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अफ्रीका की सोने की खदान में धरती धंसी, 100 से ज्यादा लोगों की मौत की खबर; मलबे में फंसे कई खनिकों की तलाश जारी

 


बांगुई। अफ्रीका के सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक से एक बेहद दर्दनाक खदान हादसे की खबर सामने आई है। कैमरून सीमा के पास स्थित जाम्बोये गांव में एक सोने की खदान में अचानक जमीन धंसने से बड़ी संख्या में खनिक मलबे के नीचे दब गए। शुरुआती जानकारी में दर्जनों लोगों की मौत की बात सामने आई थी, लेकिन बाद में मृतकों का आंकड़ा 100 से अधिक बताए जाने लगा। हादसे के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और स्थानीय लोग तथा बचाव दल मलबे में फंसे लोगों की तलाश में जुट गए।

घटना ने एक बार फिर अफ्रीका के कई हिस्सों में चल रहे असुरक्षित और छोटे पैमाने के खनन कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन खदानों में बड़ी संख्या में मजदूर सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं। कई जगहों पर आधुनिक सुरक्षा उपकरण, मजबूत सुरंग संरचना और आपातकालीन बचाव व्यवस्था की कमी होती है। ऐसे में जमीन धंसने जैसी घटना कुछ ही मिनटों में बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती है।

हालांकि, हादसे में मृतकों और लापता लोगों की अंतिम संख्या अभी स्पष्ट नहीं है। बचाव अभियान जारी रहने के कारण आंकड़े बदल सकते हैं।

अचानक धंस गई सोने की खदान

बताया जा रहा है कि यह हादसा सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के नाना-मांबेरे क्षेत्र में हुआ। जाम्बोये गांव कैमरून की सीमा के करीब स्थित है और आसपास के इलाकों में लंबे समय से सोने की तलाश में छोटे स्तर पर खनन गतिविधियां होती रही हैं।

मंगलवार को खदान में बड़ी संख्या में लोग सोना निकालने के काम में लगे हुए थे। इसी दौरान अचानक जमीन का एक बड़ा हिस्सा धंस गया। खदान के अंदर मौजूद कई मजदूरों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला और वे मिट्टी, पत्थरों तथा मलबे के नीचे दब गए।

घटना के बाद आसपास मौजूद लोगों ने तत्काल बचाव का काम शुरू किया। लेकिन खदान की संरचना अस्थिर होने के कारण मलबा हटाना आसान नहीं था।

पहले सामने आया कम मौतों का आंकड़ा

हादसे के तुरंत बाद स्थानीय स्तर पर करीब 30 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई थी। उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि खदान के अंदर कुल कितने लोग मौजूद थे।

जैसे-जैसे बचाव दल और स्थानीय लोगों ने मलबे की तलाशी शुरू की, मृतकों की संख्या बढ़ने लगी। बाद की रिपोर्टों में यह संख्या 100 से अधिक बताई गई।

ऐसे हादसों में शुरुआती आंकड़े अक्सर अधूरे होते हैं, क्योंकि दूरदराज के खनन क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं होता। कई बार परिवारों को भी यह पता नहीं होता कि हादसे के समय उनका सदस्य खदान के किस हिस्से में काम कर रहा था।

यही वजह है कि राहत एवं बचाव अभियान पूरा होने के बाद ही मृतकों और लापता लोगों की वास्तविक संख्या स्पष्ट हो सकेगी।

मलबे में अब भी लोगों के दबे होने की आशंका

हादसे के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों को खोजने की है जो अभी भी खदान के अंदर फंसे हो सकते हैं।

बचावकर्मी और स्थानीय लोग मलबे को हटाकर सुरंगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जमीन के अंदर की स्थिति बेहद खतरनाक बताई जा रही है। किसी भी समय दोबारा मिट्टी या चट्टान खिसकने का खतरा बना हुआ है।

ऐसी स्थिति में बचाव दल को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना पड़ता है। यदि जल्दबाजी की जाए तो पहले से कमजोर खदान का दूसरा हिस्सा भी धंस सकता है और बचावकर्मी खुद खतरे में पड़ सकते हैं।

इसी वजह से अभियान धीमी गति से चलाना पड़ रहा है।

परिवारों में मचा कोहराम

हादसे की खबर सामने आने के बाद खदान में काम करने वाले मजदूरों के परिवारों में चिंता और डर का माहौल है। कई परिवार अपने परिजनों की जानकारी के लिए घटनास्थल के आसपास जमा हैं।

जिन लोगों के नाम सामने नहीं आए हैं, उनके परिवारों को अब भी उम्मीद है कि उनके रिश्तेदार सुरक्षित बाहर निकल सकते हैं।

दूसरी तरफ जिन परिवारों को अपने प्रियजनों की मौत की जानकारी मिल चुकी है, उनके सामने अंतिम संस्कार और आर्थिक संकट जैसी बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं।

सोने की खदानों में काम करने वाले मजदूरों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जिनकी आमदनी इसी काम पर निर्भर रहती है। ऐसे में एक मजदूर की मौत का असर पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।

कारीगर खनन में सबसे बड़ा खतरा

जाम्बोये की घटना ने कारीगर या छोटे पैमाने पर होने वाले खनन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कारीगर खनन में मजदूर कई बार जमीन के अंदर संकरी सुरंगों के जरिए खनिज निकालते हैं। अगर सुरंग को पर्याप्त सहारा नहीं दिया गया हो तो आसपास की मिट्टी और चट्टानों पर दबाव बढ़ता रहता है।

बारिश का पानी जमीन के अंदर जाने, लगातार खुदाई होने, मिट्टी की संरचना कमजोर होने या सुरंग में तकनीकी खामी होने से अचानक जमीन धंस सकती है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऐसे स्थानों पर आधुनिक भूगर्भीय सर्वे और सुरक्षा निगरानी हमेशा उपलब्ध नहीं होती।

सोने की चमक के पीछे छिपा खतरनाक सच

सोना दुनिया की सबसे मूल्यवान धातुओं में शामिल है। इसकी कीमत और मांग के कारण गरीब इलाकों में रहने वाले लोग भी इसे निकालने के लिए बेहद जोखिम भरे काम में उतर जाते हैं।

सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक जैसे देशों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण छोटे पैमाने पर खनन कई परिवारों की आय का जरिया बन चुका है।

मजदूर जानते हैं कि खदान के अंदर जाना खतरनाक है, लेकिन परिवार चलाने के लिए उनके पास कई बार दूसरा विकल्प नहीं होता।

यही मजबूरी उन्हें असुरक्षित परिस्थितियों में भी काम करने के लिए मजबूर करती है।

इस इलाके में पहले भी सामने आते रहे हैं हादसे

जाम्बोये और इसके आसपास का क्षेत्र लंबे समय से सोने की खनन गतिविधियों के कारण जाना जाता है। यहां अनौपचारिक और छोटे स्तर के खनन के कारण सुरक्षा को लेकर पहले भी चिंता जताई जाती रही है।

क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां और सीमा के नजदीक होने के कारण प्रशासन के लिए खनन गतिविधियों की लगातार निगरानी करना भी चुनौतीपूर्ण रहता है।

पिछले वर्षों में भी सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के अलग-अलग हिस्सों में खदान धंसने और भूस्खलन की घटनाओं में मजदूरों की जान जाने की खबरें सामने आती रही हैं।

हर हादसे के बाद कुछ समय के लिए सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा होती है, लेकिन गरीबी और रोजगार की समस्या के कारण लोग फिर से उन्हीं जोखिम भरी खदानों में लौट जाते हैं।

हादसे की वजह क्या थी?

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि जाम्बोये की खदान में जमीन धंसने की मुख्य वजह क्या थी।

संभावित कारणों में लगातार खुदाई, जमीन की कमजोर संरचना, सुरंगों में पर्याप्त सहारा न होना या बारिश के कारण मिट्टी का कमजोर होना शामिल हो सकता है। लेकिन वास्तविक कारण जांच के बाद ही सामने आएगा।

प्रशासन को यह भी पता लगाना होगा कि खदान किस तरह संचालित की जा रही थी और वहां सुरक्षा के क्या इंतजाम थे।

यदि खदान में नियमों का पालन नहीं किया गया था तो हादसे की जिम्मेदारी तय करने का सवाल भी उठ सकता है।

बचाव दल के सामने दोहरी चुनौती

बचाव अभियान में सबसे बड़ी चुनौती समय की है। यदि कोई व्यक्ति मलबे के अंदर किसी खाली जगह में फंसा है तो उसके लिए हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन दूसरी तरफ बचावकर्मियों को खदान की अस्थिर संरचना का भी ध्यान रखना पड़ रहा है। मलबा हटाने के दौरान अगर जमीन फिर धंस गई तो बचाव अभियान में शामिल लोगों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।

इसलिए राहत दल को सुरक्षित तरीके से रास्ता बनाने और अंदर तक पहुंचने की कोशिश करनी पड़ रही है।

क्या इस हादसे के बाद बदलेगी खनन व्यवस्था?

इतनी बड़ी संख्या में मौतों की खबर ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि छोटे पैमाने की खनन गतिविधियों को लेकर सुरक्षा नियम कितने प्रभावी हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक खदानों में काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा प्रशिक्षण, हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपकरणों के साथ-साथ सुरंगों की तकनीकी जांच की जरूरत होती है।

जमीन के अंदर खुदाई शुरू करने से पहले भूगर्भीय स्थिति का आकलन भी बेहद जरूरी है। यदि किसी इलाके में सुरंग अस्थिर होने की आशंका हो तो वहां मजदूरों को भेजना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।

अभी भी जारी है तलाश

फिलहाल जाम्बोये में राहत और बचाव अभियान जारी है। स्थानीय लोग भी बचाव दल के साथ मिलकर मलबा हटाने और फंसे लोगों की तलाश में जुटे हुए हैं।

मृतकों की संख्या 100 से अधिक बताए जाने के बावजूद अंतिम आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है। कुछ लोग लापता बताए जा रहे हैं और उनके मलबे में फंसे होने की आशंका है।

बचाव अभियान पूरा होने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि हादसे में कुल कितने लोगों की जान गई और कितने लोग घायल हुए।

एक हादसा, जिसने सोने की कीमत से बड़ा सवाल खड़ा कर दिया

जाम्बोये की खदान में हुआ हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं है। यह उस कठोर सच्चाई को सामने लाता है जहां गरीबी और रोजगार की मजबूरी लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर धरती के भीतर छिपे सोने की तलाश करने के लिए मजबूर करती है।

जिस जमीन के नीचे सोना मौजूद था, वही जमीन कुछ ही पलों में मजदूरों के लिए मौत का जाल बन गई।

अब सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना, घायलों को इलाज उपलब्ध कराना और मृतकों की पहचान कर उनके परिवारों तक जानकारी पहुंचाना है।

इसके साथ ही इस हादसे की पूरी जांच जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मजदूर असुरक्षित खदान में कैसे काम कर रहे थे और जमीन धंसने से पहले सुरक्षा व्यवस्था ने कोई चेतावनी क्यों नहीं दी।

फिलहाल जाम्बोये की सोने की खदान के मलबे के नीचे जिंदगी की तलाश जारी है और पूरे इलाके की नजर बचाव अभियान पर टिकी हुई है।

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