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अंतरिक्ष से आई वो खबर जिसने भारत को गर्व से भर दिया… अनिल मेनन ने पहली बार किया ये खतरनाक काम!

नई दिल्ली: अंतरिक्ष की दुनिया में भारतीय मूल की प्रतिभा ने एक बार फिर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। NASA के भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री डॉ. अनिल मेनन ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के बाहर अपनी पहली स्पेसवॉक सफलतापूर्वक पूरी की है। यह सिर्फ उनके करियर की पहली स्पेसवॉक नहीं थी, बल्कि अंतरिक्ष स्टेशन के भविष्य के पावर सिस्टम को अपग्रेड करने की दिशा में भी बेहद महत्वपूर्ण अभियान रहा।

NASA के मुताबिक, अनिल मेनन और अनुभवी अंतरिक्ष यात्री जेसिका मीर ने 6 अगस्त 2026 को अमेरिकी समयानुसार ISS के बाहर काम शुरू किया और करीब 6 घंटे 27 मिनट बाद स्पेसवॉक पूरी की। भारत में समय के हिसाब से यह गतिविधि 7 अगस्त की रात तक चली। NASA ने इस मिशन का मुख्य उद्देश्य स्टेशन के 3B पावर चैनल को भविष्य में लगाए जाने वाले नए रोल-आउट सोलर एरे के लिए तैयार करना बताया है।

यह मिशन इसलिए भी खास रहा क्योंकि यह अनिल मेनन की पहली स्पेसवॉक थी, जबकि जेसिका मीर इस तरह की गतिविधियों का पहले से लंबा अनुभव रखती हैं। दोनों ने अंतरिक्ष के बेहद कठिन वातावरण में स्पेस स्टेशन के बाहरी हिस्से पर कई तकनीकी काम किए।

अंतरिक्ष में पहुंचने के कुछ ही हफ्तों बाद बड़ी जिम्मेदारी

अनिल मेनन लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले अपने पहले मिशन के लिए जुलाई 2026 में ISS पहुंचे थे। NASA के अनुसार, उन्होंने 14 जुलाई को Soyuz MS-29 से उड़ान भरी और ISS पहुंचने के बाद Expedition 75 का हिस्सा बने। उनके साथ Roscosmos के कॉस्मोनॉट प्योत्र दुबरोव और अन्ना किकिना भी स्टेशन पहुंचे थे।

इसके बाद मेनन ने माइक्रोग्रैविटी वातावरण में वैज्ञानिक और तकनीकी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया। NASA ने उन्हें Expedition 75 के फ्लाइट इंजीनियर के रूप में सूचीबद्ध किया है। इस मिशन में वैज्ञानिक शोध, अंतरिक्ष में निर्माण तकनीक, मानव स्वास्थ्य, बायोप्रिंटिंग और भविष्य की अंतरिक्ष यात्राओं से जुड़े कई प्रयोग शामिल हैं।

ISS पर पहुंचने के कुछ ही समय बाद स्पेसवॉक की जिम्मेदारी मिलना मेनन के मिशन का एक महत्वपूर्ण चरण था।

आखिर क्यों जरूरी थी यह स्पेसवॉक?

सवाल यह है कि अंतरिक्ष यात्री को ISS के बाहर जाकर घंटों काम करने की जरूरत क्यों पड़ी?

दरअसल, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की बिजली व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है। स्टेशन पर वैज्ञानिक प्रयोगों से लेकर जीवन-रक्षा प्रणालियों और संचार उपकरणों तक लगभग हर महत्वपूर्ण गतिविधि के लिए विद्युत ऊर्जा की जरूरत होती है। यह ऊर्जा मुख्य रूप से स्टेशन के विशाल सोलर एरे से आती है।

समय के साथ स्टेशन के मूल सोलर एरे पुराने हो रहे हैं। ऐसे में NASA चरणबद्ध तरीके से International Space Station Roll-Out Solar Arrays यानी IROSA लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। नए सोलर एरे मौजूदा बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाने में मदद करेंगे।

6 अगस्त की स्पेसवॉक में मेनन और मीर ने इसी भविष्य की तैयारी के तहत 3B पावर चैनल से जुड़े हार्डवेयर पर काम किया। NASA के अनुसार, इस काम का उद्देश्य स्टेशन के 3B पावर चैनल को भविष्य में लगाए जाने वाले एक नए IROSA के लिए तैयार करना था।

6 घंटे 27 मिनट तक अंतरिक्ष के बाहर

स्पेसवॉक सुनने में जितनी रोमांचक लगती है, वास्तव में उतनी ही चुनौतीपूर्ण होती है। अंतरिक्ष यात्री जब ISS से बाहर निकलते हैं तो उनके आसपास पृथ्वी जैसा वातावरण नहीं होता। उन्हें विशेष स्पेससूट के अंदर जीवन-रक्षा प्रणाली पर निर्भर रहना पड़ता है।

स्पेससूट में ऑक्सीजन, तापमान नियंत्रण, संचार और शरीर को सुरक्षित रखने वाली कई प्रणालियां होती हैं। इसके बावजूद अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर हर गतिविधि को बेहद सावधानी से करना पड़ता है।

मेनन और मीर को कई तकनीकी उपकरणों के साथ काम करना था। उन्हें स्टेशन के बाहरी हिस्से में निर्धारित स्थानों तक पहुंचकर हार्डवेयर लगाना और पावर सिस्टम से संबंधित कार्य करना था।

NASA के अनुसार, स्पेसवॉक करीब साढ़े छह घंटे के लिए निर्धारित थी और वास्तविक अभियान 6 घंटे 27 मिनट में पूरा हुआ।

जेसिका मीर के लिए भी खास मिशन

इस अभियान में जेसिका मीर की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। वह इससे पहले कई स्पेसवॉक कर चुकी हैं और स्टेशन के बाहरी हिस्से में काम करने का अनुभव रखती हैं।

NASA ने पहले से बताया था कि मीर और मेनन इस अभियान में साथ काम करेंगे। दोनों को स्टेशन के Quest एयरलॉक से बाहर निकलकर 3B पावर चैनल को भविष्य के सोलर एरे अपग्रेड के लिए तैयार करना था।

मेनन के लिए यह पहली स्पेसवॉक थी, इसलिए उनके लिए यह मिशन व्यक्तिगत रूप से भी ऐतिहासिक रहा। अंतरिक्ष यात्री बनने से पहले वह चिकित्सा और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में काम कर चुके हैं और NASA के अंतरिक्ष यात्री दल में शामिल होने से पहले अंतरिक्ष चिकित्सा से जुड़े महत्वपूर्ण अनुभव हासिल कर चुके थे।

ISS की बिजली क्षमता बढ़ाने की तैयारी

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर नए सोलर एरे लगाने का काम एक दिन में पूरा होने वाला प्रोजेक्ट नहीं है। इसके लिए पहले पावर चैनल को तैयार करना, आवश्यक हार्डवेयर लगाना और केबलिंग जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ती हैं।

इसके बाद नए रोल-आउट सोलर एरे लगाए जा सकते हैं।

NASA पहले भी ISS के अलग-अलग पावर चैनलों के लिए इस तरह के अपग्रेड कर चुका है। मार्च 2026 में जेसिका मीर और क्रिस विलियम्स ने स्टेशन के 2A पावर चैनल को भविष्य के रोल-आउट सोलर एरे के लिए तैयार किया था। उस स्पेसवॉक के दौरान उन्होंने मॉडिफिकेशन किट और पावर सिस्टम से संबंधित कार्य पूरे किए थे।

इससे साफ है कि 3B पावर चैनल पर मेनन और मीर का काम एक बड़े और लंबे समय से चल रहे ISS पावर अपग्रेड कार्यक्रम का हिस्सा है।

अंतरिक्ष में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती मौजूदगी

अनिल मेनन की सफलता को भारत में इसलिए भी खास नजर से देखा जा रहा है क्योंकि वह भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्रियों की उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें राकेश शर्मा से लेकर कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स और अन्य अंतरिक्ष यात्रियों ने अपनी पहचान बनाई।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अनिल मेनन भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक और NASA astronaut हैं। उन्हें भारत के नागरिक अंतरिक्ष यात्री के रूप में नहीं गिना जाता।

भारत के अंतरिक्ष इतिहास में सबसे पहले राकेश शर्मा का नाम आता है। उन्होंने 1984 में सोवियत संघ के Soyuz T-11 मिशन के जरिए अंतरिक्ष की यात्रा की थी। इसके बाद भारतीय मूल की कल्पना चावला ने NASA के स्पेस शटल मिशनों में उड़ान भरी। सुनीता विलियम्स ने भी NASA के कई मिशनों में हिस्सा लिया और लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने तथा स्पेसवॉक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं।

इसके बाद भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री राजा चारी और भारत में जन्मी सिरिशा बांदला ने भी अंतरिक्ष उड़ान की दुनिया में अपनी जगह बनाई।

2025 में शुभांशु शुक्ला की ISS यात्रा ने भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए विशेष महत्व हासिल किया। वह Axiom-4 मिशन के तहत ISS पहुंचे और भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को नई गति मिली।

अनिल मेनन की कहानी क्यों प्रेरणादायक है?

अनिल मेनन की यात्रा केवल एक अंतरिक्ष यात्री की कहानी नहीं है। वह चिकित्सा, इंजीनियरिंग, विमानन, अंतरिक्ष चिकित्सा और मानव अंतरिक्ष उड़ान जैसे कई क्षेत्रों के अनुभव को जोड़ते हैं।

NASA ने उन्हें 2021 में अंतरिक्ष यात्री वर्ग के लिए चुना था और उन्होंने 2024 में प्रशिक्षण पूरा किया। इसके बाद उन्हें अपने पहले ISS मिशन के लिए चुना गया।

जुलाई 2026 में ISS पहुंचने के बाद उन्होंने माइक्रोग्रैविटी में वैज्ञानिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। NASA की रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने मानव स्वास्थ्य और सेलुलर इम्यून फंक्शन से जुड़े प्रयोगों में भी काम किया।

अब उनकी पहली स्पेसवॉक ने उनके मिशन में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जोड़ दी है।

अगले दशक में बदलने वाला है अंतरिक्ष का पूरा परिदृश्य

अनिल मेनन की स्पेसवॉक को केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस बड़े बदलाव का हिस्सा है जिसमें मानवता पृथ्वी की कक्षा से आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है।

NASA का Artemis कार्यक्रम चंद्रमा पर मानव मिशनों की दिशा में काम कर रहा है। इसके साथ ही भविष्य के कमर्शियल स्पेस स्टेशन भी विकसित किए जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष अनुसंधान केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि निजी कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

ISS पर किए जा रहे प्रयोग इसी भविष्य की तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। माइक्रोग्रैविटी में मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव, दवाओं और कोशिकाओं का व्यवहार, बायोप्रिंटिंग, नई सामग्री और अंतरिक्ष में भोजन उत्पादन जैसे विषयों पर शोध भविष्य के लंबे मिशनों के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।

भारत की नजर भी चंद्रमा और अंतरिक्ष स्टेशन पर

भारत भी मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ा रहा है। गगनयान मिशन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों में से एक है। इसका उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजना और सुरक्षित वापस लाना है।

ISRO के अनुसार, भारत की दीर्घकालिक अंतरिक्ष दृष्टि में 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी Bharatiya Antariksha Station (BAS) स्थापित करने और 2040 तक भारतीय क्रू मिशन के जरिए चंद्रमा पर उतरने की दिशा में काम शामिल है।

इस लिहाज से अनिल मेनन की ISS स्पेसवॉक भारत के लिए सीधे तौर पर भारतीय मिशन नहीं है, लेकिन यह भारतीय मूल के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की वैश्विक भूमिका को जरूर रेखांकित करती है।

आगे क्या होगा?

6 अगस्त की स्पेसवॉक के बाद भी ISS पर काम खत्म नहीं हुआ है। NASA ने अगस्त 2026 में कई स्पेसवॉक की योजना बनाई है, जिनमें सोलर एरे अपग्रेड, संचार एंटीना से जुड़े काम तथा पावर और डेटा केबल से संबंधित गतिविधियां शामिल हैं।

अनिल मेनन के लिए भी यह मिशन अभी जारी है। Expedition 75 26 जुलाई 2026 से शुरू हुई और वसंत 2027 तक चलने वाली है। इस दौरान ISS पर वैज्ञानिक प्रयोगों और तकनीकी गतिविधियों का सिलसिला जारी रहेगा।

अनिल मेनन की पहली स्पेसवॉक ने एक बार फिर यह दिखाया है कि अंतरिक्ष में इंसानों की मौजूदगी अब सिर्फ पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने की उपलब्धि नहीं रह गई है। अब लक्ष्य अंतरिक्ष में अधिक समय तक रहना, वहां नई तकनीक विकसित करना और भविष्य के चंद्रमा तथा मंगल मिशनों के लिए जरूरी आधार तैयार करना है।

6 घंटे 27 मिनट की यह स्पेसवॉक इसलिए खास है क्योंकि इसमें एक भारतीय मूल के NASA astronaut ने पहली बार ISS के बाहर जाकर उस तकनीकी ढांचे को मजबूत करने में योगदान दिया, जिस पर आने वाले वर्षों की अंतरिक्ष गतिविधियों का एक हिस्सा निर्भर करेगा। 

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