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UNSC में भारत ने खोल दिया बड़ा मोर्चा! 1945 की व्यवस्था पर उठाए सवाल, आतंकियों की लिस्टिंग को लेकर चीन पर भी निशाना?



भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में व्यापक सुधार और विस्तार की मांग एक बार फिर मजबूती से उठाई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत की कार्यवाहक राजदूत और Chargé d’Affaires योजना पटेल ने कहा कि 1945 में बनी सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज की दुनिया की वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती। भारत का तर्क है कि दुनिया में राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का संतुलन काफी बदल चुका है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता और निर्णय लेने की व्यवस्था बड़े पैमाने पर उसी पुराने ढांचे पर आधारित है।

भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल अस्थायी बदलाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। नई दिल्ली लंबे समय से स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि अगर केवल गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई और स्थायी सदस्यता के ढांचे में बदलाव नहीं किया गया, तो इससे सुरक्षा परिषद की वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त परिवर्तन नहीं आएगा। जून 2026 में भी भारत ने इसी रुख को दोहराते हुए कहा था कि सिर्फ गैर-स्थायी श्रेणी का विस्तार परिषद के सुधार के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा।

1945 की दुनिया और आज की दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में अस्तित्व में आई थी। आज परिषद में कुल 15 सदस्य हैं—पांच स्थायी और 10 गैर-स्थायी सदस्य। स्थायी सदस्यों में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं। दस गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए करती है।

भारत का कहना है कि पिछले आठ दशकों में दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर में भारी बदलाव आया है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या बढ़ी है, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की वैश्विक राजनीति में भूमिका बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां पैदा हुई हैं।

इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की मूल सदस्यता संरचना में बड़ा बदलाव नहीं हुआ। भारत इसी असंतुलन को दूर करने की मांग कर रहा है।

नई दिल्ली का मानना है कि सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना चाहिए, ताकि उसके फैसले दुनिया के व्यापक समुदाय की वास्तविक चिंताओं को प्रतिबिंबित कर सकें।

भारत ने स्थायी और गैर-स्थायी दोनों सीटें बढ़ाने पर दिया जोर

भारत की सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि सुरक्षा परिषद में विस्तार दोनों श्रेणियों में होना चाहिए। यानी स्थायी सीटों की संख्या भी बढ़े और गैर-स्थायी सीटों की संख्या में भी वृद्धि हो।

संयुक्त राष्ट्र में फरवरी 2026 में सुरक्षा परिषद सुधार को लेकर हुई चर्चा में योजना पटेल ने भारत का यही रुख रखा था। भारत ने कहा था कि ऐसा सुधार, जिसमें स्थायी श्रेणी का विस्तार शामिल न हो, अधूरा रहेगा। भारत ने यह भी कहा था कि 2015 के एक फ्रेमवर्क दस्तावेज पर प्रतिक्रिया देने वाले 122 देशों में से 113 ने स्थायी श्रेणी के विस्तार का समर्थन किया था।

भारत के अनुसार, सुधार का उद्देश्य केवल परिषद में कुछ नए चेहरे जोड़ना नहीं होना चाहिए। वास्तविक सुधार का मतलब निर्णय लेने की संरचना में अधिक संतुलन और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।

ग्लोबल साउथ को मिले ज्यादा प्रतिनिधित्व

भारत की मांग में Global South यानी विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की संख्या संयुक्त राष्ट्र में बड़ी है, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी निर्णय ढांचे में उनका प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है।

भारत का मानना है कि जिस संस्था पर अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उसमें उन देशों की आवाज भी प्रभावी होनी चाहिए जो दुनिया की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यही वजह है कि भारत सुरक्षा परिषद में सुधार को व्यापक बहुपक्षीय सुधार से जोड़ता रहा है। भारत के अनुसार, परिषद की वैधता तभी मजबूत होगी जब उसका ढांचा आज की वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप होगा।

आतंकवादियों की लिस्टिंग पर भारत ने उठाए गंभीर सवाल

UNSC सुधार की मांग के साथ भारत ने सुरक्षा परिषद की आतंकवादी संगठनों और व्यक्तियों की लिस्टिंग एवं डीलिस्टिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता का मुद्दा भी उठाया।

योजना पटेल ने चेतावनी दी कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिषद का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाकर उन्हें वैधता देने या बिना ठोस आधार और प्रमाण के केवल राजनीतिक कारणों से किसी संस्था को आतंकवादी संगठन घोषित करने के लिए भी नहीं होना चाहिए।

भारत का कहना है कि आतंकवाद से संबंधित फैसले स्पष्ट मानदंडों और ठोस सबूतों के आधार पर होने चाहिए। इसमें किसी देश की राजनीतिक पसंद या रणनीतिक हित को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।

‘टेक्निकल होल्ड’ को लेकर भी भारत की चिंता

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी लिस्टिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का मुद्दा उठाता रहा है। खासतौर पर जब किसी प्रस्ताव को तकनीकी रूप से रोक दिया जाता है, तो उसके पीछे का कारण हमेशा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं होता।

नई दिल्ली ने ऐसी व्यवस्था को कई बार ‘हिडन वीटो’ या छिपे हुए वीटो जैसी स्थिति के रूप में आलोचना की है। भारत का तर्क है कि अगर किसी आतंकवादी व्यक्ति या संगठन को सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव रोका जाता है, तो संबंधित प्रक्रिया और उसके कारणों में अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए।

यह मुद्दा खासतौर पर UNSC की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के संदर्भ में भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है। भारत ने अतीत में पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठनों या व्यक्तियों को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल कराने के प्रयास किए हैं, जिनमें कुछ प्रस्तावों पर चीन की ओर से तकनीकी रोक या अन्य आपत्तियां सामने आई हैं।

भारत का संदेश साफ—आतंकवाद पर दोहरा मापदंड नहीं

भारत ने इस बहस में यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई किसी राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होनी चाहिए।

नई दिल्ली का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है और उसके खिलाफ पर्याप्त प्रमाण हैं, तो उसे राजनीतिक समीकरणों के कारण बचाया नहीं जाना चाहिए। इसी तरह किसी संस्था या व्यक्ति को केवल राजनीतिक मतभेद के आधार पर आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया भी उचित नहीं हो सकती।

भारत का जोर objectivity, transparency और evidence-based decision-making पर है।

यानी भारत चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध प्रणाली स्पष्ट नियमों और प्रमाणों के आधार पर काम करे और सभी देशों के लिए एक समान मानदंड लागू हों।

सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में भी पारदर्शिता की मांग

भारत ने केवल सदस्यता विस्तार की बात नहीं की है। उसने सुरक्षा परिषद की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली में भी अधिक पारदर्शिता की जरूरत बताई है।

भारत के अनुसार गैर-स्थायी सदस्यों को परिषद के कामकाज और संबंधित दस्तावेजों तक बेहतर पहुंच मिलनी चाहिए। अगर किसी देश को दो वर्ष के लिए सुरक्षा परिषद में चुना जाता है तो उसे परिषद की कार्यवाही और निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी के लिए पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध होने चाहिए।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गैर-स्थायी सदस्य केवल बैठक में मौजूद रहने तक सीमित न रहें, बल्कि निर्णय प्रक्रिया को समझ सकें और उसमें सार्थक योगदान दे सकें।

भारत पहले भी उठा चुका है यह मुद्दा

UNSC सुधार भारत की विदेश नीति का नया मुद्दा नहीं है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार और अपनी स्थायी सीट की मांग करता रहा है।

भारत का दावा है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल होने, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे योगदान और वैश्विक कूटनीति में सक्रिय भूमिका के कारण उसे सुरक्षा परिषद के स्थायी ढांचे में जगह मिलनी चाहिए।

इसके अलावा भारत G4 समूह का हिस्सा है। G4 में भारत के साथ जापान, जर्मनी और ब्राजील शामिल हैं और ये देश सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार का समर्थन करते हैं।

UNSC सुधार पर बातचीत अभी भी जारी

संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद सुधार को लेकर अंतर-सरकारी वार्ता यानी Intergovernmental Negotiations (IGN) लंबे समय से चल रही है। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार महासभा ने 80वें सत्र में भी सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व और सदस्यता बढ़ाने के सवाल पर वार्ता जारी रखने का फैसला किया है।

जून 2026 में भी इस विषय पर महासभा की अनौपचारिक बैठकें हुई थीं। इनमें सुरक्षा परिषद की सदस्यता बढ़ाने और समान प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

हालांकि सुधार की दिशा में वर्षों से बातचीत चल रही है, लेकिन स्थायी सदस्यता, वीटो अधिकार और नई सीटों की संख्या जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति बनाना अभी भी चुनौती बना हुआ है।

क्यों महत्वपूर्ण है भारत की यह मांग?

भारत की मांग का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मौजूदा सुरक्षा परिषद को लेकर प्रतिनिधित्व और प्रभावशीलता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से कई देश अभी तक सुरक्षा परिषद के सदस्य ही नहीं बन पाए हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 50 से अधिक सदस्य देश ऐसे हैं जो कभी सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं रहे।

ऐसे में भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलना जरूरी है।

दुनिया में युद्ध, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और नई तकनीकों से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में अगर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्था की संरचना पुरानी बनी रहती है, तो उसकी निर्णय क्षमता और प्रतिनिधित्व पर सवाल उठते रहेंगे।

भारत का रुख अब और स्पष्ट

भारत ने एक बार फिर दो मुद्दों को एक साथ सामने रखा है—UNSC में व्यापक सुधार और आतंकवाद से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता।

नई दिल्ली की मांग है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में किया जाए। ग्लोबल साउथ को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। गैर-स्थायी सदस्यों को परिषद के दस्तावेजों और कार्यप्रणाली तक बेहतर पहुंच मिले और आतंकवादियों की लिस्टिंग या डीलिस्टिंग की प्रक्रिया राजनीतिक हितों से प्रभावित न हो।

भारत का संदेश साफ है कि 1945 की परिस्थितियों में बनाई गई व्यवस्था को 2026 की दुनिया की जरूरतों के हिसाब से बदलना होगा।

हालांकि, UNSC में सुधार का रास्ता आसान नहीं है। स्थायी सदस्यों के हित, वीटो का सवाल और सदस्य देशों के बीच अलग-अलग प्रस्तावों पर मतभेद इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। फिर भी भारत लगातार यह तर्क दे रहा है कि सुधार को अनिश्चित समय तक टाला नहीं जा सकता।

अब असली सवाल यही है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1945 के ढांचे से बाहर निकलकर आज की दुनिया को सही प्रतिनिधित्व दे पाएगी? भारत की लगातार आवाज इस बहस को और तेज कर रही है।

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