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बच्चों को मोबाइल से चिपकाने का ‘खेल’! कोर्ट में खुला Meta का राज, सामने आए ऐसे सबूत कि मच गया हड़कंप



क्या आपका बच्चा भी हर कुछ मिनट में मोबाइल उठाकर Instagram चेक करता है? क्या पढ़ाई, खाना और यहां तक कि नींद के बीच भी उसकी नजर फोन की स्क्रीन पर रहती है? अगर ऐसा है तो अमेरिका में चल रही एक बड़ी कानूनी लड़ाई आपके लिए भी बेहद अहम हो सकती है। दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Meta पर अमेरिका के 29 राज्यों ने आरोप लगाया है कि Facebook और Instagram को इस तरह डिजाइन किया गया कि बच्चे और किशोर इन प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताते रहें।

इस मामले की सुनवाई कैलिफोर्निया के ओकलैंड स्थित संघीय अदालत में शुरू हो चुकी है। यह मुकदमा केवल Meta पर आर्थिक जुर्माने का मामला नहीं है, बल्कि इसका असर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के भविष्य के डिजाइन और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। Reuters के अनुसार, राज्यों का आरोप है कि Meta ने कम उम्र के यूजर्स को अपने प्लेटफॉर्म पर बांधे रखने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को पर्याप्त रूप से सामने नहीं रखा।

29 राज्यों ने Meta को कोर्ट में घेरा

Meta के खिलाफ यह मुकदमा अमेरिकी राज्यों के अटॉर्नी जनरल की ओर से दायर व्यापक कानूनी कार्रवाई का हिस्सा है। हालांकि मुकदमे में 29 राज्य शामिल हैं, ओकलैंड में चल रही मौजूदा ट्रायल में शुरुआती तौर पर कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी प्रमुख वादी के तौर पर मामले को आगे बढ़ा रहे हैं।

जूरी का चयन अगस्त की शुरुआत में शुरू हुआ था और 18 अगस्त से मामले में शुरुआती दलीलें शुरू हुईं। सुनवाई करीब छह से आठ सप्ताह तक चलने की उम्मीद जताई गई है।

राज्यों का आरोप है कि Meta ने ऐसे फीचर्स और सिस्टम विकसित किए जिनका उद्देश्य बच्चों और किशोरों को प्लेटफॉर्म पर लंबे समय तक बनाए रखना था। इसके साथ ही कंपनी पर 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से जुड़े डेटा की सुरक्षा और अभिभावकीय अनुमति के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप भी हैं।

बच्चों को प्लेटफॉर्म पर रोकने का आरोप

सरकारी वकीलों का तर्क है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का बिजनेस मॉडल यूजर्स का ध्यान अधिक से अधिक समय तक अपने पास बनाए रखने पर निर्भर करता है। इसी वजह से Infinite Scroll, लगातार आने वाले Notifications, Autoplay और Algorithmic Recommendations जैसे फीचर्स को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

आरोप लगाने वाले पक्ष का कहना है कि इन फीचर्स के कारण बच्चे बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के भी लगातार कंटेंट देखते रह सकते हैं। एक वीडियो खत्म होने के बाद दूसरा वीडियो अपने आप सामने आ जाता है और यूजर को अगली पोस्ट देखने के लिए अलग से कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती।

राज्यों का कहना है कि बच्चों और किशोरों के मामले में इस तरह के डिजाइन का असर विशेष रूप से गंभीर हो सकता है, क्योंकि कम उम्र के यूजर्स सोशल मीडिया के संभावित नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।

कंपनी के अंदर की रिसर्च भी बनी बड़ा मुद्दा

मुकदमे में Meta की आंतरिक रिसर्च और कंपनी के पूर्व कर्मचारियों से जुड़े सबूत भी महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि कंपनी के पास बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के संभावित नकारात्मक प्रभावों को लेकर जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद प्लेटफॉर्म के डिजाइन में पर्याप्त बदलाव नहीं किए गए।

सरकारी वकीलों ने Meta पर यह भी आरोप लगाया है कि कंपनी ने सार्वजनिक तौर पर अपने प्लेटफॉर्म की सुरक्षा को लेकर ऐसी तस्वीर पेश की जो उसके आंतरिक ज्ञान से मेल नहीं खाती थी।

पूर्व Meta कर्मचारी Arturo Béjar का नाम भी मामले में महत्वपूर्ण गवाह के तौर पर सामने आया है। अभियोजन पक्ष का कहना है कि कंपनी के भीतर बच्चों की सुरक्षा को लेकर चेतावनियां दी गई थीं और इन चेतावनियों को उत्पाद विकास में पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

क्या Instagram का Like और Infinite Scroll बंद हो सकता है?

इस मुकदमे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि राज्यों की मांग केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित नहीं है। वादी पक्ष सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के डिजाइन में भी बदलाव चाहता है।

मामले में Infinite Scroll, Autoplay और Like Counts जैसे फीचर्स को लेकर विशेष रूप से सवाल उठाए गए हैं। राज्यों का उद्देश्य ऐसे डिजाइन को सीमित करना है जो नाबालिगों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में मदद कर सकता है।

अगर अदालत ने राज्यों के पक्ष में फैसला दिया और व्यापक बदलावों के आदेश दिए, तो इसका असर केवल Meta पर नहीं बल्कि पूरे सोशल मीडिया उद्योग पर पड़ सकता है। Instagram और Facebook के अलावा दूसरे प्लेटफॉर्म भी बच्चों के लिए अपने डिजाइन और सुरक्षा नीतियों की समीक्षा करने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

Meta ने आरोपों को किया खारिज

दूसरी तरफ Meta ने सभी आरोपों को खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि उसने बच्चों और किशोरों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं और उसके प्लेटफॉर्म जानबूझकर बच्चों को नुकसान पहुंचाने के लिए डिजाइन नहीं किए गए।

Meta के वकीलों ने अदालत में यह तर्क भी दिया कि किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को केवल सोशल मीडिया के इस्तेमाल से जोड़ना सही नहीं होगा। कंपनी का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य कई अलग-अलग सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों से प्रभावित होता है।

Meta ने यह भी कहा है कि वह कम उम्र के यूजर्स को लेकर सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत कर रही है।

मामला साबित हुआ तो कितना बड़ा झटका लगेगा?

यह मुकदमा Meta के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्यों की ओर से संभावित आर्थिक दंड की मांग बहुत बड़ी है और कुछ रिपोर्टों में अधिकतम संभावित रकम 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक बताई गई है। हालांकि यह एक अधिकतम संभावित कानूनी दायित्व है, वास्तविक आर्थिक दंड इससे काफी अलग हो सकता है और उसका निर्धारण अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।

यही वजह है कि दुनिया की टेक इंडस्ट्री की नजर इस मामले पर टिकी हुई है। अगर Meta को दोषी ठहराया जाता है तो भविष्य में TikTok, YouTube, Snapchat और अन्य प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ चल रहे मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

माता-पिता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

इस मुकदमे ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि बच्चों को सोशल मीडिया से कितना और किस उम्र में जोड़ना चाहिए। माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मोबाइल और इंटरनेट अब पढ़ाई, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में बच्चों को पूरी तरह डिजिटल दुनिया से दूर रखना आसान नहीं है।

लेकिन स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना, रात में फोन से दूरी रखना, नोटिफिकेशन कम करना और बच्चों से सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर खुलकर बातचीत करना अभिभावकों के लिए उपयोगी कदम हो सकते हैं।

अमेरिका की अदालत में चल रहा Meta मुकदमा अब केवल एक कंपनी और कुछ राज्यों की कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है। यह इस बड़े सवाल का परीक्षण बन चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी कहां तक है और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए उन्हें किस हद तक जवाबदेह बनाया जा सकता है।

अब सबकी नजर इस ट्रायल के आगे बढ़ने और अदालत के अंतिम फैसले पर है। अगर राज्यों के आरोप साबित होते हैं, तो आने वाले समय में सोशल मीडिया ऐप्स का डिजाइन और बच्चों के लिए उनकी सुरक्षा व्यवस्था पहले जैसी शायद न रहे।

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