60 के बाद शरीर में आने लगते हैं ये 5 खतरनाक बदलाव! डॉक्टर ने बताया राज—आज से कर ली ये 6 चीजें तो बुढ़ापा भी रहेगा जवान
नई दिल्ली: उम्र बढ़ना जिंदगी का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन 60 साल की उम्र के बाद शरीर में होने वाले बदलावों का मतलब यह नहीं है कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन खत्म हो गया। सही खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, सामाजिक जुड़ाव और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच के जरिए बुजुर्ग उम्र में भी बेहतर जीवन जिया जा सकता है।
60 की उम्र के बाद शरीर की मांसपेशियों, हड्डियों, हृदय और मेटाबॉलिज्म में उम्र से जुड़े बदलाव आने लगते हैं। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, जोड़ों की समस्या और हड्डियों की कमजोरी जैसी परेशानियां ज्यादा ध्यान मांग सकती हैं। वहीं याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डिमेंशिया उम्र बढ़ने का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और शारीरिक सक्रियता, संतुलित भोजन, धूम्रपान से बचाव, सामाजिक जुड़ाव तथा ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर जैसे जोखिम कारकों का नियंत्रण इसके जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
इसी विषय पर वरिष्ठ नागरिकों की सेहत और स्वस्थ उम्र बढ़ने को लेकर जेरियाट्रिक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. प्रसून चटर्जी की सलाह महत्वपूर्ण है।
हालांकि, किसी व्यक्ति की उम्र, बीमारी, दवाओं और शारीरिक क्षमता के अनुसार व्यायाम और डाइट अलग हो सकती है। इसलिए गंभीर बीमारी या लंबे समय से चल रही समस्या में डॉक्टर की व्यक्तिगत सलाह जरूरी है।
60 के बाद किन स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है?
डॉ. प्रसून चटर्जी के अनुसार 60 साल को जीवन की समाप्ति या केवल रिटायरमेंट की उम्र के रूप में देखना सही नहीं है। इस उम्र में शरीर पर उम्र का असर दिखाई देने लगता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सक्रिय जीवन नहीं जी सकता।
इस उम्र के बाद आम तौर पर जिन स्वास्थ्य क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत पड़ती है, उनमें ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हड्डियां, मांसपेशियां और मानसिक एवं संज्ञानात्मक स्वास्थ्य शामिल हैं।
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत और संतुलन में कमी आ सकती है। हड्डियों की मजबूती भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए गिरने से बचाव, मांसपेशियों की मजबूती और नियमित गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बुजुर्गों के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधियों और जरूरत के अनुसार संतुलन सुधारने वाले व्यायाम की सलाह देता है।
1. सुबह से रात तक शरीर की घड़ी के साथ चलें
डॉ. चटर्जी ने पारंपरिक भारतीय जीवनशैली से सीख लेने की बात कही है। उनके मुताबिक नियमित दिनचर्या शरीर और दिमाग दोनों के लिए फायदेमंद हो सकती है।
आज की जीवनशैली में देर रात तक जागना, अनियमित समय पर खाना, लगातार बैठे रहना और शारीरिक गतिविधि कम होना आम है। लंबे समय तक ऐसी आदतें स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं।
इसलिए उम्र बढ़ने के साथ एक निश्चित दिनचर्या बनाना उपयोगी हो सकता है। सुबह समय पर उठना, दिन में सक्रिय रहना, भोजन का समय निश्चित रखना और रात में पर्याप्त नींद लेना स्वस्थ उम्र बढ़ने की बुनियाद बन सकता है।
हालांकि सूर्यास्त के बाद बिल्कुल खाना नहीं चाहिए जैसी सलाह हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है। डायबिटीज, दवाइयां या दूसरी स्वास्थ्य स्थितियां होने पर भोजन का समय डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार तय करना बेहतर है।
2. पेट भरने के बजाय संतुलित मात्रा में खाएं
डाइट को लेकर सबसे अहम संदेश यह है कि ज्यादा खाना स्वास्थ्य की गारंटी नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कैलोरी जरूरत व्यक्ति की गतिविधि और स्वास्थ्य के अनुसार बदल सकती है।
इसलिए प्लेट में पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थों को जगह देना ज्यादा महत्वपूर्ण है। साबुत अनाज, दालें, सब्जियां, फल, मेवे और बीज जैसे खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बुजुर्ग व्यक्ति बिना चिकित्सकीय सलाह के बहुत कम खाना शुरू कर दें। अत्यधिक कैलोरी प्रतिबंध से कमजोरी और पोषण की कमी हो सकती है। खासकर उम्रदराज लोगों में पर्याप्त प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों का सेवन महत्वपूर्ण है।
इसलिए ‘कम खाओ’ का मतलब भूखे रहना नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक और पोषण से भरपूर भोजन करना समझना चाहिए।
3. पेट को रखें ‘हाइब्रिड’, लेकिन जंक फूड से दूरी
डॉ. चटर्जी ने खान-पान में विविधता रखने पर जोर दिया है। एक ही तरह का खाना लगातार खाने के बजाय अलग-अलग पौष्टिक खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर हो सकता है।
घर का बना खाना प्राथमिकता में रखा जा सकता है। दाल, सब्जियां, साबुत अनाज, चावल, फल, बीज और अन्य पौष्टिक चीजें भोजन का हिस्सा हो सकती हैं।
इसके साथ ही ज्यादा नमक, अतिरिक्त चीनी, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और बार-बार फास्ट फूड खाने से बचना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए संतुलित आहार, शारीरिक सक्रियता, तंबाकू से दूरी और हानिकारक शराब सेवन से बचना महत्वपूर्ण है।
4. सिर्फ क्या खाएं नहीं, क्या न खाएं यह भी जरूरी
उम्र बढ़ने के साथ डाइट में केवल स्वस्थ चीजें जोड़ना ही पर्याप्त नहीं है। कुछ आदतों को कम करना या छोड़ना भी जरूरी है।
बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और जंक फूड में नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा अधिक हो सकती है। ऐसे खाद्य पदार्थों का नियमित और ज्यादा सेवन वजन तथा हृदय और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकता है।
धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाना बेहद महत्वपूर्ण है। शराब का सेवन करने वालों को भी मात्रा और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन और दवाओं की निगरानी करनी चाहिए।
5. एक्सरसाइज को बनाएं रोज की आदत
60 साल के बाद फिट रहने के लिए शरीर को चलाते रहना बेहद जरूरी है। उम्र बढ़ने पर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाना कमजोरी और निर्भरता बढ़ा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 65 साल और उससे अधिक उम्र के स्वस्थ बुजुर्गों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि या 75 मिनट अधिक तीव्र गतिविधि करने की सलाह दी जाती है। साथ ही सप्ताह में कम से कम दो दिन प्रमुख मांसपेशी समूहों को मजबूत करने वाली गतिविधियां करने की सिफारिश है। जिन लोगों की गतिशीलता कम है, उनके लिए संतुलन सुधारने वाली गतिविधियां भी महत्वपूर्ण हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को एक ही तरह का व्यायाम करना चाहिए। किसी को तेज चाल से चलना पसंद हो सकता है, किसी के लिए हल्की एक्सरसाइज, साइकिलिंग या डॉक्टर की सलाह से स्ट्रेंथ ट्रेनिंग बेहतर हो सकती है।
अगर किसी व्यक्ति को घुटने, हृदय, फेफड़े या दूसरी बीमारी है, तो व्यायाम शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
7 हजार कदम का क्या मतलब है?
डॉ. चटर्जी ने रोजाना करीब 7,000 कदम चलने को उपयोगी लक्ष्य बताया है। हालांकि कदमों की संख्या को हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
एक अध्ययन के अनुसार रोजाना 7,000 या उससे अधिक कदम चलने वालों में कम कदम चलने वालों की तुलना में समय से पहले मृत्यु का जोखिम कम पाया गया था, लेकिन यह एक आबादी-स्तर का संबंध है, व्यक्तिगत गारंटी नहीं।
अगर कोई बुजुर्ग अभी बहुत कम चलता है तो अचानक 7,000 कदम का लक्ष्य रखना जरूरी नहीं। बेहतर तरीका यह है कि अपनी क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे गतिविधि बढ़ाई जाए।
WHO भी कम सक्रिय लोगों को छोटी मात्रा से शुरुआत करके धीरे-धीरे अवधि, आवृत्ति और तीव्रता बढ़ाने की सलाह देता है।
मांसपेशियों को भी चाहिए ‘खुराक’
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत बनाए रखना बेहद जरूरी है। केवल चलना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। शरीर की क्षमता के अनुसार हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी उपयोगी हो सकती है।
कुर्सी से उठना-बैठना, हल्के प्रतिरोध वाले व्यायाम या फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा बताए गए अभ्यास वरिष्ठ नागरिकों की कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
विशेष रूप से उन बुजुर्गों के लिए जो पहले से कमजोर हैं या गिरने का खतरा रखते हैं, संतुलन और मांसपेशियों की मजबूती पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।
याददाश्त की समस्या को सामान्य मानकर न टालें
60 के बाद कभी-कभी चीजें भूलना हो सकता है, लेकिन हर भूलने की समस्या को उम्र का सामान्य हिस्सा मानना सही नहीं है।
डिमेंशिया में याददाश्त, सोचने-समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। WHO के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, हानिकारक शराब सेवन और सामाजिक अलगाव जैसे कारक संज्ञानात्मक गिरावट और डिमेंशिया के जोखिम से जुड़े हैं।
2026 में जारी WHO की नई गाइडलाइन में स्वस्थ आहार, शारीरिक गतिविधि, तंबाकू से बचाव, सामाजिक और मानसिक सक्रियता तथा हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसे जोखिम कारकों के प्रबंधन पर जोर दिया गया है।
अगर किसी व्यक्ति की याददाश्त लगातार खराब हो रही है या रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
अकेलापन भी बन सकता है बड़ी समस्या
बुढ़ापे में केवल शरीर को स्वस्थ रखना पर्याप्त नहीं है। मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डॉ. चटर्जी ने सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव को जरूरी बताया है। WHO भी सामाजिक अलगाव और अकेलेपन को बुजुर्गों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम मानता है।
परिवार के साथ समय बिताना, दोस्तों से बातचीत करना, पड़ोसियों से मिलना, धार्मिक या सामुदायिक गतिविधियों में शामिल होना, घूमना-फिरना और अपनी पसंद का कोई शौक बनाए रखना मानसिक स्वास्थ्य के लिए मददगार हो सकता है।
परिवार की भूमिका भी बेहद अहम
बुजुर्गों की सेहत सिर्फ उनकी अपनी जिम्मेदारी नहीं है। परिवार का व्यवहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्हें हर काम में अनावश्यक रूप से निर्भर बनाने के बजाय सुरक्षित तरीके से सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। डॉक्टर की अपॉइंटमेंट, दवाओं की निगरानी, पौष्टिक भोजन और नियमित गतिविधि में परिवार मदद कर सकता है।
लेकिन बुजुर्गों की स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है।
नींद और नियमित स्वास्थ्य जांच को न भूलें
स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए पर्याप्त नींद भी जरूरी है। लगातार नींद की कमी, दिनभर निष्क्रियता और अनियमित दिनचर्या से थकान और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, आंखों और सुनने की क्षमता जैसी चीजों की समय-समय पर जांच कराना उपयोगी है। दवाइयां चल रही हों तो उन्हें डॉक्टर की सलाह के बिना बंद या बदलना नहीं चाहिए।
60 के बाद जिंदगी खत्म नहीं, एक नया चरण है
60 की उम्र को केवल कमजोर होने की शुरुआत मानना सही नहीं है। यह जीवन का ऐसा चरण हो सकता है जिसमें व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, परिवार, रुचियों और सामाजिक जीवन को नए तरीके से प्राथमिकता दे।
डॉ. प्रसून चटर्जी भी इसी सोच पर जोर देते हैं कि उम्र बढ़ने के बावजूद व्यक्ति सक्रिय और स्वतंत्र जीवन जी सकता है। उनका विशेषज्ञता क्षेत्र जेरियाट्रिक मेडिसिन, डिमेंशिया केयर और स्वस्थ उम्र बढ़ना है।
60 साल के बाद शरीर में बदलाव आना स्वाभाविक है, लेकिन उम्र बढ़ना बीमारी का दूसरा नाम नहीं है। सही जीवनशैली अपनाकर स्वस्थ और सक्रिय उम्र बढ़ने की संभावना बेहतर की जा सकती है।
इसके लिए सबसे जरूरी पांच बातें हैं—संतुलित और पौष्टिक भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तंबाकू और हानिकारक शराब से दूरी तथा परिवार और समाज से मजबूत जुड़ाव।
रोजाना चलना, अपनी क्षमता के अनुसार मांसपेशियों को मजबूत करना और लंबे समय तक बैठे रहने से बचना महत्वपूर्ण है। WHO के मुताबिक 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली गतिविधि का लक्ष्य रखना चाहिए, जबकि कमजोर गतिशीलता वाले लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार गतिविधि और संतुलन वाले व्यायाम करने चाहिए।
सबसे अहम बात यह है कि किसी भी बीमारी या स्वास्थ्य समस्या को सिर्फ उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें। समय पर जांच, डॉक्टर की सलाह और नियमित दिनचर्या के साथ 60 के बाद का जीवन भी सक्रिय, सम्मानजनक और खुशहाल हो सकता है।

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