ऑक्टोपस के शरीर में मिला रहस्यमयी ‘कट’, वैज्ञानिक भी हैरान… टूटकर भी कैसे काम करता रहा राइबोसोम?
नई दिल्ली: ऑक्टोपस अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता, रंग बदलने की क्षमता और बेहद जटिल तंत्रिका तंत्र के लिए जाना जाता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके शरीर में एक ऐसी अनोखी जैविक प्रक्रिया खोजी है, जिसने शोधकर्ताओं को भी हैरान कर दिया है। यह खोज कोशिका के उस महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ी है, जिसे राइबोसोम कहा जाता है। राइबोसोम शरीर में प्रोटीन बनाने वाली प्रमुख मशीन है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ऑक्टोपस के राइबोसोम में मौजूद एक खास RNA हिस्सा प्राकृतिक रूप से एक निश्चित स्थान पर टूटकर दो हिस्सों में बंट जाता है। हैरानी की बात यह है कि टूटने के बावजूद राइबोसोम का काम प्रभावित नहीं होता। बल्कि प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में यह बदलाव प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया को ज्यादा सटीक बनाता दिखाई दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब शोधकर्ताओं ने इसी बदलाव की नकल बैक्टीरिया के राइबोसोम में की। प्रयोग में बैक्टीरिया की प्रोटीन बनाने की सटीकता लगभग दोगुनी हो गई। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शुरुआती शोध है और इससे किसी मानव बीमारी के इलाज का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।
जिस RNA को बेहद स्थिर माना जाता था, वहीं मिला अनोखा बदलाव
राइबोसोम को वैज्ञानिक लंबे समय से कोशिका की सबसे भरोसेमंद जैविक मशीनों में गिनते आए हैं। यह RNA में मौजूद आनुवंशिक संदेश को पढ़कर प्रोटीन तैयार करता है। राइबोसोम के कई हिस्से विकास की करोड़ों वर्षों की यात्रा में बेहद कम बदले हैं।
इसी वजह से जब वैज्ञानिकों ने ऑक्टोपस के RNA का अध्ययन किया तो उन्हें एक ऐसा परिणाम मिला, जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी। एक महत्वपूर्ण राइबोसोमल RNA दो अलग-अलग हिस्सों की तरह दिखाई दिया।
शुरुआत में शोधकर्ताओं को लगा कि शायद प्रयोगशाला के नमूने में कोई खराबी है। लेकिन जब दोबारा जांच की गई तो वही परिणाम सामने आया। इसके बाद कई अलग-अलग नमूनों और ऊतकों की जांच की गई। हर बार RNA के उसी स्थान पर टूटने के संकेत मिले।
इससे वैज्ञानिकों को समझ आया कि यह किसी प्रयोगशाला की गलती नहीं, बल्कि ऑक्टोपस की प्राकृतिक जैविक व्यवस्था का हिस्सा है।
DNA नहीं कटता, RNA में होता है बदलाव
इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस जीन से यह RNA तैयार होता है, उसकी DNA श्रृंखला सामान्य रूप से पूरी रहती है।
यानी बदलाव DNA में नहीं होता। पहले पूरा RNA तैयार होता है और उसके बाद कोशिका के भीतर कोई जैविक प्रक्रिया उसे एक निश्चित स्थान पर काट देती है।
कटने के बाद RNA के दोनों हिस्से अलग-अलग रहते हैं, लेकिन फिर भी वे राइबोसोम का हिस्सा बनकर एक साथ काम करते हैं।
वैज्ञानिकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि कोशिका अपने बेहद महत्वपूर्ण molecular machinery को एक अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकती है।
ऑक्टोपस का राइबोसोम प्रोटीन बनाने में ज्यादा सटीक
रिसर्च का सबसे अहम सवाल यह था कि आखिर RNA के इस बदलाव का राइबोसोम के काम पर क्या असर पड़ता है।
प्रोटीन बनाते समय राइबोसोम को लगातार यह पहचानना होता है कि किस संदेश के लिए कौन-सा amino acid सही है। इस प्रक्रिया में tRNA महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अगर राइबोसोम गलत tRNA को स्वीकार कर ले तो प्रोटीन में गलत amino acid जुड़ सकता है। इससे गलत या कमजोर प्रोटीन बनने की संभावना बढ़ जाती है।
वैज्ञानिकों ने अलग-अलग जीवों के राइबोसोम की तुलना की। प्रयोगों में ऑक्टोपस के राइबोसोम ने गलत मेल वाले tRNA को ज्यादा सख्ती से पहचानने की क्षमता दिखाई।
इसका मतलब यह हुआ कि ऑक्टोपस की molecular machinery गलत amino acid को स्वीकार करने से बेहतर तरीके से बच सकती है।
बैक्टीरिया में बदलाव डालते ही मिला चौंकाने वाला परिणाम
शोधकर्ताओं ने इसके बाद एक और महत्वपूर्ण प्रयोग किया। उन्होंने ऑक्टोपस में मिले RNA बदलाव की नकल E. coli बैक्टीरिया के राइबोसोम में करने की कोशिश की।
वैज्ञानिक यह देखना चाहते थे कि क्या केवल इस संरचनात्मक बदलाव से प्रोटीन बनाने की सटीकता बढ़ाई जा सकती है।
परिणाम बेहद दिलचस्प रहा। बदलाव किए गए बैक्टीरिया के राइबोसोम ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में ज्यादा सटीक तरीके से प्रोटीन बनाना शुरू किया।
प्रयोगों में इसकी सटीकता लगभग दोगुनी होने के संकेत मिले। खास बात यह रही कि प्रोटीन बनाने की गति में बड़ी गिरावट दिखाई नहीं दी।
इस परिणाम ने वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि ऑक्टोपस के राइबोसोम में मौजूद यह छोटा-सा बदलाव उसकी जैविक क्षमताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
गलत प्रोटीन बनने से भी हो सकता है बचाव
प्रोटीन निर्माण में गलती होने का प्रभाव केवल एक छोटे molecular बदलाव तक सीमित नहीं रहता। गलत amino acid जुड़ने पर प्रोटीन की संरचना बिगड़ सकती है।
ऐसे गलत तरीके से बने प्रोटीन कभी-कभी एक-दूसरे से चिपककर गुच्छे बना सकते हैं। इन्हें protein aggregates कहा जाता है।
तंत्रिका ऊतकों में ऐसे प्रोटीन गुच्छे विशेष रूप से चिंता का विषय हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने ऑक्टोपस और अन्य समुद्री जीवों के ऊतकों की तुलना करते हुए इस पहलू का भी अध्ययन किया।
प्रयोगों से संकेत मिला कि ज्यादा सटीक protein synthesis का संबंध कम protein aggregation से हो सकता है। हालांकि इस संबंध को पूरी तरह साबित करने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
ऑक्टोपस का जटिल तंत्रिका तंत्र भी हो सकता है वजह
ऑक्टोपस को समुद्री दुनिया के सबसे जटिल और बुद्धिमान जीवों में गिना जाता है। इसके शरीर में बड़ी संख्या में तंत्रिका कोशिकाएं मौजूद हैं और इसकी भुजाओं में भी बेहद जटिल nervous system पाया जाता है।
ऑक्टोपस और स्क्विड जैसे cephalopods RNA editing के लिए भी जाने जाते हैं। इस प्रक्रिया में DNA को बदले बिना RNA के संदेश में छोटे-बड़े बदलाव किए जा सकते हैं।
इसका फायदा यह हो सकता है कि एक ही जीन से अलग-अलग तरह के प्रोटीन बनाए जा सकें।
लेकिन इतनी ज्यादा RNA editing राइबोसोम के सामने एक चुनौती भी पैदा कर सकती है। उसे लगातार बदले हुए RNA संदेशों को पढ़ना पड़ता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऑक्टोपस का ज्यादा सटीक राइबोसोम इस समस्या का समाधान करने में मदद कर सकता है। यानी यह बदले हुए RNA संदेशों को पढ़ने के साथ-साथ गलत प्रोटीन बनने की संभावना को भी नियंत्रित कर सकता है।
हर ऑक्टोपस में नहीं मिला यह खास बदलाव
वैज्ञानिकों ने अलग-अलग ऑक्टोपस प्रजातियों और अन्य समुद्री जीवों की तुलना भी की।
शोध में कई उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस में यह विशेष RNA break पाया गया। लेकिन स्क्विड, कटलफिश और कई अन्य समुद्री जीवों में ऐसा बदलाव नहीं मिला।
एक गहरे समुद्र में रहने वाले ऑक्टोपस के नमूने में भी यह खास बदलाव मौजूद नहीं था।
इससे वैज्ञानिकों को संकेत मिला कि यह विशेष जैविक व्यवस्था ऑक्टोपस की हर प्रजाति में मौजूद नहीं है। संभव है कि यह बदलाव विकास की एक खास शाखा में बाद में विकसित हुआ हो।
आखिर RNA को काटता कौन है?
इस पूरी खोज के बाद भी वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल अभी अनसुलझा है।
आखिर कोशिका इस RNA को ठीक उसी जगह पर कैसे काटती है?
DNA में कोई स्थायी कट नहीं होता। पहले पूरा RNA बनता है और फिर एक निश्चित स्थान पर उसमें टूटन पैदा होती है। इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाली molecular machinery की अभी पूरी जानकारी वैज्ञानिकों के पास नहीं है।
भविष्य में शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि कौन-से enzymes या cellular mechanisms इस RNA को काटते हैं।
अगर इस प्रक्रिया को पूरी तरह समझ लिया गया तो वैज्ञानिक यह भी जान सकते हैं कि यह व्यवस्था ऑक्टोपस के विकास में कब और क्यों सामने आई।
क्या इंसानों के इलाज में काम आ सकती है यह खोज?
यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या ऑक्टोपस की इस अनोखी जैविक तकनीक से इंसानों को भविष्य में कोई फायदा मिल सकता है।
फिलहाल ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी। यह रिसर्च अभी मूलभूत विज्ञान के स्तर पर है। प्रयोगशाला में मिले परिणामों को सीधे मानव शरीर पर लागू नहीं किया जा सकता।
हालांकि, प्रोटीन निर्माण की सटीकता को समझना चिकित्सा विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कई बीमारियों में गलत तरीके से बने या जमा हुए प्रोटीन का अध्ययन किया जाता है।
इसलिए ऑक्टोपस के राइबोसोम की यह अनोखी विशेषता भविष्य के शोध के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है।
प्रकृति की एक और अनोखी चाल सामने आई
इस खोज ने वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि राइबोसोम जैसी बेहद पुरानी और स्थिर जैविक मशीनें वास्तव में कितनी लचीली हैं।
ऑक्टोपस ने उसी molecular machinery में एक असामान्य बदलाव विकसित किया और शुरुआती प्रयोगों में इस बदलाव ने प्रोटीन निर्माण की सटीकता बढ़ाने की क्षमता दिखाई।
यही वजह है कि वैज्ञानिक इस खोज को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
ऑक्टोपस के शरीर में मिला यह ‘टूटा हुआ’ RNA फिलहाल एक वैज्ञानिक रहस्य जरूर है, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि प्रकृति कभी-कभी बेहद जटिल समस्याओं का समाधान molecular स्तर पर ऐसे तरीके से करती है, जिसकी इंसानों ने कल्पना भी नहीं की होती।

कोई टिप्पणी नहीं