ट्रंप ने किम को खुश करने के लिए घटाए सैन्य अभ्यास, फिर मिला ‘NO THANKS’! आखिर किसने अमेरिका को दिया सीधा जवाब?
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ अपने रिश्तों को लेकर चर्चा में हैं। ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यासों को लेकर अपना रुख दोहराते हुए कहा कि उत्तर कोरिया के नेता के साथ उनके रिश्ते अच्छे रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान में दक्षिण कोरिया से सहयोग मांगने और वहां से मिले कथित जवाब “No thanks” का भी जिक्र किया।
हालांकि, इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात साफ करना जरूरी है। “No thanks” वाला जवाब किम जोंग उन ने नहीं दिया था। ट्रंप के मुताबिक यह जवाब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की ओर से आया था, जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई में सहयोग के बारे में उनसे बात की थी। इसलिए इसे किम जोंग उन की ओर से ट्रंप को दिया गया जवाब बताना सही नहीं होगा।
फिर सवाल उठता है कि ट्रंप बार-बार किम का नाम लेकर दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास कम करने की बात क्यों कर रहे हैं और इसका ईरान से क्या संबंध है?
ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास क्यों घटाए?
डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों को काफी हद तक कम करने का निर्देश दिया है।
ट्रंप ने इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उनका कहना था कि इन अभ्यासों पर अमेरिका काफी पैसा खर्च करता है। दूसरा और ज्यादा राजनीतिक कारण था—उनके अनुसार ये सैन्य अभ्यास उत्तर कोरिया के लिए अनावश्यक रूप से आक्रामक संदेश भेजते हैं।
ट्रंप ने इसी संदर्भ में कहा कि उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ उनके अच्छे संबंध रहे हैं। उनका मानना है कि अगर अमेरिका दक्षिण कोरिया के साथ बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास करता है तो इससे प्योंगयांग को गलत संदेश जा सकता है।
यह फैसला अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों के आकार और दायरे को प्रभावित करता है। इन अभ्यासों को दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल और उत्तर कोरिया से संभावित खतरे की स्थिति में तैयारी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
लेकिन असली ट्विस्ट ईरान से जुड़ा है
ट्रंप के बयान में दक्षिण कोरिया और किम जोंग उन की कहानी के साथ ईरान का मुद्दा भी जुड़ गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार उन्होंने दक्षिण कोरियाई नेतृत्व से पूछा था कि क्या दक्षिण कोरिया अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने की कोशिश में सहयोग करेगा।
ट्रंप ने दावा किया कि उन्हें जवाब मिला—“No thanks!”
यही वह वाक्य है जिसने पूरी बहस को और ज्यादा राजनीतिक बना दिया।
ट्रंप ने सवाल उठाया कि जब अमेरिका दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के लिए वहां सैनिक रखता है और उसकी रक्षा के लिए संसाधन खर्च करता है, तो संकट के समय दक्षिण कोरिया अमेरिका का साथ क्यों नहीं दे रहा।
ट्रंप ने इसी नाराजगी को सैन्य अभ्यासों में कटौती के फैसले के तर्क से भी जोड़ा।
किम जोंग उन ने क्या कहा?
यहीं कहानी और दिलचस्प हो जाती है।
ट्रंप लगातार किम जोंग उन के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को सकारात्मक तरीके से पेश कर रहे हैं। लेकिन उत्तर कोरिया की तरफ से इस दोस्ती को लेकर उतना उत्साह दिखाई नहीं देता।
प्योंगयांग की तरफ से संकेत मिले हैं कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यासों में कटौती को बहुत बड़ा कदम नहीं माना जा रहा।
यानी ट्रंप जिस फैसले को किम के लिए सद्भावना का संकेत मान रहे हैं, उत्तर कोरिया उसे पर्याप्त रियायत नहीं मानता।
यह अंतर अमेरिकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है।
ट्रंप किम से फिर बातचीत क्यों चाहते हैं?
ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाकातें पहले भी पूरी दुनिया का ध्यान खींच चुकी हैं। दोनों नेताओं के बीच ऐतिहासिक बैठकें हुई थीं, लेकिन उन बैठकों के बावजूद उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका।
अब ट्रंप दोबारा किम के साथ बातचीत शुरू करने के संकेत दे रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार किम के साथ अपने रिश्तों को सकारात्मक बता चुके हैं।
लेकिन इस बार स्थिति पहले से अलग है।
उत्तर कोरिया ने पिछले कुछ वर्षों में अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है। साथ ही रूस और चीन के साथ उसके संबंध भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
इस वजह से किम जोंग उन के सामने आज सिर्फ अमेरिका ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
उत्तर कोरिया अब पहले जैसा नहीं रहा
विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर कोरिया ने अपनी सैन्य क्षमता और परमाणु कार्यक्रम को काफी आगे बढ़ाया है। रूस के साथ उसके बढ़ते सैन्य संबंधों ने भी प्योंगयांग की रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है।
यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और उत्तर कोरिया के बीच सैन्य सहयोग की खबरें सामने आती रही हैं।
दूसरी ओर चीन उत्तर कोरिया का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बना हुआ है।
इस वजह से किम जोंग उन अमेरिका के दबाव का सामना करने के लिए रूस और चीन के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
क्या अमेरिका ने किम को खुश करने के लिए दक्षिण कोरिया को कमजोर किया?
यही सवाल अमेरिका में भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास अमेरिका की एशिया-प्रशांत रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बनाए रखना और उत्तर कोरिया के संभावित हमले की स्थिति में तैयारी करना है।
ऐसे में सैन्य अभ्यासों में अचानक कटौती का फैसला अमेरिकी सैन्य रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
दक्षिण कोरिया के लिए भी यह संवेदनशील मामला है, क्योंकि उत्तर कोरिया से उसका सीधा सुरक्षा खतरा बना हुआ है।
अगर संयुक्त सैन्य अभ्यास कम होते हैं तो इससे उत्तर कोरिया को क्या संदेश जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।
उत्तर कोरिया का रुख कितना बदला?
अमेरिका द्वारा सैन्य अभ्यास कम किए जाने के बावजूद उत्तर कोरिया का सैन्य रुख पूरी तरह नरम नहीं हुआ है।
उत्तर कोरिया ने हाल के दिनों में मिसाइल गतिविधियां जारी रखी हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सैन्य दबाव कम करने से वास्तव में प्योंगयांग बातचीत की मेज पर आएगा।
फिलहाल ऐसा स्पष्ट संकेत नहीं मिला है।
यही कारण है कि ट्रंप की रणनीति को लेकर अमेरिकी विदेश और रक्षा नीति के विशेषज्ञों के बीच भी बहस हो रही है।
क्या किम अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार हैं?
किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने हाल के दिनों में अमेरिका की तरफ से किए गए कुछ दावों पर संदेह जताया है।
उत्तर कोरिया ने यह संकेत जरूर दिया है कि ट्रंप और किम के बीच व्यक्तिगत संबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल सैन्य अभ्यासों में कटौती को पर्याप्त रियायत मानने के संकेत नहीं मिले हैं।
यानी ट्रंप की तरफ से दोस्ती की भाषा है, लेकिन प्योंगयांग की तरफ से अभी भी काफी सावधानी और दूरी दिखाई दे रही है।
ईरान के मुद्दे पर दक्षिण कोरिया क्यों पीछे रहा?
दक्षिण कोरिया के लिए ईरान का मुद्दा बेहद जटिल है।
दक्षिण कोरिया अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य-पूर्व पर काफी निर्भर है। ईरान से जुड़े किसी सैन्य संघर्ष में सीधे शामिल होना उसके लिए आर्थिक और रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।
यही कारण हो सकता है कि सियोल अमेरिकी सैन्य अभियान में सीधे भाग लेने से बचना चाहता हो।
ट्रंप ने इसे अमेरिकी सहयोगियों से अपेक्षित पारस्परिक सहयोग के नजरिए से देखा, जबकि दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के नजरिए से स्थिति को देखता है।
यहीं से दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर साफ दिखाई देता है।
चीन का क्या रोल है?
उत्तर कोरिया की रणनीति में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन यह कहना कि चीन पर्दे के पीछे से उत्तर कोरिया और ईरान को अमेरिका के खिलाफ नियंत्रित कर रहा है, उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों से साबित नहीं होता।
चीन उत्तर कोरिया का प्रमुख व्यापारिक और आर्थिक साझेदार है। बीजिंग उत्तर कोरिया की स्थिरता में रुचि रखता है और अपनी सीमा के पास किसी बड़े संकट से बचना चाहता है।
चीन और ईरान के बीच भी आर्थिक तथा ऊर्जा संबंध हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन उत्तर कोरिया और ईरान के हर फैसले को नियंत्रित करता है। तीनों देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित हैं।
ट्रंप की रणनीति का असली लक्ष्य क्या है?
ट्रंप की मौजूदा रणनीति को देखें तो तीन बातें सामने आती हैं।
पहली—वह अमेरिकी सहयोगियों से ज्यादा सैन्य और आर्थिक योगदान चाहते हैं।
दूसरी—वह उत्तर कोरिया के साथ व्यक्तिगत कूटनीति का रास्ता दोबारा खोलना चाहते हैं।
तीसरी—वह ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान में सहयोगियों से अधिक समर्थन चाहते हैं।
दक्षिण कोरिया इन तीनों मुद्दों के बीच फंस गया है।
एक तरफ उसे अमेरिका के साथ सुरक्षा गठबंधन बनाए रखना है, दूसरी तरफ उत्तर कोरिया के खतरे से निपटना है और तीसरी तरफ ईरान से जुड़े संघर्ष के संभावित आर्थिक परिणामों से बचना है।
क्या ट्रंप-किम की दोस्ती फिर रंग लाएगी?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
ट्रंप के लिए किम जोंग उन के साथ व्यक्तिगत संबंध एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पूंजी हैं। लेकिन केवल व्यक्तिगत रिश्ते से उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का समाधान निकलना मुश्किल होगा।
उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा की गारंटी के रूप में देखता है। अमेरिका दूसरी ओर लंबे समय से उत्तर कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करता रहा है।
इन दोनों स्थितियों के बीच समझौता आसान नहीं है।
हाल की घटनाओं से भी यही संकेत मिलता है कि ट्रंप जितना जल्दी किम के साथ बातचीत शुरू करना चाहते हैं, प्योंगयांग उतनी जल्दी कोई बड़ी रियायत देने के मूड में नहीं दिखता।
‘No Thanks’ की असली कहानी क्या है?
इस पूरे मामले का सबसे वायरल हिस्सा “No thanks” है, लेकिन इसे सही संदर्भ में समझना जरूरी है।
यह जवाब किम जोंग उन ने ट्रंप को नहीं दिया था। ट्रंप के अनुसार उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी प्रयास में शामिल होने के बारे में पूछा था और उन्हें कथित तौर पर “No thanks” जवाब मिला।
इसी नाराजगी और किम के साथ अपने अच्छे संबंधों का हवाला देते हुए ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यासों को कम करने का फैसला किया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका ने अभ्यास कम किए, फिर भी उत्तर कोरिया ने इसे पर्याप्त रियायत नहीं माना और अपनी सैन्य गतिविधियां जारी रखीं।
ट्रंप किम को खुश करने के लिए पीछे हटे, लेकिन क्या प्योंगयांग फिर भी नहीं पिघलेगा?
अमेरिकी राष्ट्रपति की रणनीति में किम जोंग उन के साथ व्यक्तिगत संबंधों को काफी महत्व दिया जा रहा है। ट्रंप उम्मीद कर रहे हैं कि सैन्य तनाव कम करके और बातचीत का रास्ता खोलकर उत्तर कोरिया को फिर से वार्ता की मेज पर लाया जा सकता है।
लेकिन प्योंगयांग अभी अपनी शर्तों से पीछे हटता दिखाई नहीं दे रहा।
अब असली परीक्षा यही है कि क्या ट्रंप की ‘दोस्ती वाली कूटनीति’ किम जोंग उन को बातचीत के लिए तैयार कर पाएगी, या अमेरिका को एक बार फिर उम्मीद के बदले सख्त जवाब का सामना करना पड़ेगा।

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