Video : 91 से 13! शराब टेस्ट की रिपोर्ट ने खड़ा किया बड़ा सवाल… रात डेढ़ बजे तक सड़क पर क्यों खड़ा रहा रिटायर्ड मेजर का परिवार?
गुरुग्राम, 16 अगस्त 2026: गुरुग्राम में ट्रैफिक पुलिस की ड्रिंक-एंड-ड्राइव चेकिंग को लेकर जून 2026 में सामने आया एक मामला अब भी चर्चा में है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान घायल होकर दिव्यांग हुए रिटायर्ड आर्मी मेजर हेमेंद्र कुमार सिंह ने आरोप लगाया था कि ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें शराब पीकर गाड़ी चलाने के शक में रोका, लेकिन सांस की जांच को लेकर विवाद तब बढ़ गया जब पहली रीडिंग और दोबारा किए गए टेस्ट की रीडिंग में बड़ा अंतर सामने आया।
मेजर के अनुसार, वह अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रात में डिनर के बाद घर लौट रहे थे। इसी दौरान साइबर हब और साइबर सिटी गोल्फ कोर्स रोड के आसपास ट्रैफिक पुलिस ने उनकी कार को चेकिंग के लिए रोका। आरोप है कि शुरुआत में ब्रेथ एनालाइजर में शराब की मात्रा 91 mg/100 ml दिखाई गई, जो निर्धारित सीमा से अधिक थी। मेजर ने इस परिणाम पर आपत्ति जताई और दोबारा जांच की मांग की। उनके मुताबिक नए माउथपीस के साथ किए गए दो री-टेस्ट में रीडिंग सिर्फ 13 mg/100 ml आई।
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब मेजर ने आरोप लगाया कि उन्हें और उनके परिवार को देर रात तक सड़क पर रोके रखा गया। उनका कहना था कि स्थिति इतनी परेशान करने वाली हो गई कि उन्हें खुद आपातकालीन हेल्पलाइन 112 पर संपर्क करना पड़ा।
हालांकि, इस पूरे मामले में गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस का पक्ष भी सामने आया है। पुलिस अधिकारियों ने प्रारंभिक जांच के आधार पर मेजर के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों से इनकार किया और कहा कि बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज की समीक्षा में पुलिसकर्मियों की बदसलूकी का कोई सबूत नहीं मिला। इसलिए इस मामले में दोनों पक्षों के दावों को सामने रखना जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लड़ चुके हैं मेजर
मेजर हेमेंद्र कुमार सिंह का नाम सामने आने के बाद इस मामले ने लोगों का ध्यान इसलिए भी खींचा क्योंकि उन्होंने सेना में रहते हुए जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में हिस्सा लिया था।
बेटी कार में बैठी हुई है। पत्नी कार किनारे खड़े होकर रो रही है। 'रिटायर मेजर' हरियाणा पुलिस की करतूतों को झेल रहे हैं।
— Mandeep RajBhar (@MandeepRajBhar9) August 16, 2026
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लड़ते हुए दिव्यांग हुए मेजर हेमेंद्र सिंह को गुरुग्राम में ट्रैफिक पुलिस ने शराब पीकर गाड़ी चलाने के शक में रोका। एल्कोहल टेस्ट… pic.twitter.com/CgIuuvGRl4
मेजर की शिकायत के अनुसार, एक आतंकी मुठभेड़ के दौरान वह घायल हुए थे और उनके दल ने तीन आतंकियों को मार गिराया था। बाद में 2007 में उन्होंने दिव्यांगता के आधार पर सेना से सेवानिवृत्ति ली। रिपोर्टों के अनुसार, सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अपने करियर को आगे बढ़ाया और एक कॉरपोरेट कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे।
यही वजह है कि उनके द्वारा लगाए गए आरोपों ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में भी जगह बनाई। मामला सिर्फ एक ट्रैफिक चेकिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सवाल यह भी उठने लगा कि अगर किसी जांच में पहली और दूसरी रीडिंग में इतना बड़ा अंतर आता है तो ऐसी स्थिति में पुलिस की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
पहली जांच में 91, दोबारा टेस्ट में 13
इस पूरे मामले का सबसे अहम हिस्सा ब्रेथ एनालाइजर की रीडिंग है।
मेजर के मुताबिक, पुलिस ने जब उनका पहला टेस्ट किया तो मशीन पर 91 mg/100 ml की रीडिंग आई। उनका दावा था कि उन्होंने शराब नहीं पी थी। उन्होंने पुलिस से दोबारा जांच कराने को कहा और नए माउथपीस की मांग की।
शिकायत के अनुसार, बाद में नए माउथपीस के साथ दो बार टेस्ट किया गया और दोनों बार रीडिंग 13 mg/100 ml आई। मेजर ने इसी अंतर को अपनी शिकायत का प्रमुख आधार बनाया और सवाल उठाया कि कुछ ही समय के अंतराल में रीडिंग 91 से घटकर 13 कैसे हो गई।
यही अंतर इस मामले का सबसे बड़ा विवाद बन गया।
कानूनी तौर पर भारत में मोटर वाहन कानून के तहत निर्धारित सीमा से अधिक शराब की मात्रा के साथ वाहन चलाना दंडनीय है। लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई में जांच की प्रक्रिया, उपकरण और उपलब्ध साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
माउथपीस को लेकर भी उठे सवाल
मेजर ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया कि जिस ब्रेथ एनालाइजर से उनका परीक्षण किया गया, उसका माउथपीस उन्हें पहले इस्तेमाल किया हुआ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने नए डिस्पोजेबल माउथपीस की मांग की थी। उनका दावा है कि इस मांग को लेकर भी मौके पर विवाद हुआ। बाद में नए माउथपीस के साथ किए गए परीक्षण में रीडिंग काफी कम आई।
यह आरोप स्वास्थ्य और प्रक्रिया दोनों दृष्टि से चर्चा का विषय बना। हालांकि गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि शराब जांच के दौरान प्रत्येक व्यक्ति के लिए नया पाइप या माउथपीस इस्तेमाल किया जाता है।
इसलिए इस मामले में माउथपीस को लेकर मेजर की शिकायत और पुलिस के आधिकारिक पक्ष के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
परिवार भी रहा मौके पर मौजूद
मामले को और संवेदनशील बनाने वाली बात यह थी कि उस समय मेजर अकेले नहीं थे। उनके साथ उनकी पत्नी और दो बेटियां भी थीं।
मेजर के आरोप के अनुसार, रात काफी हो चुकी थी और परिवार को लंबे समय तक मौके पर रहना पड़ा। रिपोर्टों में करीब डेढ़ घंटे तक सड़क पर रोके जाने का उल्लेख है। उन्होंने दावा किया कि उनकी पत्नी और बेटियां इस पूरी घटना से परेशान थीं।
यही वजह है कि शिकायत में केवल ब्रेथ एनालाइजर की रीडिंग का सवाल नहीं उठाया गया, बल्कि परिवार के साथ किए गए व्यवहार और उन्हें वहां कितनी देर तक रोका गया, इस पर भी सवाल उठाए गए।
मेजर ने पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायत देकर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
रात में 112 पर किया फोन
मेजर के अनुसार, जब उन्हें लगा कि मौके पर स्थिति का समाधान नहीं हो रहा है, तो उन्होंने खुद डायल-112 पर संपर्क किया।
उन्होंने आपातकालीन हेल्पलाइन पर पूरे मामले की जानकारी दी। उनकी शिकायत के मुताबिक, जब ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को पता चला कि 112 पर फोन किया गया है, तो वे मौके से चले गए।
यह आरोप भी शिकायत का हिस्सा बना और बाद में मामले की जांच वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपी गई।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि पुलिस की ओर से इस घटनाक्रम की व्याख्या मेजर के दावे से अलग है। इसलिए इसे अंतिम रूप से स्थापित तथ्य के बजाय शिकायत में लगाए गए आरोप के रूप में देखना उचित है।
पुलिस ने कहा—बॉडी कैमरा फुटेज में बदसलूकी नहीं
मामले के सामने आने के बाद गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस ने अपना पक्ष रखा। डीसीपी ट्रैफिक प्रतीक गेहलोत ने कहा कि मामले की प्रारंभिक जांच में ट्रैफिक पुलिसकर्मियों द्वारा मेजर या उनके परिवार के साथ किसी तरह की बदसलूकी का सबूत नहीं मिला।
पुलिस के अनुसार, शराब जांच के दौरान मौजूद ट्रैफिक जोनल अधिकारी के बॉडी-वॉर्न कैमरे की फुटेज भी देखी गई। पुलिस का कहना था कि उपलब्ध फुटेज के आधार पर शुरुआती 91 mg की रीडिंग के आधार पर चालान जारी किया गया था।
यानी जहां मेजर अपनी शिकायत में पुलिस के व्यवहार पर गंभीर सवाल उठा रहे थे, वहीं पुलिस प्रारंभिक जांच के आधार पर इन आरोपों को स्वीकार नहीं कर रही थी।
मामले की जांच वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी गई
शिकायत के बाद मामले की जांच ACP Traffic East को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई। इसके अलावा वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में भी मामले को देखा गया।
पुलिस की ओर से कहा गया कि जांच के दौरान उपलब्ध फुटेज और अन्य तथ्यों को देखा जा रहा है। इसलिए उस समय सामने आए आरोपों के आधार पर किसी पुलिसकर्मी को दोषी मानना उचित नहीं होगा।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि पहली ब्रेथ एनालाइजर रीडिंग और बाद की रीडिंग में इतना बड़ा अंतर क्यों आया और उस समय जांच की प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थी या नहीं।
आखिर इस घटना ने क्यों खड़े किए बड़े सवाल?
यह मामला सिर्फ एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी और ट्रैफिक पुलिस के बीच विवाद नहीं है। यह सड़क पर होने वाली शराब जांच की प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े कई सवाल सामने लाता है।
ड्रिंक-एंड-ड्राइव चेकिंग का उद्देश्य सड़क पर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। शराब पीकर वाहन चलाने से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए ट्रैफिक पुलिस की ऐसी जांच बेहद जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि जांच पारदर्शी और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हो।
अगर किसी उपकरण में संदिग्ध रीडिंग आती है और दोबारा जांच में काफी अलग परिणाम मिलता है, तो ऐसी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए उचित रिकॉर्ड और जांच महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सोशल मीडिया पर भी चर्चा में आया मामला
मेजर की शिकायत सामने आने के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहा। लोगों ने एक तरफ पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए तो दूसरी तरफ कुछ लोगों ने यह भी कहा कि ट्रैफिक पुलिस को शराब जांच करने का अधिकार है और केवल दोबारा आई कम रीडिंग के आधार पर पूरी कार्रवाई को गलत नहीं कहा जा सकता।
यही कारण है कि मामले में निष्पक्ष जांच का महत्व और बढ़ जाता है।
गुरुग्राम का यह मामला एक ऐसे रिटायर्ड सैन्य अधिकारी की शिकायत से जुड़ा है, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में सेवा दी और बाद में दिव्यांगता के आधार पर सेना से सेवानिवृत्त हुए। उनका आरोप है कि ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें शराब पीकर वाहन चलाने के शक में रोका, पहली जांच में 91 mg/100 ml रीडिंग आई और बाद के दो परीक्षणों में यह 13 mg/100 ml रह गई। उन्होंने परिवार को देर रात तक रोके रखने और पुलिस के व्यवहार पर भी गंभीर आरोप लगाए।
दूसरी ओर, गुरुग्राम पुलिस ने प्रारंभिक जांच के आधार पर बदसलूकी के आरोपों से इनकार किया और बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज का हवाला दिया। पुलिस ने कहा कि मामले की जांच जारी है।
इस पूरे विवाद का अंतिम निष्कर्ष जांच के तथ्यों पर ही निर्भर करेगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि ब्रेथ एनालाइजर की 91 और 13 mg वाली रीडिंग में इतना बड़ा अंतर क्यों आया और उस रात परिवार के साथ वास्तव में क्या हुआ था।

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