संसद के आखिरी 4 दिन में होने वाला है बड़ा खेल? महिला आरक्षण, परिसीमन और FCRA पर सरकार का अगला कदम क्या होगा!
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के अंतिम दौर में पहुंचते ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सत्र खत्म होने में अब महज कुछ कामकाजी दिन बाकी हैं और इसी बीच महिला आरक्षण, परिसीमन और फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट यानी FCRA संशोधन विधेयक जैसे मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। सरकार की ओर से विपक्षी दलों के साथ संवाद की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कांग्रेस और कई विपक्षी दल इन प्रस्तावों पर अपनी आपत्तियों से पीछे हटते नजर नहीं आ रहे हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा गतिरोध के बीच सरकार के सामने सिर्फ विधेयक पारित कराने की चुनौती नहीं है, बल्कि सदन को सुचारू रूप से चलाने और विपक्ष की सहमति हासिल करने की राजनीतिक चुनौती भी है।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से बातचीत की है। सरकार की कोशिश है कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर गतिरोध खत्म हो और सदन की कार्यवाही आगे बढ़े। दूसरी ओर कांग्रेस का जोर सर्वदलीय सहमति पर है।
महिला आरक्षण और परिसीमन फिर बने राजनीतिक मुद्दे
महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रीय राजनीति के सबसे संवेदनशील विषयों में बना हुआ है।
2023 में पारित महिला आरक्षण कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था। हालांकि इसके लागू होने को परिसीमन और जनगणना से जोड़ा गया था।
2026 में सरकार ने इस व्यवस्था को जल्दी लागू करने के उद्देश्य से संविधान संशोधन और परिसीमन से जुड़े विधेयक पेश किए। PRS के अनुसार, 16 अप्रैल 2026 को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किए गए थे। प्रस्तावों में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने और परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़े प्रावधान शामिल थे।
लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को सदन में जरूरी विशेष बहुमत नहीं मिल सका।
अप्रैल में 298-230 से गिरा था संविधान संशोधन विधेयक
अप्रैल में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पर मतदान हुआ था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार विधेयक को 298 वोट मिले, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। संविधान संशोधन विधेयक के लिए अनुच्छेद 368 के तहत विशेष बहुमत की जरूरत होती है। आवश्यक बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पर आगे की कार्रवाई नहीं हो सकी। इसके बाद इससे जुड़े दो अन्य विधेयक भी आगे नहीं बढ़े।
यही वजह है कि अब अगस्त के मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर सरकार की कोशिशों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि इन मुद्दों पर विपक्ष की आपत्तियां सिर्फ महिला आरक्षण को लेकर नहीं हैं। कई दल परिसीमन की प्रक्रिया और उसके संभावित राजनीतिक प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।
दक्षिणी राज्यों की चिंता क्यों बढ़ी?
परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण है। इसका सीधा संबंध जनसंख्या के आंकड़ों से होता है।
PRS के मुताबिक 2026 के प्रस्तावित कानूनों में परिसीमन के लिए नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार के इस्तेमाल की व्यवस्था करने का प्रस्ताव था। प्रस्तावित संविधान संशोधन में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 करने की बात भी थी।
यही विषय दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दलों के लिए संवेदनशील है।
उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने लंबे समय तक जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, परिसीमन के बाद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
DMK समेत कुछ दल परिसीमन के मुद्दे पर लगातार विरोध जता रहे हैं। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में भी DMK की ओर से अपने विरोध को दोहराया गया है।
कांग्रेस ने सरकार से मांगी सर्वदलीय बैठक
कांग्रेस इस पूरे मुद्दे पर सरकार से व्यापक राजनीतिक चर्चा की मांग कर रही है।
राहुल गांधी और किरेन रिजिजू के बीच बातचीत के बावजूद गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार राहुल गांधी ने विधेयकों पर आगे बढ़ने से पहले सर्वदलीय बैठक की जरूरत पर जोर दिया है।
यानी सरकार के सामने अब दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं—या तो विपक्ष के साथ सहमति बनाकर विधेयकों को आगे बढ़ाया जाए या फिर मौजूदा गतिरोध के बीच सत्र को समाप्त होने दिया जाए।
समय कम होने के कारण राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।
FCRA विधेयक पर भी टकराव
महिला आरक्षण और परिसीमन के अलावा Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 भी सरकार और विपक्ष के बीच विवाद का मुद्दा बना हुआ है।
यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और अभी लंबित है। PRS के अनुसार विधेयक का उद्देश्य उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों की निगरानी तथा प्रबंधन से संबंधित व्यवस्था करना है, जिनका FCRA प्रमाणपत्र समाप्त या रद्द हो जाता है। विधेयक में मौजूदा कानून के तहत अधिकतम पांच वर्ष की जेल की सजा को घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी शामिल है।
सरकार की ओर से इसे विदेशी फंडिंग व्यवस्था में निगरानी और जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है।
वहीं विपक्ष और कुछ नागरिक संगठनों को आशंका है कि इससे गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं पर अतिरिक्त नियंत्रण बढ़ सकता है।
कांग्रेस का कड़ा विरोध
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल FCRA से जुड़े बदलावों का लगातार विरोध करते रहे हैं।
इससे पहले उन्होंने FCRA संशोधन नियमों को लेकर भी केंद्र सरकार की आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि नए नियम छोटे NGOs और नागरिक समाज संगठनों पर अत्यधिक बोझ डाल सकते हैं।
अब मानसून सत्र के अंतिम दिनों में FCRA विधेयक को आगे बढ़ाने की किसी भी कोशिश का कांग्रेस विरोध कर सकती है।
इस मुद्दे पर विपक्ष का रुख यह है कि इतने महत्वपूर्ण कानून में बदलाव बिना व्यापक चर्चा और परामर्श के नहीं होना चाहिए।
सरकार के सामने क्यों बढ़ी मुश्किल?
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तीनों मुद्दों की राजनीतिक प्रकृति अलग-अलग है।
महिला आरक्षण एक ऐसा विषय है जिसका सार्वजनिक समर्थन व्यापक है, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ने पर राजनीतिक मतभेद पैदा हो रहे हैं।
परिसीमन सीधे राज्यों के प्रतिनिधित्व और भविष्य की चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
वहीं FCRA का संबंध NGOs, विदेशी फंडिंग और नागरिक समाज से है, इसलिए इस पर विपक्ष और विभिन्न सामाजिक समूहों की नजर बनी हुई है।
ऐसे में सरकार अगर सभी मुद्दों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश करती है तो विपक्षी एकजुटता और मजबूत हो सकती है।
अकाली दल के रुख से बढ़ी चर्चा
इस बीच शिरोमणि अकाली दल की ओर से महिला आरक्षण और परिसीमन के समर्थन की खबरों ने राजनीतिक समीकरणों पर भी चर्चा तेज कर दी है।
यदि छोटे दलों का रुख बदलता है तो सरकार के लिए कुछ विधेयकों पर आगे बढ़ने की संभावना बन सकती है।
हालांकि संविधान संशोधन के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए विशेष बहुमत की संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होती हैं।
इसलिए राजनीतिक समर्थन बढ़ने के बावजूद गणित सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है।
NCP-SP भी FCRA पर असहमत
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने परिसीमन पर जल्दबाजी से बचने की बात कही है, जबकि FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर पार्टी की आपत्ति बताई गई है।
पार्टी की ओर से विधेयक को वापस लेने या संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की गई है।
रिपोर्टों के मुताबिक NCP-SP के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर अपनी चिंताओं को रखने वाले हैं।
इस मुलाकात को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
सदन में हंगामा भी बड़ी चुनौती
मानसून सत्र के दौरान विपक्षी दलों के विरोध के कारण संसद की कार्यवाही कई बार बाधित हुई है।
विपक्ष की ओर से NEET पेपर लीक समेत कई मुद्दों पर सरकार से जवाब की मांग की गई है।
सरकार और विपक्ष के बीच लगातार टकराव के कारण विधायी कामकाज पर भी असर पड़ा है।
अब सत्र के अंतिम दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच कोई समझौता होता है या नहीं।
राहुल गांधी और रिजिजू की बातचीत क्यों बनी चर्चा?
संसदीय गतिरोध समाप्त करने के लिए सरकार की ओर से राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं से संपर्क किया गया है।
रिजिजू और राहुल गांधी के बीच हुई बातचीत को इसी प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन कांग्रेस की मांग है कि महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दों पर केवल द्विपक्षीय बातचीत पर्याप्त नहीं होगी।
विपक्ष चाहता है कि सभी दलों को साथ बैठाकर व्यापक चर्चा की जाए।
यही कारण है कि बातचीत के बावजूद गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
क्या आखिरी चार दिन में आएगा कोई बड़ा फैसला?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है।
क्या सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी?
क्या FCRA विधेयक को सदन में लाया जाएगा?
क्या विपक्ष सर्वदलीय बैठक के बाद अपने रुख में बदलाव करेगा?
या फिर संसद का मानसून सत्र बिना इन बड़े मुद्दों पर सहमति के समाप्त हो जाएगा?
ताजा रिपोर्टों में यह संकेत जरूर है कि सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अभी किसी बड़े समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। FCRA विधेयक का मौजूदा चरण भी बताता है कि वह अभी लोकसभा में लंबित है।
संसद के मानसून सत्र का अंतिम चरण अब बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। महिला आरक्षण, परिसीमन और FCRA जैसे मुद्दे सिर्फ सामान्य विधायी प्रस्ताव नहीं हैं, बल्कि इनके दूरगामी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हो सकते हैं।
अप्रैल में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का 298-230 के अंतर से जरूरी विशेष बहुमत हासिल न कर पाना सरकार के लिए बड़ा झटका था। अब सरकार दोबारा राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।
दूसरी ओर कांग्रेस और कई सहयोगी दल अभी भी परिसीमन और FCRA को लेकर अपनी आपत्तियों पर कायम हैं।
सत्र के अंतिम दिनों में बातचीत, बैठकें और राजनीतिक बयानबाजी तेज होने की संभावना है। लेकिन असली तस्वीर तभी साफ होगी जब इन विधेयकों को औपचारिक रूप से सदन के एजेंडे में लाया जाएगा।
अब नजर इसी पर है कि संसद के बचे हुए दिनों में सरकार कोई ऐसा राजनीतिक रास्ता निकाल पाती है या फिर महिला आरक्षण, परिसीमन और FCRA जैसे बड़े मुद्दे एक बार फिर अगले सत्र के लिए टल जाते हैं।

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