‘हम हिंदुओं को बर्दाश्त करते हैं’… जरदारी के बयान से मचा बवाल! 80 साल बाद फिर क्यों छिड़ी भारत-पाकिस्तान की पुरानी बहस?
नई दिल्ली, 16 अगस्त 2026: पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के एक बयान को लेकर भारत में तीखी बहस शुरू हो गई है। 14 अगस्त को दिए गए अपने संबोधन में जरदारी ने पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि देश की मुस्लिम आबादी हिंदुओं को “बर्दाश्त” करती है और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू भारत जाने के बजाय पाकिस्तान में रहना पसंद करेंगे। उन्होंने इसी दौरान ‘अखंड भारत’ की विचारधारा का भी उल्लेख किया और कहा कि भारतीय इस विचार में विश्वास करते हैं।
जरदारी के इस बयान को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उनके उस कथन की हो रही है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी को करीब 3-4 प्रतिशत बताया। हालांकि, पाकिस्तान के आधिकारिक 2023 जनगणना आंकड़ों के अनुसार हिंदू समुदाय की आबादी इससे कम है। ‘हिंदू जाति’ और ‘अनुसूचित जाति’ को मिलाकर पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 2.17 प्रतिशत बैठती है। ऐसे में राष्ट्रपति के बयान में बताए गए आंकड़े पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्वतंत्रता दिवस पर क्या बोले आसिफ अली जरदारी?
पाकिस्तान हर साल 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है। इसी अवसर पर राष्ट्रपति जरदारी ने अपने संबोधन में भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक सोच के बीच अंतर बताने की कोशिश की।
रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने कहा कि भारत में ‘अखंड भारत’ की सोच को लेकर विश्वास है, जबकि पाकिस्तान की सोच अलग है। इसी दौरान उन्होंने पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं का उल्लेख करते हुए दावा किया कि वहां रहने वाले हिंदू समुदाय के लोग भारत के बजाय पाकिस्तान में रहना पसंद करेंगे।
जरदारी ने पाकिस्तान के मुसलमानों को सहिष्णु बताते हुए यह भी कहा कि वहां हिंदू आबादी को स्वतंत्रता प्राप्त है।
उनके बयान का यही हिस्सा अब सबसे ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि “बर्दाश्त करने” जैसी भाषा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि किसी देश के नागरिकों, खासकर धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में यह कहना कि बहुसंख्यक आबादी उन्हें “बर्दाश्त” कर रही है, समान नागरिकता की भावना पर सवाल खड़े करता है।
हिंदू आबादी को लेकर जरदारी के दावे पर सवाल
पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने अपने बयान में हिंदू आबादी को करीब 3-4 प्रतिशत बताया। लेकिन पाकिस्तान की 2023 जनगणना के आंकड़ों में ‘हिंदू जाति’ की आबादी लगभग 38.67 लाख दर्ज की गई है। इसके अलावा ‘अनुसूचित जाति’ की आबादी करीब 13.49 लाख बताई गई है।
दोनों श्रेणियों को जोड़ने पर कुल संख्या लगभग 52 लाख बैठती है, जो पाकिस्तान की कुल आबादी का करीब 2.17 प्रतिशत है।
यानी राष्ट्रपति द्वारा बताए गए 3-4 प्रतिशत आंकड़े और आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के बीच अंतर दिखाई देता है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि पाकिस्तान की जनगणना में ‘हिंदू जाति’ और ‘अनुसूचित जाति’ को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया गया है। इसी वजह से दोनों आंकड़ों को जोड़कर हिंदू आबादी का व्यापक अनुमान लगाया जाता है।
‘अखंड भारत’ का जिक्र क्यों महत्वपूर्ण है?
जरदारी ने अपने भाषण में ‘अखंड भारत’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने इस विचार को भारत की सोच से जोड़ते हुए कहा कि पाकिस्तान और भारत की विचारधारा अलग है।
‘अखंड भारत’ शब्द भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस में अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल होता रहा है। इसके अर्थ और राजनीतिक व्याख्या को लेकर अलग-अलग मत हैं।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इसका जिक्र करना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत-पाकिस्तान संबंधों में इतिहास, विभाजन और क्षेत्रीय राजनीति हमेशा संवेदनशील मुद्दे रहे हैं।
1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी के समय भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक अलग देश के रूप में अस्तित्व में आया। भारत ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया, जबकि पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।
करीब आठ दशक बाद भी दोनों देशों के राजनीतिक भाषणों में विभाजन और उसके बाद की विचारधाराओं का उल्लेख होना यह दिखाता है कि 1947 की विरासत आज भी दोनों देशों की राजनीति में प्रभाव रखती है।
‘हम हिंदुओं को बर्दाश्त करते हैं’ वाली भाषा पर विवाद
जरदारी के बयान पर सबसे ज्यादा सवाल उनकी भाषा को लेकर उठ रहे हैं।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में धार्मिक अल्पसंख्यक केवल बहुसंख्यक समुदाय की सहनशीलता पर निर्भर नागरिक नहीं होते। संविधान और कानून उन्हें अधिकार प्रदान करते हैं।
पाकिस्तान के संविधान में भी धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में आलोचकों का तर्क है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को “बर्दाश्त करने” की भाषा में पेश करने के बजाय उन्हें समान नागरिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
यही बात इस बयान को लेकर होने वाली बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
क्या पाकिस्तान में हिंदू वास्तव में सुरक्षित हैं?
जरदारी ने अपने बयान में पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं के सुरक्षित और संतोषजनक जीवन का दावा किया। लेकिन मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न रिपोर्टों में पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर कई चिंताएं दर्ज की गई हैं।
मानवाधिकार रिपोर्टों में हिंदू और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियों और महिलाओं के कथित जबरन धर्म परिवर्तन, अपहरण और कम उम्र में विवाह के मामलों को लेकर चिंता जताई गई है।
कुछ रिपोर्टों में सिंध के हिंदू समुदाय की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है। इनमें कहा गया है कि कुछ हिंदू परिवार धार्मिक हिंसा के साथ-साथ आर्थिक समस्याओं, खराब कानून-व्यवस्था और अन्य परिस्थितियों के कारण पलायन करने को मजबूर हुए।
इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान में रहने वाले हर हिंदू को एक जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन मानवाधिकार रिपोर्टों में दर्ज घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर वहां गंभीर चिंताएं मौजूद हैं।
जबरन धर्म परिवर्तन का मुद्दा
पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों से जुड़ा सबसे संवेदनशील मुद्दा जबरन धर्म परिवर्तन और नाबालिग लड़कियों के अपहरण का है।
पाकिस्तान के राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग की एक रिपोर्ट में 2021 से 2024 के बीच धार्मिक अल्पसंख्यक लड़कियों के कथित अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़े सैकड़ों मामलों का उल्लेख किया गया था। इनमें हिंदू लड़कियों की संख्या सबसे अधिक बताई गई।
इन घटनाओं को लेकर पाकिस्तान के अंदर भी कई सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है।
ऐसे मामलों के कारण पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं।
सिंध में हिंदू आबादी की स्थिति
पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की सबसे बड़ी आबादी सिंध प्रांत में रहती है। पाकिस्तान के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सिंध में हिंदू समुदाय की हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
यही क्षेत्र जबरन धर्म परिवर्तन और अल्पसंख्यक महिलाओं से जुड़े मामलों को लेकर भी लगातार चर्चा में रहा है।
मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में सिंध के हिंदू समुदाय की महिलाओं और लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और कम उम्र में विवाह को लेकर चिंता जताई गई है।
इसलिए जरदारी के बयान में जब पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति को लेकर सकारात्मक दावा किया गया, तो इन रिपोर्टों की वजह से उस दावे की जमीनी वास्तविकता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत में भी हुई आलोचना
जरदारी के बयान के बाद भारत में सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई लोगों ने सवाल उठाया कि अगर पाकिस्तान अपने हिंदू नागरिकों को समान नागरिक मानता है तो उनके बारे में “बर्दाश्त” करने जैसी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया गया।
कुछ भारतीय कानूनी और सामाजिक टिप्पणीकारों ने भी बयान की आलोचना करते हुए कहा कि विभाजन के करीब 80 वर्ष बाद भी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा भारत और हिंदू समुदाय का जिक्र जिस तरह किया जाता है, वह दोनों देशों के बीच पुराने विवादों को फिर चर्चा में ला देता है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि किसी भी देश के राष्ट्रपति के बयान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सम्मान की बात स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लेकर मानवाधिकार रिपोर्ट क्या कहती हैं?
पाकिस्तान की मानवाधिकार रिपोर्टों में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर कई चिंताएं दर्ज की गई हैं। रिपोर्टों में हिंदू और ईसाई लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन और कम उम्र में विवाह से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है।
इसके अलावा धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के मामलों पर भी चिंता व्यक्त की जाती रही है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार रिपोर्टों में भी पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और धार्मिक कानूनों के दुरुपयोग से जुड़े मामलों को लेकर चिंता जताई गई है।
इन रिपोर्टों से यह साफ होता है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति केवल राजनीतिक बयानबाजी का विषय नहीं है, बल्कि मानवाधिकार संगठनों के लिए भी लगातार चिंता का मुद्दा रही है।
बयान से भारत-पाकिस्तान संबंधों पर क्या असर?
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते पहले से ही कई संवेदनशील मुद्दों से प्रभावित हैं। जम्मू-कश्मीर, सीमा विवाद, आतंकवाद, जल विवाद और 1947 के विभाजन की विरासत दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंधों को प्रभावित करती रही है।
ऐसे में जब किसी देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व दूसरे देश की विचारधारा या धार्मिक समुदाय का जिक्र करता है तो उसका असर सामान्य राजनीतिक बयान से ज्यादा व्यापक हो सकता है।
जरदारी का यह बयान भी इसी वजह से चर्चा में आया है। एक तरफ उन्होंने पाकिस्तान की सहिष्णुता का दावा किया, तो दूसरी तरफ उनके शब्दों में भारत और ‘अखंड भारत’ को लेकर राजनीतिक संदेश भी दिखाई दिया।
असली सवाल क्या है?
जरदारी के बयान के बाद असली सवाल केवल यह नहीं है कि पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी कितनी है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समुदाय की “सहनशीलता” के आधार पर देखा जाना चाहिए या समान नागरिक अधिकारों के आधार पर?
अगर किसी देश का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है तो उसके नागरिकों के अधिकारों को केवल बहुसंख्यक समाज की सहमति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
दूसरा सवाल यह है कि राजनीतिक भाषणों में दिए गए दावों और जमीनी स्थिति के बीच कितना अंतर है। पाकिस्तान के आधिकारिक आंकड़े एक तस्वीर दिखाते हैं, जबकि मानवाधिकार रिपोर्टें अल्पसंख्यकों के सामने आने वाली अलग-अलग समस्याओं की ओर इशारा करती हैं।
पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का हिंदू समुदाय और ‘अखंड भारत’ को लेकर दिया गया बयान भारत में चर्चा का विषय बन गया है। जरदारी ने पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लेकर सकारात्मक दावा किया और कहा कि वे भारत के बजाय पाकिस्तान में रहना पसंद करेंगे। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी को सहिष्णु बताते हुए हिंदू समुदाय का जिक्र किया।
लेकिन पाकिस्तान की 2023 जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ‘हिंदू जाति’ आबादी करीब 1.61 प्रतिशत है और अनुसूचित जाति को जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 2.17 प्रतिशत होता है। इसलिए राष्ट्रपति द्वारा बताए गए 3-4 प्रतिशत आंकड़े की तुलना आधिकारिक जनगणना से करने पर अंतर दिखाई देता है।
दूसरी ओर, मानवाधिकार रिपोर्टों में पाकिस्तान के हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सामने जबरन धर्म परिवर्तन, अपहरण, हिंसा और भेदभाव जैसी समस्याओं का उल्लेख मिलता रहा है।
इसलिए जरदारी का बयान अब सिर्फ भारत-पाकिस्तान की राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। इसने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के वास्तविक अधिकारों, आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

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