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स्निफर डॉग ने 2 KM दूर पहुंचाया संदिग्ध तक, पैंट पर मिला खून भी बना बड़ा सुराग… फिर DNA रिपोर्ट ने खोल दिया ऐसा राज कि बदल गई पूरी कहानी!



महाराष्ट्र के पुणे जिले से हत्या के एक ऐसे मामले की कहानी सामने आई है, जिसमें पुलिस की जांच के दौरान दो ऐसे सुराग मिले थे, जिनसे मामला लगभग सुलझा हुआ नजर आ रहा था। एक तरफ स्निफर डॉग घटनास्थल से करीब दो किलोमीटर दूर एक संदिग्ध व्यक्ति के घर तक पहुंच गया था, तो दूसरी तरफ पुलिस को उसके कपड़ों पर खून के धब्बे भी मिले थे। इन दोनों बातों ने जांच की दिशा आरोपी की तरफ मोड़ दी।

लेकिन जब यही मामला अदालत पहुंचा तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कोर्ट ने कहा कि किसी स्निफर डॉग का किसी व्यक्ति की ओर जाना या उसके पास जाकर प्रतिक्रिया देना अपने आप में हत्या का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता। वहीं, आरोपी की पैंट पर मिले खून के धब्बे भी मृतक से वैज्ञानिक रूप से नहीं जोड़े जा सके। आखिरकार संदेह के आधार पर गिरफ्तार किए गए 37 वर्षीय कैजुअल वर्कर को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया।

यह मामला एक बार फिर बताता है कि पुलिस जांच में कोई सुराग कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न लगे, अदालत में दोष साबित करने के लिए उसके साथ ठोस, वैज्ञानिक और विश्वसनीय प्रमाण होना जरूरी है।

1 मार्च 2024 को हुआ था हमला

मामला 1 मार्च 2024 का बताया गया है। प्रवीण मलेकर नाम के एक लोन रिकवरी एजेंट पर घर लौटते समय जानलेवा हमला किया गया था। हमले के बाद उनकी हालत गंभीर हो गई और बाद में उनकी मौत हो गई।

प्रवीण की मौत के बाद पुलिस ने इसे हत्या का मामला मानकर जांच शुरू की। घटना के पीछे कौन था, हमला क्यों किया गया और हमलावर किस रास्ते से भागा, इन तमाम सवालों के जवाब तलाशे जाने लगे।

पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती हमलावर तक पहुंचने की थी। ऐसे मामलों में घटनास्थल से मिलने वाले भौतिक साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी, मोबाइल लोकेशन और दूसरे तकनीकी सबूत अहम होते हैं। इसी जांच के दौरान पुलिस ने सुराग तलाशने के लिए स्निफर डॉग की मदद लेने का फैसला किया।

स्निफर डॉग ने दिखाई ऐसी दिशा, पुलिस का शक गहराया

पुलिस के मुताबिक, स्निफर डॉग ने घटनास्थल से एक दिशा पकड़ी और करीब दो किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद एक कैजुअल वर्कर के घर के पास जाकर प्रतिक्रिया दी।

कुत्ते की इस प्रतिक्रिया को जांच में महत्वपूर्ण माना गया। पुलिस को लगा कि शायद मृतक से जुड़े किसी व्यक्ति या हमले में शामिल व्यक्ति तक पहुंचने में मदद मिल गई है।

स्निफर डॉग के संदिग्ध व्यक्ति के घर के पास पहुंचने के बाद पुलिस ने वहां रहने वाले 37 वर्षीय कैजुअल वर्कर से पूछताछ शुरू की। जांच का फोकस धीरे-धीरे उसी व्यक्ति पर केंद्रित हो गया।

हालांकि, अदालत में बाद में यह सवाल महत्वपूर्ण बन गया कि आखिर सिर्फ कुत्ते की प्रतिक्रिया के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या का आरोपी कैसे ठहराया जा सकता है?

पैंट पर मिले खून के धब्बों ने बढ़ाया शक

जांच के दौरान पुलिस को कथित तौर पर संदिग्ध व्यक्ति की पैंट पर खून के धब्बे मिले। हत्या के मामले में कपड़ों पर खून के निशान मिलना स्वाभाविक तौर पर गंभीर सुराग माना जाता है।

पुलिस के लिए यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि घटनास्थल पर एक व्यक्ति की मौत हुई थी और संदिग्ध के कपड़ों पर भी खून के धब्बे पाए गए थे।

इसके बाद जांच एजेंसियों का शक और मजबूत हो गया। ऐसा लगने लगा कि स्निफर डॉग की प्रतिक्रिया और खून के धब्बे मिलकर आरोपी को घटना से जोड़ सकते हैं।

लेकिन पुलिस जांच और अदालत में सबूत की कसौटी अलग होती है। अदालत यह देखती है कि क्या उपलब्ध साक्ष्य आरोपी को अपराध से इस तरह जोड़ते हैं कि किसी उचित संदेह की गुंजाइश न रहे।

यही वह बिंदु था जहां अभियोजन पक्ष की कहानी कमजोर पड़ने लगी।

DNA जांच से नहीं मिला निर्णायक सबूत

आरोपी की पैंट पर मिले खून के धब्बों की वैज्ञानिक जांच कराई गई। उम्मीद थी कि DNA जांच से यह पता चल सकेगा कि खून मृतक प्रवीण मलेकर का था या नहीं।

लेकिन जांच में अभियोजन पक्ष को वह मजबूत कड़ी नहीं मिली जिसकी उसे जरूरत थी। खून के धब्बों को मृतक के खून से जोड़ने वाला ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया।

रिपोर्ट में इन धब्बों से उपयोगी DNA प्रोफाइल हासिल नहीं हो पाने की बात सामने आई। इसका मतलब यह हुआ कि सिर्फ पैंट पर खून के निशान मिलने से यह साबित नहीं किया जा सका कि आरोपी हत्या के दौरान घटनास्थल पर मौजूद था या उसने ही प्रवीण मलेकर पर हमला किया था।

यही बात अदालत में आरोपी के पक्ष में महत्वपूर्ण साबित हुई।

कोर्ट ने स्निफर डॉग की प्रतिक्रिया पर क्या कहा?

बारामती की अतिरिक्त सत्र अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान स्निफर डॉग से मिले सुराग की कानूनी अहमियत पर भी विचार किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी स्निफर डॉग का किसी व्यक्ति के घर तक जाना, वहां रुकना या संदिग्ध व्यक्ति की ओर प्रतिक्रिया देना अपने आप में हत्या का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

स्निफर डॉग जांच एजेंसियों के लिए उपयोगी साधन हो सकता है। उसकी मदद से पुलिस को किसी दिशा में जांच आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन अदालत में सिर्फ कुत्ते के व्यवहार को आरोपी की दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।

यानी पुलिस के लिए यह एक सुराग था, लेकिन अदालत के लिए यह अकेले पर्याप्त सबूत नहीं था।

शक और सबूत में होता है बड़ा अंतर

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि शक और कानूनी सबूत एक चीज नहीं होते।

पुलिस को किसी व्यक्ति पर संदेह हो सकता है। घटनास्थल से मिली कोई वस्तु उस व्यक्ति की ओर इशारा कर सकती है। किसी तकनीकी जांच से भी संदेह पैदा हो सकता है। लेकिन अदालत में दोष सिद्ध करने के लिए इन सभी सुरागों को विश्वसनीय साक्ष्यों की श्रृंखला से जोड़ना जरूरी होता है।

अगर उस श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी गायब हो जाए, तो अभियोजन की पूरी कहानी कमजोर हो सकती है।

इस मामले में भी पुलिस के पास दो प्रमुख बातें थीं—स्निफर डॉग का संदिग्ध व्यक्ति के घर तक पहुंचना और उसकी पैंट पर खून के धब्बे मिलना। लेकिन DNA जांच से खून को मृतक से जोड़ने वाला ठोस प्रमाण नहीं मिला और स्निफर डॉग की प्रतिक्रिया को अकेले निर्णायक सबूत नहीं माना गया।

हत्या हुई थी, लेकिन आरोपी कौन था यह साबित नहीं हुआ

अदालत ने इस बात को स्वीकार किया कि प्रवीण मलेकर की मौत सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुई थी और मामला हत्या का था। यानी हत्या की घटना पर अदालत को कोई संदेह नहीं था।

लेकिन किसी व्यक्ति की हत्या होना और किसी खास आरोपी द्वारा वह हत्या किया जाना—दो अलग-अलग सवाल हैं।

अभियोजन पक्ष को यह साबित करना था कि जिस 37 वर्षीय कैजुअल वर्कर को आरोपी बनाया गया, वही प्रवीण मलेकर की हत्या में शामिल था। इसके लिए उसे ऐसे ठोस प्रमाण पेश करने थे जो आरोपी और अपराध के बीच सीधा संबंध स्थापित करते।

अदालत के सामने उपलब्ध सबूत उस स्तर तक नहीं पहुंच सके।

37 वर्षीय कैजुअल वर्कर को मिली राहत

अंततः बारामती की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 37 वर्षीय कैजुअल वर्कर को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।

यह फैसला इस बात पर आधारित था कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर पाया। संदेह मजबूत होने के बावजूद उसे कानूनी रूप से दोष सिद्ध करने लायक प्रमाण में नहीं बदला जा सका।

आरोपी के खिलाफ पुलिस की जांच में सामने आए दोनों प्रमुख सुराग अदालत की कसौटी पर निर्णायक नहीं बन सके।

पुलिस जांच के लिए क्या मायने रखता है यह मामला?

यह मामला जांच एजेंसियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। किसी भी हत्या की जांच में शुरुआती सुराग महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन सिर्फ एक संकेत के आधार पर पूरी जांच को किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित करना जोखिम भरा हो सकता है।

स्निफर डॉग ने पुलिस को जिस दिशा में पहुंचाया, वहां से आगे दूसरे स्वतंत्र सबूत जुटाना जरूरी था। इसी तरह कपड़ों पर खून के धब्बे मिलने के बाद DNA या अन्य फोरेंसिक जांच से उसकी उत्पत्ति और घटना से संबंध साबित करना आवश्यक था।

अगर वैज्ञानिक जांच उस कड़ी को मजबूत नहीं करती, तो अदालत में अभियोजन के लिए परेशानी पैदा होना स्वाभाविक है।

इस केस से सामने आया बड़ा सबक

पुणे के इस मामले की सबसे बड़ी सीख यही है कि अपराध की जांच में सुराग और सबूत के बीच का अंतर बेहद महत्वपूर्ण होता है।

स्निफर डॉग का घटनास्थल से दो किलोमीटर दूर किसी घर तक पहुंचना निश्चित रूप से जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। आरोपी की पैंट पर खून के धब्बे मिलना भी जांचकर्ताओं के लिए गंभीर संकेत हो सकता है। लेकिन जब इन दोनों सुरागों को वैज्ञानिक और कानूनी प्रमाण का मजबूत समर्थन नहीं मिला, तो अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराने से इनकार कर दिया।

आखिरकार अदालत ने यही माना कि किसी व्यक्ति को सिर्फ मजबूत संदेह के आधार पर हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपराध साबित करने के लिए विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।

इस तरह जिस मामले में शुरुआत में पुलिस को लगा था कि स्निफर डॉग और खून के धब्बों ने हत्या की गुत्थी लगभग सुलझा दी है, वही मामला अदालत में पहुंचकर पूरी तरह बदल गया। मृतक की हत्या का सच अपनी जगह कायम रहा, लेकिन जिस व्यक्ति पर पुलिस का शक गया था, उसके खिलाफ सबूत उस शक को दोषसिद्धि में बदलने के लिए पर्याप्त नहीं निकले।

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