न लाश मिली, न DNA मैच हुआ... फिर भी पुलिस इंस्पेक्टर को उम्रकैद! एक छोटी सी चीज ने खोला स्वीटी पटेल मर्डर का राज
गुजरात के वडोदरा से सामने आया स्वीटी पटेल हत्याकांड एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब पांच साल पुराने इस सनसनीखेज मामले में अदालत ने तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर अजय अमृत देसाई को हत्या और सबूत मिटाने का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जांच एजेंसियों को स्वीटी की पूरी लाश नहीं मिली और बुरी तरह जले अवशेषों से उपयोगी DNA प्रोफाइल भी तैयार नहीं हो सकी। इसके बावजूद परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक सबूतों की कड़ियों को जोड़कर अदालत ने दोषसिद्धि की।
इस मामले में देसाई के कथित सहयोगी और होटल कारोबारी कीर्तिसिंह डोलुभा जाडेजा को भी सबूत मिटाने में मदद करने का दोषी पाया गया। अदालत ने उसे पांच साल के कठोर कारावास और दो लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। देसाई पर हत्या के साथ सबूत मिटाने का अपराध भी साबित हुआ और उस पर जुर्माना लगाया गया।
एक रिश्ते से शुरू हुई कहानी हत्या तक पहुंची
स्वीटी पटेल का नाम पहली बार 2021 में उस समय सामने आया था, जब उनके अचानक गायब होने के बाद मामला रहस्यमय बन गया था। पुलिस जांच में सामने आया कि स्वीटी का पुलिस इंस्पेक्टर अजय देसाई के साथ करीबी रिश्ता था। दोनों के संबंधों और उनके बीच हुए विवाह को लेकर भी विवाद की स्थिति थी।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, स्वीटी और देसाई ने मंदिर में विवाह किया था। देसाई पहले से विवाहित था और उसका एक अलग पारिवारिक जीवन भी था। स्वीटी से उसका एक बेटा भी हुआ। अभियोजन पक्ष के अनुसार, स्वीटी चाहती थी कि देसाई उनके रिश्ते को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करे और उसे सामाजिक तथा वैवाहिक पहचान मिले। इसी मुद्दे को लेकर दोनों के बीच तनाव बढ़ता गया।
4-5 जून की रात क्या हुआ?
अभियोजन पक्ष की कहानी के मुताबिक, 4 जून 2021 की रात से 5 जून की सुबह के बीच स्वीटी और देसाई के बीच विवाद हुआ। आरोप था कि देसाई ने स्वीटी का गला घोंटकर हत्या कर दी।
इसके बाद कथित तौर पर शव को एक वाहन में ले जाया गया। जांच में यह आरोप सामने आया कि शव को वडोदरा के पास एक सुनसान और बंद पड़े होटल परिसर में ले जाकर जला दिया गया। इस काम में कीर्तिसिंह जाडेजा की मदद लेने का आरोप लगा।
शव को इस तरह जलाने का कथित उद्देश्य सबूत खत्म करना था। आग इतनी भीषण थी कि बरामद अवशेषों से DNA के जरिए स्वीटी की पहचान स्थापित नहीं हो सकी।
यहीं से यह मामला सामान्य हत्या की जांच के बजाय एक बेहद जटिल 'बिना शव के हत्या' का केस बन गया।
छह दिन बाद दर्ज कराई गुमशुदगी
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक यह भी रही कि स्वीटी के गायब होने के कुछ दिनों बाद देसाई ने खुद पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी। रिपोर्टों के अनुसार, 11 जून 2021 को यह शिकायत दर्ज हुई।
एक पुलिस अधिकारी होने के कारण उसके व्यवहार और शिकायत दर्ज कराने के तरीके ने जांचकर्ताओं के सामने कई सवाल खड़े किए। बाद में मामला अहमदाबाद क्राइम ब्रांच को सौंपा गया और जांच ने अलग दिशा पकड़ी।
जली हुई हड्डियां भी नहीं बता सकीं पूरी कहानी
जांच के दौरान जिस जगह पर शव जलाए जाने का आरोप था, वहां से जले हुए मानव अवशेष, राख और कपड़ों से जुड़े सामान बरामद किए गए। लेकिन शव इतनी बुरी तरह जल चुका था कि फोरेंसिक विशेषज्ञ DNA से उसकी पहचान स्थापित नहीं कर पाए।
यह अभियोजन पक्ष के लिए बड़ी चुनौती थी। सामान्य हत्या के मामलों में शव की पहचान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु के कारण जैसे सबूत अहम भूमिका निभाते हैं। यहां अदालत के सामने वैसी स्थिति नहीं थी।
इसके बावजूद जांचकर्ताओं ने उन छोटे-छोटे सुरागों पर ध्यान दिया जो घटनास्थल और संदिग्धों के व्यवहार से जुड़े थे।
पिघला हुआ मंगलसूत्र बना अहम कड़ी
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा पिघले हुए सोने के गहनों की हुई। जांच के दौरान पिघला हुआ मंगलसूत्र और सोने की चूड़ियां बरामद हुईं।
इन गहनों को स्वीटी की तस्वीरों में दिखाई देने वाले आभूषणों से जोड़ने की कोशिश की गई। अदालत के सामने यह साक्ष्य महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में आया, खासकर तब जब DNA के जरिए जले हुए अवशेषों की पहचान नहीं हो सकी थी।
यानी जिस सबूत को कथित तौर पर आग में नष्ट करने की कोशिश की गई थी, उसी आग से बचा हुआ सोना बाद में जांच की महत्वपूर्ण कड़ी बन गया।
मोबाइल फोन ने भी जांच को दिशा दी
स्वीटी के गायब होने के बाद उसका मोबाइल फोन घर पर ही मिला था। यह बात जांचकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वह फोन उसके नियमित इस्तेमाल में था।
जांच में देसाई की गतिविधियों और मोबाइल टावर डेटा की भी पड़ताल की गई। रिपोर्टों के अनुसार, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और सेल-टावर लोकेशन से देसाई तथा जाडेजा की गतिविधियों को उस स्थान से जोड़ने की कोशिश की गई जहां कथित तौर पर शव जलाया गया था।
इसके अलावा देसाई के वाहन की स्थिति और उसके बाद की गतिविधियां भी जांच का हिस्सा बनीं।
एक-एक करके अलग-अलग घटनाएं एक ऐसी श्रृंखला बनाती गईं जिसे अभियोजन पक्ष ने हत्या की साजिश और सबूत मिटाने की कोशिश के तौर पर अदालत के सामने रखा।
40 से ज्यादा गवाह मुकर गए
इस मामले का एक और बड़ा मोड़ ट्रायल के दौरान आया। अभियोजन पक्ष के कई गवाहों ने अदालत में अपने पहले के बयानों का समर्थन नहीं किया। रिपोर्टों के अनुसार, 40 से ज्यादा गवाहों के hostile होने के बावजूद अभियोजन पक्ष ने अन्य सबूतों के आधार पर अपना केस कायम रखा।
स्वीटी के भाई जयदीप पटेल का नाम भी उन गवाहों में आया जिन्होंने बाद में अभियोजन पक्ष का पूरा समर्थन नहीं किया। रिपोर्टों के मुताबिक, उसने शुरुआत में देसाई के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन ट्रायल के दौरान उसका रुख बदल गया।
स्वीटी के सौतेले भाई और कुछ पंच गवाहों के बयान भी अभियोजन के लिए चुनौती बने।
लेकिन अदालत ने केवल गवाहों के मुकर जाने के आधार पर पूरा मामला खारिज नहीं किया।
अदालत ने परिस्थितिजन्य सबूतों की पूरी कड़ी देखी
इस मामले में अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि जब कोई स्पष्ट और पूरी लाश मौजूद नहीं है, तब हत्या कैसे साबित की जाए?
अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला पर विचार किया। इनमें स्वीटी का देसाई के साथ होना, उसके गायब होने के बाद की गतिविधियां, मोबाइल फोन का घर पर रह जाना, वाहन की गतिविधि, कथित घटनास्थल से बरामद जले अवशेष, पिघले आभूषण और मोबाइल टावर से संबंधित साक्ष्य शामिल थे।
अदालत ने इन परिस्थितियों को अलग-अलग घटनाएं मानने के बजाय एक साथ जोड़कर देखा। इसी आधार पर अभियोजन पक्ष की कहानी को पर्याप्त रूप से विश्वसनीय माना गया।
बिना शव के भी हत्या साबित हो सकती है
इस मामले का सबसे अहम कानूनी पहलू यही है कि किसी हत्या के मामले में दोषसिद्धि के लिए हर स्थिति में पूरी लाश का बरामद होना अनिवार्य नहीं है।
अगर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला इतनी मजबूत हो कि उससे यह साबित हो सके कि व्यक्ति की मृत्यु हुई और आरोपी ने ही उसे मारा तथा बाद में सबूत मिटाने की कोशिश की, तो अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला कर सकती है।
स्वीटी पटेल मामले में भी यही हुआ। शरीर की पहचान DNA से स्थापित नहीं हो पाई, लेकिन अदालत ने अन्य परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्यों को पर्याप्त माना।
पुलिस अधिकारी होने का भी नहीं मिला फायदा
इस मामले ने पुलिस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। जिस व्यक्ति पर हत्या का आरोप लगा, वह खुद पुलिस इंस्पेक्टर था और जांच प्रक्रिया की बारीकियों से परिचित था।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पुलिस अधिकारी होने के कारण देसाई को पता था कि किन सबूतों को कैसे नष्ट किया जा सकता है। इसी वजह से शव को कथित तौर पर जलाने और बाद में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराने की कहानी मामले को और गंभीर बनाती है।
हालांकि, अदालत ने अंततः उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन किया और उसे दोषी करार दिया।
अदालत का बड़ा फैसला
वडोदरा की 8वीं अतिरिक्त सत्र अदालत के न्यायाधीश एम.बी. कोटक ने 72 पन्नों के फैसले में अजय देसाई को हत्या और सबूत मिटाने का दोषी ठहराया। उसे उम्रकैद की सजा और जुर्माना लगाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, सबूत मिटाने से जुड़े अपराध के लिए भी अलग सजा दी गई, लेकिन सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
वहीं, कीर्तिसिंह जाडेजा को सबूत मिटाने में मदद करने के मामले में पांच साल के कठोर कारावास और दो लाख रुपये जुर्माने की सजा दी गई। अदालत के फैसले के बाद उसकी जमानत रद्द कर उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पांच साल बाद मिला कानूनी निष्कर्ष
स्वीटी पटेल के गायब होने के बाद इस मामले ने गुजरात में काफी चर्चा बटोरी थी। एक महिला अचानक गायब हुई, पुलिस अधिकारी पर संदेह गया, फिर जले हुए अवशेष मिले और जांचकर्ताओं को ऐसे सबूतों के सहारे आगे बढ़ना पड़ा जिनमें से कई प्रत्यक्ष नहीं थे।
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि DNA पहचान उपलब्ध नहीं थी और कई गवाह भी अदालत में अभियोजन पक्ष के साथ नहीं खड़े हुए।
फिर भी अदालत ने गवाहों के बदलते बयानों के अलावा उपलब्ध भौतिक, फोरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को एक साथ देखा। अंततः अदालत ने माना कि सबूतों की कड़ी आरोपी तक पहुंचती है।
एक पिघला मंगलसूत्र और कई सवाल
स्वीटी पटेल हत्याकांड की सबसे चर्चित बात शायद यही रहेगी कि जिस मामले में पूरी लाश तक बरामद नहीं हो सकी, उसमें पिघला हुआ मंगलसूत्र और सोने की चूड़ियां जैसे छोटे दिखने वाले सुराग जांच की महत्वपूर्ण कड़ी बन गए।
इस केस ने यह भी दिखाया कि किसी अपराध के बाद आरोपी अगर सबूत मिटाने की कोशिश करे, तब भी हर सुराग खत्म होना जरूरी नहीं है। मोबाइल रिकॉर्ड, वाहन की गतिविधि, घटनास्थल, आभूषण, गवाहों के शुरुआती बयान और आरोपी के व्यवहार जैसी अलग-अलग कड़ियां मिलकर पूरी तस्वीर बना सकती हैं।
पांच साल बाद आए इस फैसले ने स्वीटी पटेल हत्याकांड को गुजरात के चर्चित बिना शव वाली हत्या के मामलों में शामिल कर दिया है। अदालत का फैसला यह भी बताता है कि किसी मामले में एक अकेला सबूत कमजोर पड़ सकता है, लेकिन मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला न्यायालय के सामने आरोपी के खिलाफ निर्णायक बन सकती है।
डिस्क्लेमर: यह समाचार उपलब्ध अदालती/मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के बाद भी अपील का कानूनी अधिकार बना रहता है और अंतिम न्यायिक स्थिति संबंधित उच्च अदालतों के आदेशों पर निर्भर कर सकती है।

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