हॉस्टल में अचानक सैकड़ों छात्राएं रोने-हंसने लगीं, फैली ‘भूत’ की दहशत… फिर सामने आया चौंकाने वाला सच!
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अमरावती। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के मेलघाट क्षेत्र स्थित डोमा की एक सरकारी आश्रमशाला में कुछ छात्राओं के अचानक अजीब व्यवहार करने से ऐसा माहौल बना कि देखते ही देखते पूरे इलाके में दहशत फैल गई। कुछ छात्राएं अचानक रोने लगीं, कुछ हंसने लगीं और कुछ के बेहोश होने की बात सामने आई। इसके बाद हॉस्टल में कथित तौर पर भूत-प्रेत या किसी अलौकिक शक्ति के होने की अफवाह फैल गई।
डर का असर इतना बढ़ा कि सैकड़ों छात्राएं हॉस्टल छोड़कर अपने घर चली गईं। अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार इस आवासीय विद्यालय में करीब 810 विद्यार्थी रहते थे और करीब 600 से अधिक छात्र-छात्राएं परिसर छोड़कर चले गए। हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों और विशेषज्ञों की जांच में किसी अलौकिक घटना का प्रमाण नहीं मिला। चिकित्सकीय आकलन में इसे मानसिक तनाव और सामूहिक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से जुड़ी स्थिति, जिसे आम तौर पर मास हिस्टीरिया कहा जाता है, से जोड़ा गया है।
अचानक बदल गया छात्राओं का व्यवहार
बताया गया है कि घटना की शुरुआत कुछ छात्राओं के असामान्य व्यवहार से हुई। छात्राएं बिना स्पष्ट कारण रोने या हंसने लगीं। कुछ मामलों में घबराहट, कमजोरी और बेहोशी जैसी शिकायतें भी सामने आईं।
शुरुआत में स्कूल के शिक्षक और अन्य छात्र भी इस घटनाक्रम से घबरा गए। जब एक छात्रा के बाद दूसरी छात्रा में इसी तरह के लक्षण दिखाई देने लगे तो मामले ने और गंभीर रूप ले लिया।
यही वह समय था जब अफवाहों ने तेजी पकड़नी शुरू की। कुछ लोगों ने इसे भूत-प्रेत से जोड़ना शुरू कर दिया। कुछ छात्राओं द्वारा रात में घुंघरुओं जैसी आवाजें सुनाई देने का दावा किए जाने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई। इससे पहले से मौजूद डर और बढ़ गया।
600 से ज्यादा विद्यार्थियों ने छोड़ा हॉस्टल
अफवाहों का असर इतना व्यापक हुआ कि बड़ी संख्या में अभिभावक अपनी बेटियों को लेने स्कूल पहुंच गए। कई परिवार छात्राओं को अपने साथ घर ले गए। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 600 से ज्यादा विद्यार्थियों ने कुछ दिनों के भीतर हॉस्टल छोड़ दिया।
यह स्थिति स्कूल प्रबंधन के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई। जिस परिसर में सैकड़ों बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे थे, वहां अचानक बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की अनुपस्थिति हो गई।
कुछ अभिभावकों ने अपनी बेटियों को पारंपरिक उपचार करने वाले स्थानीय लोगों के पास भी ले जाने की कोशिश की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कई परिवारों को विश्वास था कि छात्राओं पर किसी तरह की अलौकिक शक्ति का प्रभाव हो सकता है।
लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जांच ने इस धारणा को समर्थन नहीं दिया।
महुआ के पेड़ से जोड़ दी गई पूरी घटना
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और धारणा तेजी से फैली। कुछ लोगों का मानना था कि जिस स्थान पर आश्रमशाला बनी है, वहां पहले महुआ का पेड़ था और उसे काटे जाने के बाद उचित पूजा नहीं की गई। इसी वजह से कथित तौर पर ‘आत्माओं’ के नाराज होने की कहानी सामने आई।
आदिवासी समुदायों में महुआ के पेड़ का सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व होने के कारण इस तरह की मान्यता ने लोगों के डर को और बढ़ाया हो सकता है।
हालांकि उपलब्ध चिकित्सकीय और प्रशासनिक जांच में इस तरह की अलौकिक वजह का कोई प्रमाण नहीं मिला। अधिकारियों की ओर से लोगों को अफवाहों पर भरोसा न करने और छात्राओं को दोबारा स्कूल भेजने के लिए समझाया जा रहा है।
डॉक्टरों ने बताया मास हिस्टीरिया जैसा मामला
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने छात्राओं के व्यवहार को मानसिक तनाव और सामूहिक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से जोड़कर देखा है। रिपोर्टों में इसे मास हिस्टीरिया या चयनात्मक हिस्टीरिया जैसी स्थिति के रूप में बताया गया है।
इस तरह की स्थिति में किसी समूह के एक या कुछ सदस्यों में दिखाई देने वाले शारीरिक या व्यवहार संबंधी लक्षण डर, तनाव, अफवाह और सामाजिक प्रभाव के कारण दूसरे लोगों में भी दिखाई देने लग सकते हैं।
अमरावती जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़ी मनोचिकित्सक डॉ. स्वाति सोनोन ने भी इस घटना को मास हिस्टीरिया से जोड़ते हुए कहा कि एक बार किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई देने के बाद आसपास के लोग उन्हें देखकर उसी तरह का व्यवहार दोहरा सकते हैं। उन्होंने माता-पिता की काउंसलिंग को महत्वपूर्ण बताया है।
क्या होता है मास हिस्टीरिया?
मास हिस्टीरिया को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इसका मतलब यह नहीं है कि लोग जानबूझकर नाटक कर रहे हैं। व्यक्ति को वास्तव में शारीरिक या भावनात्मक लक्षण महसूस हो सकते हैं।
किसी समूह में अचानक डर, अफवाह या तनाव की स्थिति बनने पर कुछ लोगों में चक्कर, कमजोरी, सिरदर्द, बेहोशी, घबराहट, रोना, हंसना या शरीर के किसी हिस्से को सामान्य तरीके से इस्तेमाल करने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
कई बार जांच में कोई ऐसी शारीरिक बीमारी नहीं मिलती जो इन सभी लक्षणों को समझा सके। इसके बावजूद व्यक्ति के अनुभव और परेशानी वास्तविक हो सकती है।
इसीलिए ऐसी स्थिति में मरीज का मजाक उड़ाना या उसे झूठा बताना सही तरीका नहीं है। शांत वातावरण, चिकित्सकीय जांच, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और परिवार की समझ महत्वपूर्ण होती है।
अफवाह ने बढ़ाया डर
डोमा की घटना में सबसे महत्वपूर्ण पहलू अफवाहों का फैलना माना जा रहा है। शुरुआत में कुछ छात्राओं के असामान्य व्यवहार की जानकारी सामने आई। इसके बाद उस घटना को अलग-अलग कहानियों से जोड़ा जाने लगा।
किसी ने भूत देखने की बात कही, किसी ने घुंघरुओं की आवाज सुनने की बात बताई और किसी ने महुआ के पेड़ से जुड़ी मान्यता को कारण माना। जैसे-जैसे ऐसी बातें फैलती गईं, लोगों का डर भी बढ़ता गया।
यही डर छात्राओं और उनके परिवारों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। एक छात्रा के असामान्य व्यवहार को देखने के बाद दूसरी छात्राओं में भी चिंता और तनाव बढ़ना संभव है।
मनोचिकित्सकों के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में अफवाहों को रोकना और सही जानकारी लोगों तक पहुंचाना बेहद जरूरी होता है।
हॉस्टल की परिस्थितियों पर भी उठे सवाल
इस घटना के बाद हॉस्टल की परिस्थितियों को लेकर भी चर्चा शुरू हुई। रिपोर्टों में हॉस्टल के कमरों में पर्याप्त हवा आने-जाने की व्यवस्था न होने और कमरों में अधिक भीड़ होने की बात सामने आई है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल हॉस्टल की संरचना ही छात्राओं के व्यवहार का कारण थी। मानसिक तनाव कई कारणों से पैदा हो सकता है और किसी एक वजह को जिम्मेदार ठहराने से पहले विशेषज्ञ जांच जरूरी होती है।
फिर भी बच्चों के लिए सुरक्षित, हवादार और पर्याप्त जगह वाला आवासीय वातावरण जरूरी है। खासकर उन स्कूलों में जहां बड़ी संख्या में बच्चे लंबे समय तक हॉस्टल में रहते हैं।
प्रशासन ने किया स्कूल का दौरा
मामला बढ़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने भी स्कूल परिसर का दौरा किया। अधिकारियों को कथित अलौकिक गतिविधियों से जुड़े दावों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।
स्वास्थ्य टीमों ने भी स्थिति का आकलन किया। अधिकारियों की ओर से अभिभावकों को समझाने का प्रयास किया गया कि छात्राओं के व्यवहार को भूत-प्रेत से जोड़ना उचित नहीं है।
इस बीच महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति भी छात्राओं और अभिभावकों के संपर्क में आई। समिति ने लोगों से अपील की कि वे अंधविश्वास और अफवाहों के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न होने दें।
पढ़ाई पर पड़ा बड़ा असर
घटना का सबसे बड़ा असर छात्राओं की शिक्षा पर पड़ा है। जिन बच्चियों को हॉस्टल में रहकर नियमित पढ़ाई करनी थी, उनमें से बड़ी संख्या घर लौट गई।
हालांकि बाद में स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने की खबर सामने आई। स्कूल प्रशासन और सामाजिक संगठनों की कोशिश है कि अभिभावकों का डर दूर किया जाए और छात्राओं को सुरक्षित माहौल में वापस लाया जाए।
रिपोर्टों के अनुसार छात्राओं की वापसी को आसान बनाने के लिए नया हॉस्टल भी तैयार किया जा रहा है। महाराष्ट्र टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक डोमा आश्रमशाला के लिए 288 बेड वाला नया हॉस्टल तैयार किया जा रहा है, जिसे 1 सितंबर से उपयोग में लाने की योजना बताई गई है।
डर का इलाज अफवाह नहीं, सही जानकारी
डोमा की घटना एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा करती है कि जब बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे तो समाज की पहली प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए?
किसी भी असामान्य लक्षण को तुरंत भूत-प्रेत या अलौकिक शक्ति से जोड़ने के बजाय पहले चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। खासकर बच्चों और किशोरों के मामले में मानसिक तनाव, डर, दबाव और सामाजिक वातावरण को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।
अगर किसी बच्चे में अचानक बेहोशी, घबराहट, असामान्य व्यवहार, लगातार रोना या अन्य लक्षण दिखाई दें तो परिवार और स्कूल को उसे डराने के बजाय शांत वातावरण देना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।
अब छात्राओं की वापसी पर जोर
डोमा की आश्रमशाला में हुई घटना ने न केवल छात्राओं और उनके परिवारों को प्रभावित किया, बल्कि पूरे इलाके में अंधविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चर्चा भी छेड़ दी है।
एक तरफ परिवारों के मन में डर है, तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि घटना को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
फिलहाल प्रशासन, स्कूल प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग और अंधश्रद्धा विरोधी संगठन छात्राओं को भरोसा दिलाने और उनकी पढ़ाई फिर से सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे अहम बात यह है कि छात्राओं के रोने, हंसने या बेहोश होने की घटनाओं को बिना जांच के किसी अलौकिक शक्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध चिकित्सकीय आकलन इसे मानसिक तनाव और सामूहिक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से जोड़ते हैं। ऐसे मामलों में डर और अफवाह समस्या को बढ़ा सकते हैं, जबकि सही जानकारी, काउंसलिंग और सुरक्षित माहौल स्थिति को सामान्य करने में मदद कर सकते हैं।

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