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कचरे के ढेर में मिला डरावना फंगस, वैज्ञानिकों ने जब जांच की तो खुला चौंकाने वाला राज… प्लास्टिक पर करता है ये काम!



पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कचरे के बीच वैज्ञानिकों को मिला एक ऐसा फंगस पर्यावरण की दुनिया में लंबे समय से चल रही एक बड़ी समस्या के खिलाफ उम्मीद की किरण बन गया है। जिस चीज को देखकर आम आदमी शायद घबरा जाए, वैज्ञानिकों की नजर में वही जीव बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि 2017 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन का हिस्सा है, जिसमें इस्लामाबाद के एक नगरपालिका कचरा निपटान स्थल की मिट्टी से Aspergillus tubingensis नाम के फंगस को अलग किया गया था। 

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस फंगस में पॉलिएस्टर पॉलीयूरेथेन (PU) को जैविक तरीके से नुकसान पहुंचाने की क्षमता है। पॉलीयूरेथेन कई रोजमर्रा और औद्योगिक उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला मजबूत पॉलिमर है। इसकी मजबूती ही इसे उपयोगी बनाती है, लेकिन यही गुण इसके पर्यावरण में टूटने को मुश्किल भी बनाता है।

इस खोज ने वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—क्या कचरे के ढेर में मिला यह छोटा सा फंगस भविष्य में मुश्किल प्लास्टिक कचरे से निपटने की नई तकनीक की नींव बन सकता है?

हालांकि अभी इसे प्लास्टिक संकट का तैयार समाधान कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन प्रयोगशाला में मिले परिणाम निश्चित रूप से वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आखिर कचरे के ढेर में क्या मिला?

2017 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार शोधकर्ताओं ने इस फंगस को इस्लामाबाद के एक सामान्य नगरपालिका कचरा निपटान स्थल की मिट्टी से अलग किया था। इसके बाद उसकी पहचान Aspergillus tubingensis के रूप में की गई। पहचान के लिए कॉलोनी की बनावट, सूक्ष्म संरचना और आणविक तथा फाइलोजेनेटिक विश्लेषण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। 

इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह जांचने की कोशिश की कि क्या यह फंगस वास्तव में पॉलीयूरेथेन पर असर डाल सकता है।

यहीं से प्रयोग के परिणामों ने शोधकर्ताओं का ध्यान खींचना शुरू किया।

फंगस को अलग-अलग परिस्थितियों में पॉलीयूरेथेन के संपर्क में रखा गया। वैज्ञानिकों ने देखा कि फंगस की मायसीलियम यानी धागेनुमा संरचनाएं प्लास्टिक की सतह पर फैलने लगीं।

लेकिन असली बदलाव सिर्फ फंगस के बढ़ने तक सीमित नहीं था।

प्लास्टिक की सतह पर क्षति के निशान दिखाई देने लगे।

माइक्रोस्कोप के नीचे दिखा हैरान करने वाला बदलाव

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक की सतह को स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप यानी SEM की मदद से देखा।

सामान्य आंखों से प्लास्टिक की सतह लगभग वैसी ही दिखाई दे सकती थी, लेकिन माइक्रोस्कोप के नीचे तस्वीर अलग थी।

शोधकर्ताओं ने सतह पर स्कैरिंग और डिग्रेडेशन के संकेत देखे। यानी फंगस केवल प्लास्टिक की सतह पर मौजूद नहीं था, बल्कि उसकी सतह की संरचना में बदलाव भी हो रहा था। 

प्लास्टिक की सतह पर खरोंच और क्षरण जैसे बदलाव इस बात का संकेत थे कि फंगस और पॉलीयूरेथेन के बीच वास्तविक जैविक-रासायनिक प्रक्रिया हो रही थी।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि प्लास्टिक के रासायनिक ढांचे में किस तरह का बदलाव हो रहा है।

दो महीने बाद प्लास्टिक के साथ क्या हुआ?

शोध में सबसे ज्यादा चर्चा जिस परिणाम की हुई, वह तरल माध्यम में किया गया प्रयोग था।

वैज्ञानिकों ने पॉलीयूरेथेन फिल्म को फंगस के साथ नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में रखा। लगभग दो महीने बाद पॉलीयूरेथेन फिल्म छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट गई। अध्ययन में इसे उस प्रयोगात्मक परिस्थिति में पूरी तरह क्षतिग्रस्त होने के रूप में दर्ज किया गया। 

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पॉलीयूरेथेन को सामान्य पर्यावरणीय परिस्थितियों में आसानी से टूटने वाला पदार्थ नहीं माना जाता।

हालांकि यहां एक बहुत जरूरी अंतर समझना होगा।

प्लास्टिक का छोटे टुकड़ों में टूटना और उसका पूरी तरह सुरक्षित प्राकृतिक पदार्थों में बदल जाना एक ही बात नहीं है।

इसलिए इस प्रयोग के परिणाम को यह कहकर पेश करना सही नहीं होगा कि फंगस कुछ ही हफ्तों में किसी भी प्लास्टिक के ढेर को पूरी तरह खत्म कर सकता है।

वैज्ञानिकों ने कैसे पता लगाया कि प्लास्टिक में बदलाव हुआ?

शोधकर्ताओं ने सिर्फ प्लास्टिक की सतह को देखकर निष्कर्ष नहीं निकाला।

उन्होंने कई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।

स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से सतह पर होने वाले भौतिक बदलावों का अध्ययन किया गया।

इसके अलावा ATR-FTIR स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल पॉलीयूरेथेन के रासायनिक बंधनों में होने वाले बदलावों का अध्ययन करने के लिए किया गया। अध्ययन में प्लास्टिक के जैविक क्षरण के दौरान रासायनिक बंधनों के बनने या टूटने के संकेत मिले। 

शोध में एस्टरेज और लाइपेज जैसी एंजाइम गतिविधियों से जुड़े संकेत भी मिले।

यही हिस्सा भविष्य के शोध के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

अगर वैज्ञानिक यह समझ पाते हैं कि फंगस के कौन से एंजाइम पॉलीयूरेथेन की संरचना पर प्रभाव डालते हैं, तो भविष्य में उन जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल करने की संभावना तलाशना आसान हो सकता है।

पॉलीयूरेथेन आखिर इतना मुश्किल क्यों है?

पॉलीयूरेथेन का इस्तेमाल कई तरह के उत्पादों में किया जाता है।

सिंथेटिक लेदर, कोटिंग, कुशन, फोम, इंसुलेशन और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में इसके अलग-अलग रूप इस्तेमाल होते हैं।

इसकी खासियत इसकी मजबूती और टिकाऊपन है।

लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से यही मजबूती समस्या बन जाती है।

किसी प्लास्टिक को लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए टिकाऊ बनाना उद्योग के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन जब वही उत्पाद कचरे में बदलता है तो उसका टूटना और निपटान चुनौती बन जाता है।

यही कारण है कि वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों की तलाश कर रहे हैं जो मुश्किल पॉलिमर को जैविक तरीके से तोड़ सकें।

क्या फंगस प्लास्टिक को ‘खा’ रहा था?

यहां भी शब्दों को लेकर सावधानी जरूरी है।

आम भाषा में ऐसी खोजों को अक्सर “प्लास्टिक खाने वाला फंगस” कहा जाता है।

लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह कहना अधिक सही होगा कि फंगस प्लास्टिक पॉलिमर की संरचना को जैविक रूप से प्रभावित या degrade करने की क्षमता दिखाता है।

फंगस प्लास्टिक को किसी इंसान की तरह ‘खा’ नहीं रहा था।

उसकी मायसीलियम और उससे जुड़ी जैविक गतिविधियां पॉलीयूरेथेन की सतह और रासायनिक संरचना पर असर डाल रही थीं।

यही प्रक्रिया वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है।

कचरे के ढेर से निकली उम्मीद

इस खोज की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि फंगस किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार नहीं किया गया था।

इसे इस्लामाबाद के नगरपालिका कचरा निपटान स्थल की मिट्टी से अलग किया गया था।

यानी जिस जगह को आमतौर पर प्रदूषण और कचरे की समस्या का प्रतीक माना जाता है, उसी पर्यावरण में मौजूद सूक्ष्मजीव ने वैज्ञानिकों को एक संभावित समाधान की ओर इशारा किया।

यह प्रकृति की एक दिलचस्प विशेषता भी दिखाता है।

सूक्ष्मजीव लगातार अपने आसपास के वातावरण के अनुरूप ढलते रहते हैं। जहां उन्हें जटिल कार्बनिक या सिंथेटिक पदार्थ मिलते हैं, वहां कुछ सूक्ष्मजीव ऐसे रासायनिक यौगिकों पर भी असर डालने की क्षमता विकसित कर सकते हैं जिन्हें दूसरे जीव आसानी से नहीं तोड़ पाते।

लेकिन क्या इसे सीधे कचरे के ढेर में डाल सकते हैं?

नहीं।

यह सबसे महत्वपूर्ण सावधानी है।

2017 के अध्ययन में प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में पॉलीयूरेथेन पर फंगस की क्षमता दिखाई गई थी। अध्ययन में अलग-अलग माध्यमों और परिस्थितियों में इसका परीक्षण किया गया था, और तरल माध्यम में दो महीने बाद फिल्म के छोटे टुकड़ों में टूटने का परिणाम मिला।

इसका मतलब यह नहीं कि किसी शहर के लैंडफिल में फंगस छोड़ देने से वहां पड़ा पूरा प्लास्टिक कचरा तेजी से खत्म हो जाएगा।

असल दुनिया में तापमान, नमी, ऑक्सीजन, दूसरे सूक्ष्मजीव, प्लास्टिक की संरचना और कई अन्य कारक परिणाम बदल सकते हैं।

इसके अलावा फंगस के पर्यावरण में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के अपने जोखिम भी हो सकते हैं।

इसलिए ऐसी तकनीक को प्रयोगशाला से औद्योगिक स्तर तक पहुंचाने से पहले व्यापक परीक्षण जरूरी होगा।

असली उम्मीद फंगस से ज्यादा उसके एंजाइमों में हो सकती है

भविष्य के लिए सबसे दिलचस्प संभावना शायद यह है कि वैज्ञानिक पूरे फंगस को इस्तेमाल करने के बजाय उसके द्वारा बनाए जाने वाले एंजाइमों की पहचान करें।

अगर किसी विशेष एंजाइम की मदद से पॉलीयूरेथेन की रासायनिक संरचना को नियंत्रित तरीके से तोड़ा जा सकता है, तो वैज्ञानिक उस प्रक्रिया को औद्योगिक प्रणाली में इस्तेमाल करने के तरीके खोज सकते हैं।

इससे संभावित रूप से जैविक प्लास्टिक उपचार की ऐसी तकनीक विकसित हो सकती है जिसमें नियंत्रित परिस्थितियों में कठिन पॉलिमर को छोटे रासायनिक घटकों में तोड़ा जाए।

लेकिन यह अभी शोध का विषय है, तैयार तकनीक नहीं।

प्लास्टिक संकट के बीच क्यों महत्वपूर्ण है खोज?

दुनिया भर में प्लास्टिक कचरा लगातार बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है।

रीसाइक्लिंग, पुन: उपयोग, यांत्रिक प्रसंस्करण और रासायनिक उपचार जैसी कई तकनीकें पहले से इस्तेमाल की जा रही हैं।

लेकिन हर प्रकार के प्लास्टिक को समान तरीके से रिसाइकिल करना आसान नहीं होता।

कुछ जटिल पॉलिमर के लिए आर्थिक और तकनीकी दोनों चुनौतियां मौजूद हैं।

ऐसे में अगर प्रकृति से मिले सूक्ष्मजीवों की मदद से मुश्किल पॉलिमर को तोड़ने की प्रक्रिया विकसित होती है, तो यह मौजूदा तकनीकों के साथ एक अतिरिक्त विकल्प बन सकती है।

क्या यह दुनिया का प्लास्टिक खत्म कर देगा?

फिलहाल इसका जवाब नहीं है।

यह कहना कि Aspergillus tubingensis दुनिया के प्लास्टिक संकट का समाधान बन चुका है, वैज्ञानिक अध्ययन से कहीं आगे निकल जाना होगा।

यह खोज एक महत्वपूर्ण शुरुआती संकेत है।

वैज्ञानिकों ने एक ऐसे फंगस की क्षमता दर्ज की है जो नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में polyester polyurethane को degrade करने में सक्षम पाया गया। लेकिन इसे बड़े पैमाने पर, सुरक्षित और आर्थिक रूप से उपयोग करने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। 

यानी असली कहानी फंगस की खोज पर खत्म नहीं होती।

असल कहानी अब शुरू होती है।

अगला सवाल—प्रयोगशाला से फैक्ट्री तक कब पहुंचेगा यह फंगस?

अगर वैज्ञानिक यह पता लगाने में सफल होते हैं कि Aspergillus tubingensis पॉलीयूरेथेन को किस जैव-रासायनिक प्रक्रिया से तोड़ता है, तो अगला कदम उस प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना होगा।

इसके बाद बड़े पैमाने पर परीक्षण, सुरक्षा अध्ययन, लागत का आकलन और पर्यावरणीय प्रभावों की जांच करनी होगी।

किसी भी नई जैविक तकनीक को सीधे प्रकृति में इस्तेमाल करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उससे कोई नया पर्यावरणीय खतरा पैदा न हो।

इसलिए इस फंगस को फिलहाल संभावित जैविक समाधान के रूप में देखना ज्यादा उचित है।

इस्लामाबाद के कचरा निपटान स्थल की मिट्टी से मिला Aspergillus tubingensis फंगस वैज्ञानिकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2017 के अध्ययन में इसने polyester polyurethane को प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में नुकसान पहुंचाने और दो महीने के तरल-माध्यम परीक्षण में फिल्म को छोटे टुकड़ों में तोड़ने की क्षमता दिखाई।

माइक्रोस्कोप और रासायनिक विश्लेषण से प्लास्टिक की सतह तथा रासायनिक संरचना में बदलाव के संकेत भी मिले।

लेकिन इस खोज को प्लास्टिक खत्म करने वाली जादुई तकनीक समझना गलत होगा।

फिलहाल यह एक वैज्ञानिक संकेत है—एक ऐसा संकेत, जो बताता है कि शायद प्रकृति के भीतर ही कुछ ऐसे जीव मौजूद हैं जिनकी मदद से इंसान अपनी बनाई हुई सबसे कठिन पर्यावरणीय समस्याओं में से एक से लड़ने के नए तरीके खोज सकता है।

और इस कहानी का सबसे बड़ा सस्पेंस शायद यही है—क्या पाकिस्तान के कचरे के ढेर में मिला यह छोटा सा फंगस आने वाले वर्षों में दुनिया के प्लास्टिक कचरे के खिलाफ किसी बड़ी तकनीकी क्रांति की शुरुआत बनेगा?
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