा फेड के 2 फीसदी महंगाई लक्ष्य से काफी ऊपर है। Core PCE भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

यानी फेड के सामने महंगाई अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

जब महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाता है। जरूरत पड़ने पर वह ब्याज दर बढ़ाने का विकल्प भी खुला रख सकता है।

यही बात बाजार के लिए सोने के खिलाफ गई।

केविन वॉर्श के भाषण ने बदला पूरा माहौल

28 अगस्त को जैक्सन होल में फेड चेयरमैन केविन वॉर्श ने अपना पहला बड़ा भाषण दिया। उन्होंने साफ संकेत दिया कि फेड के लिए महंगाई अभी भी गंभीर चिंता का विषय है।

वॉर्श का संदेश बाजार के लिए यह था कि केंद्रीय बैंक को महंगाई के मोर्चे पर जल्दबाजी में नरमी नहीं दिखानी चाहिए।

बाजार ने इस बयान को हॉकिश यानी सख्त मौद्रिक नीति के संकेत के रूप में लिया।

भाषण के बाद सितंबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना को लेकर चर्चा तेज हो गई। इसी वजह से सोने में अचानक बिकवाली बढ़ी।

ब्याज दर बढ़ने से सोना क्यों गिरता है?

सोना अपने आप में ब्याज नहीं देता। यानी अगर कोई निवेशक सोना खरीदकर रखता है तो उसे उस संपत्ति पर नियमित ब्याज नहीं मिलता।

दूसरी तरफ अमेरिकी सरकारी बॉन्ड जैसे निवेश विकल्प ब्याज देते हैं।

जब अमेरिकी ब्याज दरें कम होती हैं तो बॉन्ड का आकर्षण अपेक्षाकृत कम हो सकता है। ऐसे समय में निवेशक सोने की तरफ ज्यादा आकर्षित हो सकते हैं।

लेकिन जब ब्याज दर बढ़ने की संभावना बनती है, तो बॉन्ड और डॉलर ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं।

यही वजह है कि फेड की सख्त नीति की संभावना बढ़ते ही निवेशकों ने सोने में मुनाफावसूली शुरू कर दी।

डॉलर मजबूत हुआ तो सोने को क्यों नुकसान?

सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमत डॉलर में तय होती है।

जब डॉलर मजबूत होता है तो दुनिया की दूसरी करेंसी रखने वाले खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है। इससे सोने की मांग पर दबाव आ सकता है।

फेड के सख्त रुख के बाद डॉलर में मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी देखने को मिली। इसके साथ ही सोने पर दबाव बढ़ा।

यानी एक भाषण ने सिर्फ सोने को नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों के कई हिस्सों को प्रभावित किया।

सोने में पहले इतनी तेजी क्यों आई थी?

यह भी समझना जरूरी है कि सोना गिरने से पहले इतनी तेजी से चढ़ क्यों रहा था।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना इस सप्ताह की शुरुआत में करीब 4,696 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक पहुंच गया था। निवेशकों के बीच वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को लेकर चिंताएं थीं।

केंद्रीय बैंकों की खरीद और सुरक्षित निवेश की मांग ने भी सोने को समर्थन दिया।

लेकिन 28 अगस्त के बाद बाजार में ब्याज दरों को लेकर उम्मीद बदल गई और सोने की तेजी पर ब्रेक लग गया।

क्या यह सिर्फ एक अस्थायी गिरावट है?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सोने की लंबी तेजी खत्म हो गई है।

सोने की कीमत पर अमेरिकी ब्याज दरों के अलावा कई दूसरे कारक भी असर डालते हैं। दुनिया में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव, केंद्रीय बैंकों की खरीद, डॉलर की दिशा, महंगाई और निवेशकों की सुरक्षित संपत्ति की मांग सोने को आगे भी समर्थन दे सकती है।

इसलिए संभव है कि मौजूदा गिरावट के बाद सोने में फिर तेजी लौटे।

लेकिन फिलहाल बाजार में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर आया है—पहले निवेशक फेड से नरमी की उम्मीद कर रहे थे, अब उन्हें सख्ती की संभावना दिखाई दे रही है।

यही बदलाव सोने के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

सितंबर में क्या होने वाला है?

अब सबकी नजर सितंबर की फेड बैठक पर है।

हालांकि वॉर्श के भाषण के बाद बाजार ने ब्याज दर बढ़ने की संभावना को बढ़ा दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सितंबर में दर निश्चित रूप से बढ़ेगी।

आगे आने वाले अमेरिकी रोजगार, महंगाई और अन्य आर्थिक आंकड़े अंतिम फैसला प्रभावित करेंगे।

इसलिए अगले कुछ सप्ताह सोने और चांदी के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे।

अगर अमेरिकी महंगाई और रोजगार के आंकड़े मजबूत बने रहते हैं, तो फेड की सख्त नीति की संभावना बढ़ सकती है। इससे डॉलर मजबूत हो सकता है और सोने पर दबाव जारी रह सकता है।

लेकिन अगर आर्थिक आंकड़ों में कमजोरी आती है, तो दर बढ़ाने की संभावना घट सकती है। ऐसी स्थिति में सोने और चांदी को फिर से मजबूती मिल सकती है।

MCX पर अब इन स्तरों पर नजर

घरेलू बाजार में सोने के लिए ₹1.56 लाख के आसपास का क्षेत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके नीचे कमजोरी बढ़ने पर ₹1.55 लाख के आसपास अगला सहारा देखा जा सकता है।

दूसरी तरफ तेजी लौटने पर ₹1.59 लाख से ₹1.60 लाख का क्षेत्र महत्वपूर्ण रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी करीब 4,500-4,470 डॉलर प्रति औंस का क्षेत्र नीचे की तरफ महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जबकि ऊपर की तरफ 4,600-4,630 डॉलर का क्षेत्र बड़ी चुनौती बन सकता है।

ये स्तर बाजार की मौजूदा तकनीकी स्थिति पर आधारित हैं और इनमें तेजी से बदलाव हो सकता है।

निवेशकों के लिए क्या है सबक?

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच चुके सोने में अब जोखिम भी बढ़ गया है।

सिर्फ इसलिए कि सोना पिछले कुछ महीनों में तेजी से बढ़ा है, यह जरूरी नहीं कि कीमत लगातार ऊपर ही जाएगी। अमेरिकी फेड की नीति में बदलाव कुछ ही घंटों में बाजार की दिशा बदल सकता है।

इसी तरह कमजोर अमेरिकी आर्थिक आंकड़े या बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव सोने को दोबारा तेजी दे सकता है।

इसलिए सोने और चांदी में निवेश करने वालों के लिए आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण है।

अगस्त के आखिरी सप्ताह की कहानी साफ है—सोना और चांदी भले ही अभी ऊंचे स्तरों पर हैं, लेकिन फेड के सख्त रुख ने उनकी चमक पर अचानक ब्रेक लगा दिया है। अब असली परीक्षा सितंबर में होगी। अगर अमेरिका में महंगाई और अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है, तो कीमती धातुओं पर दबाव और बढ़ सकता है; लेकिन आंकड़े कमजोर पड़े तो यही सोना एक बार फिर तेज पलटवार कर सकता है।

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