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विदेश गया था घर की किस्मत बदलने… 19 जुलाई को आई मौत की खबर, लेकिन एक महीने बाद भी नहीं लौटा गुरप्रीत! पिता की आखिरी इच्छा सुनकर आंखें नम हो जाएंगी



यमुनानगर: एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख शायद ही कोई हो सकता है कि उसका जवान बेटा दुनिया से चला जाए और वह उसे आखिरी बार देख भी न सके। हरियाणा के यमुनानगर जिले के पंजेटो गांव में रहने वाले गुरप्रीत सिंह के परिवार के सामने इन दिनों ऐसी ही दर्दनाक स्थिति है। 19 जुलाई को यूक्रेन में हुए रूसी मिसाइल हमले में गुरप्रीत की मौत हो गई थी, लेकिन घटना के कई सप्ताह बाद भी उसका पार्थिव शरीर घर नहीं पहुंच पाया है।

एक तरफ गुरप्रीत की पत्नी अपनी छह महीने की मासूम बेटी के साथ पति के लौटने का इंतजार कर रही है, तो दूसरी तरफ उसके पिता अपने बेटे के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार के लिए शव आने की राह देख रहे हैं। परिवार के लिए यह इंतजार बेहद पीड़ादायक होता जा रहा है।

गुरप्रीत के पिता कीर्तन सिंह पहले ही एक सड़क हादसे में दिव्यांग हो चुके हैं। बेटे की मौत ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया है। अब उनकी सबसे बड़ी इच्छा किसी आर्थिक मदद की नहीं, बल्कि सिर्फ इतनी है कि वह अपने बेटे को आखिरी बार देख सकें और अपने हाथों से उसका अंतिम संस्कार कर सकें।

बेहतर भविष्य का सपना लेकर विदेश गया था गुरप्रीत

परिजनों के अनुसार गुरप्रीत करीब डेढ़ महीने पहले ही मर्चेंट नेवी में नाविक के पद पर नौकरी करने के लिए यूक्रेन गया था। परिवार को उम्मीद थी कि विदेश में नौकरी मिलने के बाद घर की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।

गुरप्रीत के लिए भी यह नौकरी अपने परिवार के भविष्य को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर थी। घरवालों को उम्मीद थी कि वह मेहनत करके परिवार की जिम्मेदारियां संभालेगा और अपनी पत्नी तथा छोटी बेटी के लिए बेहतर जीवन तैयार करेगा।

लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि विदेश जाने के कुछ ही समय बाद परिवार को उसकी मौत की खबर सुननी पड़ेगी।

जिस घर में उसके लौटने की उम्मीद थी, वहां अब उसके पार्थिव शरीर का इंतजार हो रहा है।

करीब डेढ़ साल पहले हुई थी शादी

गुरप्रीत की शादी करीब डेढ़ साल पहले ही हुई थी। शादी के बाद परिवार में खुशियां आई थीं। कुछ समय पहले ही उसके घर में बेटी ने जन्म लिया था।

छह महीने की बच्ची अभी इतनी छोटी है कि उसे यह समझ भी नहीं है कि उसके पिता कहां हैं और क्यों नहीं लौट रहे।

गुरप्रीत की पत्नी के लिए यह स्थिति बेहद मुश्किल है। पति के साथ भविष्य के सपने देखने के बाद अब उन्हें उसके अंतिम दर्शन का इंतजार करना पड़ रहा है।

परिवार को सबसे ज्यादा पीड़ा इस बात की है कि गुरप्रीत की मौत को कई सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक उसका शव घर नहीं पहुंच सका है।

19 जुलाई की खबर ने परिवार को तोड़ दिया

19 जुलाई को यूक्रेन में रूसी मिसाइल हमले की खबर सामने आई। इसी हमले में गुरप्रीत की जान चली गई।

मिसाइल हमले की खबर परिवार के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। जिस बेटे को कुछ समय पहले ही नौकरी के लिए विदेश भेजा था, उसके मारे जाने की सूचना मिलते ही परिवार में मातम छा गया।

गुरप्रीत की मौत की जानकारी मिलने के बाद से परिवार की सारी उम्मीदें अब उसके पार्थिव शरीर की स्वदेश वापसी पर टिकी हुई हैं।

परिजन चाहते हैं कि उनका बेटा आखिरी बार घर आए, ताकि उसे गांव की मिट्टी में पूरे सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाज के साथ अंतिम विदाई दी जा सके।

पिता की हालत पहले से थी खराब

गुरप्रीत के पिता कीर्तन सिंह पहले ही एक सड़क दुर्घटना में दिव्यांग हो चुके हैं। ऐसे में बेटे की मौत का सदमा उनके लिए और भी ज्यादा दर्दनाक है।

एक पिता जिसने अपने बेटे को बचपन से बड़ा होते देखा, उसकी शादी की और फिर बेहतर भविष्य के लिए उसे नौकरी करने विदेश भेजा, आज उसी बेटे के अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहा है।

कीर्तन सिंह की सबसे बड़ी इच्छा अब यही है कि उनका बेटा किसी तरह घर लौटे और वह उसे आखिरी बार देख सकें।

वह अपने हाथों से बेटे का अंतिम संस्कार करना चाहते हैं।

परिवार ने कहा- पहले शव चाहिए, मुआवजा बाद में

गुरप्रीत के परिवार की स्थिति का सबसे भावुक पहलू यह है कि वे इस समय आर्थिक मुआवजे को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं।

परिवार का कहना है कि सरकार या संबंधित संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक मदद बाद की बात है। फिलहाल उन्हें सिर्फ अपने बेटे का पार्थिव शरीर चाहिए।

परिवार चाहता है कि गुरप्रीत को पूरे सम्मान के साथ घर लाया जाए, ताकि उसके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा सके।

उनके लिए यह सिर्फ एक शव घर आने की बात नहीं है। यह बेटे को अंतिम विदाई देने और एक अधूरी पारिवारिक जिम्मेदारी को पूरा करने का सवाल है।

छह महीने की बेटी पिता का इंतजार कर रही है

गुरप्रीत की छह महीने की बेटी इस पूरी घटना का सबसे मासूम चेहरा है।

जिस उम्र में बच्चा अपने माता-पिता की गोद में सुरक्षित महसूस करता है, उसी उम्र में इस बच्ची के पिता उससे हमेशा के लिए दूर हो गए हैं।

परिवार के लोग शायद आने वाले वर्षों में उसे उसके पिता की तस्वीरें दिखाकर उनकी कहानी बताएंगे। लेकिन फिलहाल घर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गुरप्रीत का अंतिम संस्कार कब होगा।

उसकी पत्नी और परिवार के दूसरे सदस्य उसके पार्थिव शरीर के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मर्चेंट नेवी की नौकरी बनी आखिरी सफर

गुरप्रीत के विदेश जाने का उद्देश्य परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना था। मर्चेंट नेवी में नौकरी उसके लिए एक बेहतर करियर विकल्प माना जा रहा था।

लेकिन यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच वह ऐसी घटना का शिकार हो गया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।

युद्ध का असर अक्सर युद्ध क्षेत्र में रहने वाले लोगों तक सीमित माना जाता है, लेकिन गुरप्रीत की घटना बताती है कि इसका खतरा उन लोगों तक भी पहुंच सकता है जो सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं।

एक सामान्य नौकरी करने वाला भारतीय युवक भी युद्ध की चपेट में आ सकता है और उसका परिवार हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सिर्फ उसके शव का इंतजार करता रह सकता है।

शव की स्वदेश वापसी में देरी बनी चिंता

गुरप्रीत की मौत के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके पार्थिव शरीर को भारत लाने की है।

युद्धग्रस्त इलाके में हुई घटना के कारण शव की पहचान, दस्तावेजी प्रक्रिया और उसे भारत लाने की व्यवस्थाओं में समय लग सकता है।

परिवार के लिए हालांकि हर दिन भारी है। उनके लिए यह इंतजार भावनात्मक रूप से बेहद कठिन होता जा रहा है।

पिता अपने बेटे का अंतिम संस्कार करना चाहते हैं और पत्नी अपने पति को आखिरी विदाई देना चाहती है।

पूरे गांव में पसरा है मातम

गुरप्रीत की मौत की खबर के बाद पंजेटो गांव में भी शोक का माहौल है। ग्रामीण और रिश्तेदार परिवार को सांत्वना देने के लिए उनके घर पहुंच रहे हैं।

गांव के लोगों के लिए यह घटना इसलिए भी बेहद दुखद है क्योंकि गुरप्रीत जवान था और परिवार के लिए बेहतर भविष्य बनाने की कोशिश कर रहा था।

किसी ने नहीं सोचा था कि नौकरी के लिए विदेश गया यह युवक कुछ ही समय बाद वापस नहीं, बल्कि उसकी मौत की खबर घर पहुंचेगी।

अब गांव के लोग भी उसके पार्थिव शरीर के आने का इंतजार कर रहे हैं।

युद्ध की आग से हजारों किलोमीटर दूर परिवार तक पहुंचा दर्द

यूक्रेन और रूस के बीच लंबे समय से जारी युद्ध का असर सिर्फ वहां रहने वाले लोगों पर नहीं पड़ा है। व्यापार, परिवहन और समुद्री गतिविधियां भी इससे प्रभावित हुई हैं।

गुरप्रीत जैसे मर्चेंट नेवी के कर्मचारी अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर काम करते हैं। कई बार उन्हें ऐसे इलाकों के आसपास से गुजरना पड़ता है जहां सुरक्षा जोखिम बने रहते हैं।

गुरप्रीत की मौत ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले आम नागरिकों और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

परिवार की मांग- जल्द मिले अंतिम विदाई का मौका

गुरप्रीत के परिजनों की मांग बेहद स्पष्ट है। वे चाहते हैं कि उसके पार्थिव शरीर को जल्द से जल्द भारत लाया जाए।

परिवार का कहना है कि आर्थिक सहायता बाद में भी मिल सकती है, लेकिन अंतिम विदाई का समय वापस नहीं आता।

पिता अपने बेटे को आखिरी बार देखना चाहते हैं। पत्नी अपने पति को अंतिम विदाई देना चाहती है और परिवार पूरे रीति-रिवाज के साथ गुरप्रीत का अंतिम संस्कार करना चाहता है।

यमुनानगर के पंजेटो गांव के गुरप्रीत सिंह की कहानी बेहद दर्दनाक है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में मर्चेंट नेवी की नौकरी करने विदेश गया एक जवान युवक 19 जुलाई को यूक्रेन में हुए मिसाइल हमले में अपनी जान गंवा बैठा।

पीछे रह गई उसकी पत्नी, छह महीने की मासूम बेटी और एक ऐसा पिता जो पहले ही दिव्यांगता का दर्द झेल रहा है।

आज गुरप्रीत के परिवार की सबसे बड़ी जरूरत पैसा या मुआवजा नहीं है। उन्हें सिर्फ अपने बेटे का पार्थिव शरीर चाहिए, ताकि पिता अपने बेटे का अंतिम दर्शन कर सके और अपने हाथों से उसका अंतिम संस्कार कर सके।

एक पिता की यह इच्छा जितनी साधारण सुनाई देती है, उसके पीछे उतना ही गहरा दर्द छिपा है। परिवार के लिए हर गुजरता दिन इस इंतजार को और कठिन बना रहा है।

अब पूरे परिवार की निगाहें सिर्फ उस दिन पर टिकी हैं, जब गुरप्रीत अपने घर लौटेगा—लेकिन इस बार एक बेटे के रूप में नहीं, बल्कि अंतिम विदाई के लिए।

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