जिस पैसे को निकालकर भागे थे, वही फिर भारत में लगाने लगे! विदेशी निवेशकों की अचानक वापसी का राज क्या है?
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों का रुख एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। पिछले डेढ़ साल से भारतीय इक्विटी बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI/FII अब अचानक खरीदारी की तरफ लौटते दिखाई दे रहे हैं। जुलाई में चार महीने की लगातार बिकवाली का सिलसिला टूटा और अगस्त के पहले पखवाड़े में भी विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में हजारों करोड़ रुपये लगाए हैं। अगस्त के शुरुआती हिस्से में विदेशी निवेशकों की खरीदारी करीब 16,621 करोड़ रुपये रही है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले विदेशी पूंजी की लगातार निकासी ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बनाया था। विदेशी निवेशकों का पैसा भारतीय बाजार के लिए काफी अहम माना जाता है, क्योंकि बड़े विदेशी फंड जब किसी बाजार में बड़ी मात्रा में पैसा लगाते हैं तो शेयरों की मांग बढ़ सकती है। वहीं जब यही फंड अचानक बिकवाली शुरू करते हैं तो बाजार में दबाव बढ़ने लगता है।
अब सवाल यह है कि आखिर जिस विदेशी पूंजी ने लंबे समय तक भारत से दूरी बनाए रखी, वह अचानक वापस क्यों लौट रही है? क्या विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में फिर से बड़ा मौका दिखाई देने लगा है या यह सिर्फ कुछ समय के लिए पोर्टफोलियो में बदलाव है?
8 साल की कमाई को 17 महीने में कर दिया उलटफेर
भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की कहानी पिछले कुछ वर्षों में बेहद उतार-चढ़ाव वाली रही है। एक लंबे दौर में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में भारी पैसा लगाया। लेकिन इसके बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलीं और वही निवेशक भारत से पैसा निकालने लगे।
2025 और 2026 में विदेशी बिकवाली का दबाव विशेष रूप से बढ़ा। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर की मजबूती, भारतीय शेयरों का अपेक्षाकृत महंगा वैल्यूएशन और दूसरे एशियाई बाजारों में टेक्नोलॉजी से जुड़े अवसरों ने विदेशी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित किया।
2026 के शुरुआती महीनों में तो स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण रही। जुलाई तक विदेशी निवेशकों की भारतीय इक्विटी से निकासी करीब 28 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी। हालांकि जुलाई में तस्वीर अचानक बदलनी शुरू हुई।
यानी बाजार में विदेशी निवेशकों का मिजाज कितनी तेजी से बदल सकता है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लंबे समय तक बिकवाली करने के बाद कुछ ही हफ्तों में खरीदारी शुरू हो गई।
जुलाई में आया बड़ा बदलाव
विदेशी निवेशकों के लिए जुलाई 2026 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। कई महीनों तक लगातार बिकवाली करने के बाद जुलाई में FPI भारतीय इक्विटी बाजार में फिर से नेट बायर बने।
आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में करीब 17,227 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया। यह चार महीने तक चले लगातार आउटफ्लो के बाद आया बदलाव था।
जुलाई में विदेशी निवेशकों की खरीदारी करीब 2.12 अरब डॉलर रही। इससे संकेत मिला कि भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का नजरिया पूरी तरह नकारात्मक नहीं रहा है।
यह बदलाव ऐसे समय आया जब भारतीय बाजार में कई शेयरों और सेक्टरों के वैल्यूएशन में सुधार हुआ। साथ ही भारतीय कंपनियों के कॉरपोरेट नतीजे और घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती ने भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया।
अगस्त में और तेज हुई खरीदारी
जुलाई में शुरू हुआ यह बदलाव अगस्त में भी जारी दिखाई दे रहा है। अगस्त के पहले आधे हिस्से में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में करीब 16,621 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी बड़ी खरीदारी लगातार बिकवाली के बाद विदेशी निवेशकों के मूड में बदलाव का संकेत देती है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के प्रति विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें भारतीय बाजार के वैल्यूएशन में पहले की तुलना में आकर्षण, कंपनियों की कमाई में मजबूती और अमेरिका में ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद शामिल है।
हालांकि इसे अभी विदेशी निवेशकों की पूरी तरह वापसी कहना जल्दबाजी होगी।
ताइवान और दक्षिण कोरिया से भी जुड़ी है कहानी
विदेशी निवेशकों के भारत से दूर जाने के पीछे सिर्फ भारत की वजहें जिम्मेदार नहीं थीं। वैश्विक निवेशकों ने एशिया के दूसरे बाजारों में भी बड़े अवसर तलाशे।
खास तौर पर ताइवान और दक्षिण कोरिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर कंपनियों से जुड़ी तेजी ने विदेशी पूंजी को आकर्षित किया। लेकिन 2026 के मध्य तक इन बाजारों में भी तस्वीर बदलने लगी।
जुलाई में ताइवान और दक्षिण कोरिया से विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी हुई। ताइवान से करीब 22.95 अरब डॉलर और दक्षिण कोरिया से करीब 6.26 अरब डॉलर की विदेशी निकासी हुई। इसके विपरीत भारत में करीब 2.12 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया।
यानी विदेशी निवेशकों के पोर्टफोलियो में भारत की स्थिति कुछ हद तक बेहतर हुई है। टेक शेयरों से जुड़े जोखिम और AI निवेश को लेकर बढ़ती चिंताओं ने भी कुछ फंड्स को अपने पैसे का दोबारा बंटवारा करने के लिए प्रेरित किया हो सकता है।
क्या भारत फिर बन रहा है विदेशी निवेशकों की पसंद?
यह सवाल फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से विदेशी निवेशकों के लिए तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में आकर्षण का केंद्र रहा है। घरेलू खपत, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, बैंकिंग सेक्टर की मजबूती और कॉरपोरेट कमाई जैसे कई फैक्टर भारत की कहानी को मजबूत बनाते हैं।
लेकिन विदेशी निवेशक केवल आर्थिक विकास नहीं देखते। वे दूसरे देशों की तुलना में वैल्यूएशन, ब्याज दर, मुद्रा, बॉन्ड यील्ड और संभावित रिटर्न को भी देखते हैं।
इसी वजह से जब भारत के शेयर महंगे दिखाई दिए और ताइवान या दक्षिण कोरिया में टेक शेयरों में तेज रैली आई, तो विदेशी पूंजी का एक हिस्सा भारत से बाहर चला गया।
अब अगर दूसरे बाजारों में जोखिम बढ़ता है और भारत के वैल्यूएशन अपेक्षाकृत आकर्षक रहते हैं, तो विदेशी निवेशक भारत में और पैसा लगा सकते हैं।
अमेरिकी ब्याज दरों पर टिकी बड़ी नजर
विदेशी निवेशकों के अगले कदम के लिए अमेरिका की मौद्रिक नीति बेहद महत्वपूर्ण होगी।
अगर अमेरिकी ब्याज दरों में नरमी आती है तो डॉलर आधारित निवेश की आकर्षकता कम हो सकती है और उभरते बाजारों की ओर पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है। वहीं अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती को टालता है या बॉन्ड यील्ड फिर बढ़ती है तो विदेशी निवेशक दोबारा सावधान हो सकते हैं।
यही कारण है कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश की दिशा को समझने के लिए केवल सेंसेक्स और निफ्टी को देखना पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर इंडेक्स, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक बाजारों की चाल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार पूरी तरह टूट नहीं गया। इसके पीछे घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।
घरेलू संस्थागत निवेशक लगातार नेट बायर रहे हैं और उन्होंने विदेशी निवेशकों की बिकवाली का काफी हद तक मुकाबला किया। म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां और दूसरे घरेलू संस्थागत निवेशक बाजार को मजबूत आधार दे रहे हैं।
इसका मतलब है कि भारतीय शेयर बाजार अब केवल विदेशी पूंजी पर निर्भर नहीं है। घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी ने बाजार को विदेशी बिकवाली के दौरान सहारा दिया है।
क्या विदेशी निवेशकों की वापसी टिकेगी?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
अगस्त में विदेशी निवेशकों की खरीदारी देखकर बाजार में उत्साह जरूर बढ़ा है, लेकिन विशेषज्ञों के लिए असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी। कुछ दिनों या एक-दो महीनों की खरीदारी को लंबी अवधि की वापसी मानना सही नहीं होगा।
विदेशी निवेशकों का पैसा बेहद संवेदनशील होता है। अगर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड अचानक बढ़ती है, डॉलर मजबूत होता है या वैश्विक बाजारों में बड़ी गिरावट आती है तो यही निवेशक फिर से भारतीय शेयरों में बिकवाली कर सकते हैं।
इसके अलावा भारतीय शेयर बाजार का वैल्यूएशन भी महत्वपूर्ण रहेगा। अगर शेयरों की कीमतें विदेशी निवेशकों को बहुत ज्यादा महंगी लगती हैं तो वे खरीदारी की रफ्तार कम कर सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या मतलब?
भारतीय छोटे निवेशकों के लिए विदेशी निवेशकों की खरीदारी निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत हो सकती है, लेकिन केवल FII/FPI फ्लो देखकर किसी शेयर को खरीदना उचित नहीं है।
किसी भी निवेश निर्णय से पहले कंपनी की कमाई, कर्ज, वैल्यूएशन, सेक्टर की स्थिति और बाजार के जोखिम को देखना जरूरी है। विदेशी निवेशक आज जिस सेक्टर में पैसा लगा रहे हैं, जरूरी नहीं कि वही सेक्टर लंबे समय में सबसे अच्छा प्रदर्शन करे।
फिलहाल बाजार के लिए सबसे दिलचस्प बात यही है कि जिस विदेशी पूंजी ने लंबे समय तक भारतीय शेयर बाजार से दूरी बनाई, वह अब दोबारा लौटती नजर आ रही है।
जुलाई में खरीदारी की शुरुआत हुई और अगस्त में भी विदेशी निवेश का प्रवाह जारी रहा। एशिया के कुछ दूसरे टेक-हैवी बाजारों में जोखिम बढ़ने से भारत की स्थिति भी विदेशी निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक दिखाई दे रही है।
लेकिन कहानी का अगला अध्याय अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर, कच्चे तेल, भारतीय कंपनियों की कमाई और बाजार के वैल्यूएशन तय करेंगे।
विदेशी निवेशकों ने अभी दरवाजा जरूर खटखटाया है, लेकिन क्या वे इस बार भारत में टिककर बैठेंगे या फिर कुछ समय बाद दोबारा पैसा निकालकर निकल जाएंगे—इसका जवाब आने वाले महीनों की बाजार चाल ही देगी।

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