सात महीने से खामोश था ISRO… अब सितंबर में होने वाला है ऐसा लॉन्च, जिस पर पूरी दुनिया की नजर!
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) एक बड़े अंतराल के बाद फिर से अपने अंतरिक्ष अभियान को रफ्तार देने की तैयारी में है। लगातार तकनीकी चुनौतियों और कुछ महत्वपूर्ण मिशनों में आई अड़चनों के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए आने वाले महीने बेहद अहम माने जा रहे हैं। अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ी तैयारियों के बीच अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट GISAT-1A को सितंबर के पहले सप्ताह में लॉन्च करने की तैयारी की जा रही है। इसके बाद नवंबर के आसपास NVS-03 को अंतरिक्ष में भेजे जाने की संभावना है।
श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में इन मिशनों को लेकर तैयारियां आगे बढ़ रही हैं। GISAT-1A और NVS-03 दोनों ही ऐसे मिशन हैं जिन पर ISRO की नजर काफी समय से बनी हुई है। एक तरफ GISAT-1A भारत की पृथ्वी अवलोकन क्षमता को मजबूत करने वाला सैटेलाइट है, वहीं NVS-03 भारत के स्वदेशी NavIC नेविगेशन सिस्टम के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ऐसे समय में जब ISRO अपने लॉन्च कार्यक्रम को फिर से गति देने की कोशिश कर रहा है, जनवरी 2026 में PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के दौरान सामने आई तकनीकी समस्या भी चर्चा में है। ISRO के मुताबिक उस मिशन में रॉकेट के तीसरे चरण के अंत में एक एनोमली सामने आई थी और विस्तृत विश्लेषण शुरू किया गया था।
सितंबर में GISAT-1A की बारी
GISAT-1A को लेकर सबसे ज्यादा उम्मीद इसलिए है क्योंकि यह पृथ्वी की निगरानी से जुड़े भारत के महत्वपूर्ण सैटेलाइट कार्यक्रम का हिस्सा है। इसे जियो इमेजिंग सैटेलाइट के तौर पर देखा जा रहा है और नई नामकरण व्यवस्था के तहत इसे EOS-05 के नाम से भी जाना जाता है।
यह सैटेलाइट वर्ष 2021 में लॉन्च किए गए GISAT-1 यानी EOS-03 का रिप्लेसमेंट माना जा रहा है। EOS-03 मिशन अपने निर्धारित ऑर्बिट तक नहीं पहुंच सका था। उस समय रॉकेट के अंतिम प्रोपल्सिव चरण के इग्निशन से जुड़ी समस्या के कारण मिशन को झटका लगा था।
अब GISAT-1A को ज्यादा भरोसेमंद तरीके से मिशन पूरा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसकी प्रस्तावित मिशन लाइफ करीब 10 वर्ष बताई जा रही है। इतने लंबे समय तक काम करने वाला यह सैटेलाइट भारत के लिए पृथ्वी की लगातार निगरानी में उपयोगी साबित हो सकता है।
आपदाओं की निगरानी में मिलेगी बड़ी मदद
GISAT-1A की सबसे बड़ी खासियत इसका पृथ्वी की तस्वीरें उपलब्ध कराने की क्षमता होगी। बड़े क्षेत्रों की बार-बार इमेजिंग के जरिए यह सैटेलाइट जमीन पर होने वाले बदलावों की निगरानी में मदद कर सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इसका महत्व और बढ़ जाता है। बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, जंगलों में आग और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति को समझने में सैटेलाइट इमेजरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आपदा से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करके नुकसान का अनुमान लगाने में भी मदद मिल सकती है। इससे राहत और बचाव एजेंसियों को प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
इसके अलावा कृषि और वानिकी के क्षेत्र में भी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट उपयोगी होते हैं। फसलों की स्थिति, भूमि उपयोग में बदलाव, वन क्षेत्रों की निगरानी और पर्यावरणीय बदलावों को समझने में इनके डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यानी GISAT-1A केवल अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला एक और सैटेलाइट नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जमीन पर होने वाली गतिविधियों की निगरानी और निर्णय लेने की क्षमता से जुड़ा है।
नवंबर में NVS-03 पर निगाह
GISAT-1A के बाद NVS-03 को लॉन्च किए जाने की संभावना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह सैटेलाइट श्रीहरिकोटा में लॉन्च की तैयारियों के चरण में है और नवंबर में इसके प्रक्षेपण की उम्मीद की जा रही है।
NVS-03 मिशन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह भारत के NavIC नेविगेशन सिस्टम से जुड़ा है। भारत लंबे समय से अपने स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रहा है।
NavIC का उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्र में सटीक पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं उपलब्ध कराना है। इसका इस्तेमाल विभिन्न नागरिक और रणनीतिक जरूरतों के लिए किया जा सकता है।
NVS-03 की लॉन्चिंग इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इससे NavIC से जुड़े सैटेलाइट नेटवर्क को मजबूती मिलने की उम्मीद है। पिछले NVS-02 मिशन में सैटेलाइट को निर्धारित ऑर्बिट तक पहुंचाने की प्रक्रिया में समस्या आई थी। ऐसे में NVS-03 मिशन को ISRO के लिए एक महत्वपूर्ण अगली परीक्षा के तौर पर देखा जा सकता है।
जनवरी में PSLV-C62 मिशन को लगा था झटका
साल 2026 की शुरुआत ISRO के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। 12 जनवरी को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन लॉन्च किया गया था। यह 2026 का पहला अंतरिक्ष मिशन था। रॉकेट ने श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक उड़ान भरी, लेकिन मिशन के तीसरे चरण के अंत में एनोमली सामने आई।
ISRO ने आधिकारिक रूप से बताया था कि PS3 चरण के अंत में मिशन में एनोमली सामने आई और विस्तृत विश्लेषण शुरू किया गया। इसके बाद रॉकेट अपने निर्धारित मार्ग से विचलित हुआ और सैटेलाइट्स को तय कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे पहले मई 2025 में PSLV-C61 मिशन को भी तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ा था। लगातार दो PSLV मिशनों में तीसरे चरण से जुड़ी समस्याओं ने ISRO के विश्वसनीय माने जाने वाले लॉन्च व्हीकल की समीक्षा को महत्वपूर्ण बना दिया।
PSLV की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
PSLV को ISRO का वर्कहॉर्स लॉन्च व्हीकल कहा जाता है। इस रॉकेट के जरिए भारत ने कई महत्वपूर्ण पृथ्वी अवलोकन, वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय मिशनों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाया है।
इसी वजह से लगातार दो मिशनों में आई समस्या ने अंतरिक्ष विशेषज्ञों और वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान खींचा। जनवरी 2026 की घटना में ISRO ने तीसरे चरण के अंत में एनोमली की पुष्टि की थी।
हालांकि किसी लॉन्च व्हीकल के लंबे समय तक सफल रहने के बावजूद कभी-कभी तकनीकी समस्या सामने आ सकती है, लेकिन लगातार घटनाओं के बाद फेलियर एनालिसिस और सुधारात्मक उपायों का महत्व काफी बढ़ जाता है।
यही वजह है कि आगे होने वाले लॉन्च केवल नए सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में पहुंचाने वाले मिशन नहीं होंगे, बल्कि इनसे ISRO की तकनीकी तैयारियों और लॉन्च सिस्टम पर भरोसे की भी परीक्षा होगी।
2025 में भी मिले थे मिले-जुले नतीजे
वर्ष 2025 में ISRO ने कई महत्वपूर्ण मिशन किए थे। इनमें अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन और नेविगेशन से जुड़े सैटेलाइट शामिल थे। PSLV-C61/EOS-09 मिशन को तकनीकी समस्या के कारण झटका लगा था।
इसके बाद GSLV से जुड़े मिशनों में भी अलग-अलग परिणाम सामने आए। NASA और ISRO के संयुक्त NISAR मिशन का लॉन्च सफल रहा, जबकि NVS-02 मिशन में सैटेलाइट को निर्धारित ऑर्बिट तक पहुंचाने की प्रक्रिया में समस्या आई।
दूसरी तरफ LVM3 के जरिए किए गए मिशनों ने भारत की भारी-भरकम लॉन्च क्षमता को भी प्रदर्शित किया। इस तरह 2025 का साल ISRO के लिए उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों से भरा रहा।
लॉन्च लक्ष्य भी बना चुनौती
ISRO ने अपने वार्षिक कार्यक्रमों में कई महत्वाकांक्षी मिशनों का लक्ष्य रखा है। इनमें अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट, कम्युनिकेशन सैटेलाइट, टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर और गगनयान से जुड़े मिशन शामिल हैं।
2025-26 और 2026-27 के लिए तय किए गए लक्ष्यों को देखते हुए लॉन्च की गति बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसके अलावा PSLV, GSLV और LVM3 के कई मिशनों के साथ नए SSLV के लॉन्च भी कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
गगनयान कार्यक्रम के लिए भी आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण मिशन प्रस्तावित हैं। इसलिए ISRO के लिए प्रत्येक लॉन्च का सफल होना सिर्फ एक सैटेलाइट को कक्षा में पहुंचाने तक सीमित नहीं है। ये मिशन भारत के बड़े अंतरिक्ष लक्ष्यों की पूरी श्रृंखला से जुड़े हैं।
अब सितंबर से बदल सकता है माहौल
ऐसे में सितंबर में प्रस्तावित GISAT-1A लॉन्च पर सबकी नजर रहेगी। अगर यह मिशन सफल रहता है तो इससे ISRO के लॉन्च कार्यक्रम को दोबारा गति मिलने के साथ-साथ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का आत्मविश्वास भी बढ़ सकता है।
इसके बाद NVS-03 मिशन भी महत्वपूर्ण परीक्षा होगा। दोनों मिशनों की सफलता पृथ्वी अवलोकन और नेविगेशन जैसे दो अलग-अलग क्षेत्रों में भारत की क्षमताओं को मजबूत कर सकती है।
ISRO के सामने आने वाले महीनों में एक साथ कई चुनौतियां हैं। उसे लंबित मिशनों को पूरा करना है, लॉन्च की गति बढ़ानी है, तकनीकी समस्याओं से मिले सबक को लागू करना है और गगनयान जैसे बड़े कार्यक्रमों की तैयारियों को भी आगे बढ़ाना है।
इसलिए सितंबर से शुरू होने वाला अगला लॉन्च चरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए सामान्य लॉन्च कैलेंडर से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। GISAT-1A की उलटी गिनती शुरू होने के साथ अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगला सैटेलाइट कब अंतरिक्ष में जाएगा, बल्कि यह भी है कि हाल के तकनीकी झटकों के बाद ISRO अपने लॉन्च अभियान को कितनी मजबूती के साथ वापस पटरी पर ला पाता है।

कोई टिप्पणी नहीं