ब्रह्मोस के ‘रूसी चाचा’ ने समंदर में मचाया ऐसा कहर! पलक झपकते ही युद्धपोत को बना देता है निशाना, अब सामने आई खौफनाक ताकत
नई दिल्ली। भारत और रूस की रक्षा साझेदारी की सबसे चर्चित मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस का नाम आज दुनिया की तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में लिया जाता है। भारत में इसे लंबी दूरी से सटीक हमला करने वाली बेहद महत्वपूर्ण मिसाइल प्रणाली के तौर पर देखा जाता है। लेकिन ब्रह्मोस की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रूस की P-800 ओनिक्स मिसाइल से भी जुड़ा है। ब्रह्मोस के शुरुआती विकास का आधार रूसी P-800 परिवार की तकनीक और उसके निर्यात संस्करण याखोंट से जुड़ा रहा है। DRDO के दस्तावेजों के मुताबिक मूल ब्रह्मोस को रूसी P-800 ओनिक्स के निर्यात संस्करण याखोंट के आधार पर विकसित किया गया था।
अब यही रूसी मिसाइल एक बार फिर चर्चा में है। रूस ने अपने प्रशांत बेड़े के इलाके में तटीय मिसाइल प्रणालियों की गतिविधियों के जरिए यह संकेत दिया है कि उसके लिए समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और संभावित दुश्मन के जहाजों को दूर रखने की क्षमता कितनी महत्वपूर्ण है। 2026 में रूसी प्रशांत क्षेत्र में बास्टियन और बाल जैसी तटीय मिसाइल प्रणालियों की तैनाती और अभ्यासों की रिपोर्ट सामने आई है। इनमें प्रिमोर्स्की क्षेत्र, कामचटका, चुकोटका और कुरील द्वीपों जैसे रणनीतिक इलाके शामिल हैं।
हालांकि सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि इस अभ्यास ने “अमेरिका-नाटो के सभी एयर डिफेंस सिस्टम को फेल” कर दिया, इस दावे को तथ्य के रूप में स्वीकार करना सही नहीं होगा। किसी मिसाइल अभ्यास से दुनिया के सभी एयर डिफेंस सिस्टम के नाकाम होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। असल महत्व इस बात का है कि ओनिक्स जैसी तेज एंटी-शिप मिसाइलें आधुनिक नौसैनिक रक्षा के सामने किस तरह की चुनौती पेश करती हैं।
ब्रह्मोस और P-800 ओनिक्स का रिश्ता क्या है?
ब्रह्मोस और P-800 ओनिक्स का संबंध केवल दिखने में समानता तक सीमित नहीं है। भारत और रूस ने मिलकर ब्रह्मोस परियोजना विकसित की थी और इसकी तकनीकी जड़ें रूसी ओनिक्स/याखोंट परिवार से जुड़ी हैं।
DRDO के उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, मूल ब्रह्मोस मिसाइल रूसी घरेलू P-800 ओनिक्स के निर्यात संस्करण याखोंट पर आधारित थी। बाद में भारत और रूस ने इसे भारतीय जरूरतों के अनुरूप विकसित किया। यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ अक्सर ओनिक्स को ब्रह्मोस का तकनीकी पूर्वज या उसके परिवार की मूल मिसाइलों में से एक बताते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि आज की ब्रह्मोस और रूसी P-800 बिल्कुल एक जैसी मिसाइलें हैं। दोनों के विकास, गाइडेंस, प्लेटफॉर्म और भारतीय जरूरतों के अनुरूप किए गए सुधार अलग-अलग हैं। भारत ने ब्रह्मोस को जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च करने की क्षमता वाले परिवार के रूप में विकसित किया है।
P-800 ओनिक्स को क्यों माना जाता है खतरनाक?
P-800 ओनिक्स मूल रूप से एक सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के नौसैनिक प्लेटफॉर्म, खासकर बड़े युद्धपोतों के खिलाफ लंबी दूरी से हमला करना है।
इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसकी सुपरसोनिक गति और समुद्र के बेहद करीब उड़ान भरने की क्षमता शामिल है। समुद्र की सतह के नजदीक उड़ने वाली एंटी-शिप मिसाइलें रडार के लिए चुनौती पैदा कर सकती हैं, क्योंकि पृथ्वी की वक्रता और रडार की सीमाओं के कारण कम ऊंचाई पर आने वाले लक्ष्य का पता लगाने का समय कम हो सकता है।
यही कारण है कि ऐसी मिसाइलों के खिलाफ किसी युद्धपोत की एयर डिफेंस प्रणाली को बहुत कम समय में प्रतिक्रिया करनी पड़ सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मिसाइल को रोकना असंभव है। आधुनिक युद्धपोतों पर अलग-अलग स्तर की सेंसर और इंटरसेप्टर प्रणालियां मौजूद होती हैं और किसी भी मिसाइल की सफलता कई परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
रूस ने प्रशांत क्षेत्र में क्यों बढ़ाई गतिविधि?
रूस के लिए प्रशांत क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां उसका प्रशांत बेड़ा मौजूद है और कामचटका, कुरील द्वीप तथा ओखोट्स्क सागर का क्षेत्र उसकी समुद्री रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2026 की रक्षा-संबंधी रिपोर्टों में प्रशांत बेड़े के तटीय मिसाइल बलों में बास्टियन प्रणालियों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है। कामचटका और कुरील श्रृंखला में P-800 ओनिक्स से लैस बास्टियन प्रणालियों की तैनाती को रूस की समुद्री “बास्टियन डिफेंस” अवधारणा का हिस्सा माना जाता है।
इस रणनीति का उद्देश्य केवल किसी युद्धपोत को निशाना बनाना नहीं है। इसका बड़ा मकसद यह है कि किसी संभावित विरोधी नौसैनिक बल को रूस के महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों के करीब आने से पहले ही बड़ा जोखिम महसूस हो।
इसे सैन्य भाषा में Anti-Access/Area Denial (A2/AD) रणनीति से जोड़ा जा सकता है।
मोबाइल बास्टियन सिस्टम की खासियत
बास्टियन प्रणाली की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी मोबाइल प्रकृति है। मिसाइल लॉन्चर पहिएदार वाहनों पर आधारित होते हैं और जरूरत के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर ले जाए जा सकते हैं।
यानी किसी स्थायी लॉन्च साइट पर निर्भर रहने के बजाय मिसाइल प्रणाली को रणनीतिक इलाके में तेजी से स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे दुश्मन के लिए लॉन्चर की सही स्थिति का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
प्रशांत क्षेत्र जैसे विशाल और कठिन भौगोलिक इलाके में यह क्षमता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
कुरील द्वीप समूह, कामचटका और सखालिन के आसपास का क्षेत्र रूस के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां समुद्री मार्ग, द्वीप श्रृंखलाएं और ओखोट्स्क सागर की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
क्या ओनिक्स सच में किसी भी एयर डिफेंस को हरा सकती है?
यही वह दावा है जिसे लेकर सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है।
रक्षा क्षेत्र में अक्सर किसी मिसाइल को “एयर डिफेंस किलर”, “वॉरशिप स्लेयर” या “अजेय हथियार” जैसे नाम दिए जाते हैं। लेकिन वास्तविक युद्ध में किसी मिसाइल की सफलता केवल उसकी गति पर निर्भर नहीं करती।
रडार की क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, इंटरसेप्टर की गति, लॉन्च की दूरी, मिसाइलों की संख्या, लक्ष्य की दिशा और मौसम जैसे कई कारक परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए यह कहना कि ओनिक्स ने दुनिया के सभी एयर डिफेंस सिस्टम को “हैक” कर दिया है, तकनीकी रूप से सही निष्कर्ष नहीं होगा।
हां, सुपरसोनिक गति और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता किसी भी नौसैनिक रक्षा प्रणाली के लिए चुनौती जरूर बढ़ा सकती है।
ब्रह्मोस की सफलता में इस तकनीकी विरासत की भूमिका
भारत के लिए ओनिक्स की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रह्मोस के विकास में इसी परिवार की तकनीकी विरासत का योगदान रहा है।
भारत ने इस आधार को अपनी जरूरतों के मुताबिक विकसित किया और ब्रह्मोस को अलग-अलग लॉन्च प्लेटफॉर्म के लिए अनुकूलित किया। DRDO की सामग्री में ब्रह्मोस को जमीन, जहाज और अन्य प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल करने के लिए विकसित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
यही भारत-रूस रक्षा सहयोग की खासियत रही है कि शुरुआती तकनीकी आधार को आगे बढ़ाकर भारतीय जरूरतों के अनुरूप सिस्टम विकसित किया गया।
DRDO के एक अन्य दस्तावेज में भी P-800 ओनिक्स को ब्रह्मोस का precursor बताया गया है और यह उल्लेख किया गया है कि ब्रह्मोस को भारत-रूस सहयोग से विकसित किया गया।
अब चर्चा में क्यों आया Zircon?
ओनिक्स के साथ रूस की दूसरी मिसाइल जिरकॉन भी लगातार चर्चा में है। जिरकॉन को हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के रूप में विकसित किया गया है और इसके बारे में रूस की ओर से बेहद ऊंची गति के दावे किए जाते रहे हैं।
हालिया वर्षों में जिरकॉन का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी रिपोर्ट हुआ है। 2026 में इसके इस्तेमाल और बास्टियन प्लेटफॉर्म से जुड़े होने की रिपोर्टें सामने आई हैं। मार्च 2026 में यूक्रेनी खुफिया एजेंसी ने दावा किया था कि क्रीमिया में एक बास्टियन लॉन्चर और दो जिरकॉन मिसाइलों को नष्ट किया गया।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—बास्टियन परिवार को केवल ओनिक्स के संदर्भ में नहीं देखा जा रहा, बल्कि रूस ने इसे नई मिसाइल क्षमताओं के साथ भी जोड़ा है।
हालांकि जिरकॉन की वास्तविक गति, रेंज और युद्धक प्रदर्शन से जुड़े कई आंकड़ों पर स्वतंत्र विशेषज्ञों के बीच अभी भी बहस है। इसकी तकनीकी जानकारी का बड़ा हिस्सा रूस द्वारा सार्वजनिक नहीं किया गया है।
समुद्र में बढ़ रहा मिसाइलों का महत्व
आधुनिक नौसैनिक युद्ध में केवल बड़े युद्धपोत या विमानवाहक पोत ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। असली सवाल यह भी है कि कोई देश अपने तट और समुद्री क्षेत्र को कितनी दूर तक सुरक्षित रख सकता है।
यही वजह है कि रूस जैसे देशों के लिए मोबाइल तटीय मिसाइल प्रणालियां महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी संभावित दुश्मन के जहाज को किसी तटीय क्षेत्र के करीब आने पर लगातार मिसाइल हमले का खतरा हो, तो उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
रूस के प्रशांत क्षेत्र में बास्टियन और ओनिक्स की मौजूदगी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जाती है।
अमेरिका और NATO के लिए इसका क्या मतलब?
यह कहना कि रूस की ओनिक्स तैनाती से अमेरिका या NATO “घबरा गए हैं”, एक राजनीतिक या मीडिया व्याख्या हो सकती है, लेकिन इसका कोई सीधा प्रमाण नहीं है कि पूरे NATO के एयर डिफेंस सिस्टम इस कारण निष्प्रभावी हो गए हैं।
असल चुनौती कहीं अधिक व्यावहारिक है।
अगर किसी संभावित संघर्ष में बड़ी संख्या में तेज एंटी-शिप मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं तो नौसैनिक समूहों को लगातार अपने सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मिसाइल डिफेंस को सक्रिय रखना पड़ेगा। यानी ऐसी मिसाइलें किसी क्षेत्र में समुद्री संचालन की लागत और जोखिम दोनों बढ़ा सकती हैं।
यही कारण है कि ओनिक्स जैसी मिसाइलें रूस की तटीय रक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ब्रह्मोस के लिए भी क्यों अहम है यह कहानी?
ओनिक्स की कहानी भारत के लिए इसलिए खास है क्योंकि यह दिखाती है कि ब्रह्मोस की तकनीकी यात्रा किस परिवार से निकली थी। लेकिन आज ब्रह्मोस को केवल “रूसी ओनिक्स का दूसरा नाम” कहना सही नहीं होगा।
भारत और रूस के संयुक्त विकास ने इस तकनीक को भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार आगे बढ़ाया है। भारत अब ब्रह्मोस को अपनी सैन्य शक्ति और रक्षा निर्यात नीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखता है।
इसलिए रूस में ओनिक्स का विकास और इस्तेमाल भारत के लिए सीधे तौर पर यह समझने का अवसर भी देता है कि उस मूल तकनीकी परिवार की क्षमताएं किस दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
रूस की P-800 ओनिक्स कोई नई मिसाइल नहीं है, लेकिन इसकी तकनीकी क्षमता और रूस की तटीय रक्षा रणनीति में इसकी भूमिका आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। प्रशांत क्षेत्र में बास्टियन प्रणालियों की तैनाती और कुरील-कामचटका जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी यह दिखाती है कि रूस अपने समुद्री इलाकों के लिए लंबी दूरी की तटीय मिसाइलों को कितना महत्व देता है।
दूसरी तरफ, ब्रह्मोस की कहानी इसी रूसी तकनीकी विरासत से जुड़ी हुई है। P-800 ओनिक्स को ब्रह्मोस का तकनीकी precursor माना जाता है, लेकिन भारत ने इस आधार को अपनी जरूरतों के मुताबिक आगे विकसित किया।
इसलिए रूस के “वॉरशिप स्लेयर” की मौजूदा चर्चा को केवल सनसनी के तौर पर देखने के बजाय इसे आधुनिक समुद्री युद्ध की बदलती रणनीति के रूप में समझना ज्यादा सही होगा। ओनिक्स की असली ताकत यह नहीं कि वह दुनिया के हर एयर डिफेंस को बेकार कर देती है, बल्कि यह है कि उसकी गति, कम ऊंचाई वाली उड़ान और मोबाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म जैसी खूबियां किसी भी नौसैनिक बल के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकती हैं।

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