12 सितंबर को दिल्ली में ऐसा क्या होने वाला है? मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की बैठक से क्यों डरी हुई है पूरी दुनिया!
नई दिल्ली: सितंबर 2026 में भारत की राजधानी नई दिल्ली एक ऐसे कूटनीतिक आयोजन की मेजबानी करने जा रही है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाला रूस-भारत-चीन (RIC) शिखर सम्मेलन केवल तीन देशों की नियमित बैठक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस सम्मेलन में सुरक्षा, व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, सीमा विवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
हालांकि, सम्मेलन के संभावित एजेंडे और परिणामों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इससे जुड़े कई दावे और अटकलें विशेषज्ञों की चर्चाओं तथा मीडिया विश्लेषण का हिस्सा हैं। फिर भी यह तय माना जा रहा है कि यह बैठक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण संदेश दे सकती है।
RIC क्या है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
RIC का अर्थ है रूस, भारत और चीन। यह एक त्रिपक्षीय संवाद तंत्र है जिसकी अवधारणा कई वर्ष पहले सामने आई थी। इसका उद्देश्य एशिया की तीन प्रमुख शक्तियों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाना है।
इन तीन देशों का संयुक्त प्रभाव वैश्विक स्तर पर काफी बड़ा माना जाता है। तीनों देशों की विशाल जनसंख्या, मजबूत सैन्य क्षमता, परमाणु शक्ति और तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाएं इन्हें विश्व राजनीति के सबसे प्रभावशाली समूहों में शामिल करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन तीन देशों के बीच सहयोग और मजबूत होता है तो इसका असर केवल एशिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
दिल्ली में क्यों बढ़ गई है वैश्विक हलचल?
भारत पहले भी कई बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी कर चुका है, लेकिन इस बार का सम्मेलन कई कारणों से विशेष माना जा रहा है।
एक ओर रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव जारी है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और चीन के संबंध भी लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे समय में भारत दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने वाला प्रमुख देश माना जाता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की भूमिका एक संतुलित मध्यस्थ के रूप में उभर रही है। यही वजह है कि नई दिल्ली में होने वाली इस बैठक को वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा बना चर्चा का विषय
इस सम्मेलन की सबसे अधिक चर्चा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को लेकर हो रही है।
यदि उनका दौरा तय कार्यक्रम के अनुसार होता है तो यह कई वर्षों बाद भारत की उनकी महत्वपूर्ण यात्रा होगी। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में गंभीर तनाव आ गया था।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव कम करने के प्रयास भी जारी रहे हैं।
ऐसे में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित द्विपक्षीय बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है।
क्या सीमा विवाद पर निकल सकता है समाधान?
विश्लेषकों का मानना है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का समाधान आसान नहीं है।
हालांकि यदि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सकारात्मक बातचीत होती है और विश्वास बहाली के नए कदम उठाए जाते हैं, तो इससे दोनों देशों के संबंधों में सुधार की नई शुरुआत हो सकती है।
सीमा पर शांति कायम रहने से व्यापार, निवेश, पर्यटन और क्षेत्रीय सहयोग को भी नई गति मिल सकती है।
रूस की भूमिका भी होगी अहम
रूस लंबे समय से भारत का रणनीतिक साझेदार रहा है।
वहीं रूस और चीन के बीच भी पिछले कुछ वर्षों में सहयोग बढ़ा है।
ऐसे में रूस इस सम्मेलन के दौरान दोनों एशियाई शक्तियों के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तीनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग मजबूत होता है तो यह एशिया में स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।
क्या डॉलर के विकल्प पर होगी चर्चा?
इस सम्मेलन से जुड़ा सबसे चर्चित मुद्दा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को लेकर है।
हाल के वर्षों में कई देशों ने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के विकल्पों पर विचार किया है।
भारत और रूस पहले से ही कुछ व्यापार अपनी-अपनी मुद्राओं में कर रहे हैं। चीन भी युआन के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि सम्मेलन में डॉलर के विकल्प के रूप में कोई बड़ा फैसला लिया जाएगा।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि एक साझा वैश्विक मुद्रा बनाना फिलहाल व्यावहारिक नहीं दिखता, क्योंकि तीनों देशों की आर्थिक संरचनाएं अलग-अलग हैं।
फिर भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, भुगतान प्रणाली मजबूत करने या किसी वैकल्पिक लेखांकन प्रणाली (Unit of Account) जैसे विकल्पों पर चर्चा हो सकती है।
BRICS के विस्तार के बाद नई चुनौतियां
BRICS के विस्तार के बाद संगठन का दायरा काफी बढ़ गया है।
नए सदस्य देशों के शामिल होने से संगठन की वैश्विक भूमिका मजबूत हुई है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं।
विशेष रूप से पश्चिम एशिया के कुछ सदस्य देशों के बीच मौजूद राजनीतिक मतभेद संगठन के भीतर सहमति बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसे में भारत की मेजबानी में होने वाले संवाद को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत की कूटनीति की बड़ी परीक्षा
भारत लंबे समय से "सभी के साथ संवाद" की नीति पर काम करता रहा है।
भारत के रूस, अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर मजबूत संबंध हैं।
यही कारण है कि नई दिल्ली में होने वाला सम्मेलन भारत की कूटनीतिक क्षमता की भी परीक्षा माना जा रहा है।
यदि भारत विभिन्न देशों के बीच संवाद और सहयोग का वातावरण तैयार करने में सफल रहता है तो उसकी वैश्विक भूमिका और मजबूत हो सकती है।
दुनिया क्यों रख रही है नजर?
वैश्विक राजनीति इस समय कई बड़े संकटों से गुजर रही है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष
पश्चिम एशिया में तनाव
अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा
वैश्विक सप्लाई चेन की चुनौतियां
ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
इन सभी मुद्दों के बीच नई दिल्ली में होने वाला सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या बदल जाएगा दुनिया का शक्ति संतुलन?
विशेषज्ञों की राय है कि किसी एक सम्मेलन से पूरी वैश्विक व्यवस्था बदल जाना संभव नहीं होता।
हालांकि ऐसे शिखर सम्मेलन भविष्य की दिशा जरूर तय करते हैं।
यदि भारत, रूस और चीन कई अहम मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं तो इससे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा को बल मिल सकता है।
वहीं यदि सीमा विवाद, व्यापार और रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति होती है तो इसका असर आने वाले वर्षों तक दिखाई दे सकता है।
12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रस्तावित RIC शिखर सम्मेलन केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। दुनिया की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि क्या भारत, रूस और चीन वैश्विक चुनौतियों पर कोई साझा दृष्टिकोण विकसित कर पाते हैं और क्या यह बैठक भविष्य की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की नई दिशा तय करने में भूमिका निभाती है।
हालांकि सम्मेलन से पहले सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर कई बड़े दावे किए जा रहे हैं—जैसे अमेरिकी डॉलर का अंत, नई वैश्विक मुद्रा या विश्व व्यवस्था में तत्काल बदलाव—लेकिन इन दावों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष सम्मेलन के दौरान होने वाली चर्चाओं, आधिकारिक घोषणाओं और संयुक्त वक्तव्य के बाद ही सामने आएंगे।

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