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विदेश कमाने गया था अभिषेक, 35 दिन बाद लौटा शव... पहचान के लिए पिता का DNA लिया गया, फिर सामने आई दिल दहला देने वाली सच्चाई!



देवरिया: उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक परिवार की खुशियां उस समय मातम में बदल गईं, जब विदेश कमाने गए 22 वर्षीय अभिषेक निषाद की रूस-यूक्रेन युद्ध की चपेट में आने से मौत हो गई। करीब 35 दिन के लंबे इंतजार के बाद सोमवार सुबह अभिषेक का शव उसके पैतृक गांव करमेल पहुंचा। जैसे ही एंबुलेंस से शव घर के दरवाजे पर पहुंचा, परिवार में चीख-पुकार मच गई। जिस बेटे को परिवार ने बेहतर भविष्य और आर्थिक मजबूती के सपनों के साथ विदेश भेजा था, वह तिरंगे में लिपटकर घर लौटा।

परिवार के लिए यह सिर्फ एक शव की वापसी नहीं थी, बल्कि उन तमाम सपनों का अंत था जिन्हें अभिषेक के विदेश जाने के साथ जोड़ा गया था। घर में मौजूद हर सदस्य की आंखें नम थीं। माता-पिता अपने इकलौते बेटे को अंतिम बार देखने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। गांव के लोग भी बड़ी संख्या में परिवार के घर पहुंचे और शोक संतप्त परिजनों को ढांढस बंधाया।

मौके पर एसडीएम राजकुमार गुप्ता समेत प्रशासन के अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे। अधिकारियों ने परिवार को हरसंभव मदद और आवश्यक प्रशासनिक सहयोग का भरोसा दिया।

विदेश जाते समय परिवार ने देखे थे बड़े सपने

गौरीबाजार क्षेत्र के करमेल गांव निवासी अभिषेक निषाद, पुत्र कौशल, महज 22 वर्ष के थे। परिवार के मुताबिक, कुछ महीने पहले वह नौ महीने के अनुबंध पर काम करने के लिए विदेश गए थे। मुंबई के एक एजेंट के माध्यम से उन्हें टर्की के एक शिप पर नौकरी मिली थी।

अभिषेक के विदेश जाने से परिवार में खुशी का माहौल था। वह परिवार का इकलौता बेटा था। पिता कौशल को बेटे से काफी उम्मीदें थीं। उन्हें भरोसा था कि अभिषेक विदेश में काम करके अच्छी कमाई करेगा और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

परिवार की सबसे बड़ी चिंता अपनी दो बेटियों साधना और अराधना की पढ़ाई तथा भविष्य को लेकर थी। पिता को उम्मीद थी कि बेटे की कमाई से दोनों बेटियों की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और उनकी शादी के लिए जमीन बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

लेकिन परिवार के ये सपने ज्यादा समय तक नहीं टिक सके। जिस बेटे से परिवार को आर्थिक सहारे की उम्मीद थी, उसकी मौत की खबर ने पूरे घर को अंदर तक तोड़ दिया।

19 जुलाई को हुआ वह हमला

बताया गया कि टर्की से यूक्रेन की ओर पहुंची शिप पर 19 जुलाई को रूसी मिसाइलों से हमला हुआ। इस हमले में चार भारतीय नागरिकों के मारे जाने की खबर सामने आई थी। मृतकों में देवरिया के अभिषेक निषाद भी शामिल थे।

मिसाइल हमले के बाद शिप पर लगी आग इतनी भीषण थी कि अभिषेक का शव बुरी तरह झुलस गया था। हालत ऐसी थी कि सामान्य तरीके से शव की पहचान करना मुश्किल हो गया। परिवार के लिए यह स्थिति और भी दर्दनाक थी, क्योंकि उन्हें यह तक निश्चित नहीं हो पा रहा था कि बरामद शव उनके बेटे का ही है या नहीं।

इसके बाद शव की पहचान के लिए डीएनए जांच का सहारा लिया गया।

पिता के डीएनए से हुई पहचान

अभिषेक की पहचान की प्रक्रिया बेहद कठिन रही। प्रशासन की मदद से उनके पिता कौशल का डीएनए सैंपल 22 जुलाई को जांच के लिए दिल्ली भेजा गया।

परिवार ने भी पहचान की प्रक्रिया में पूरी मदद की। पिता के डीएनए सैंपल से संबंधित रिपोर्ट और दस्तावेज कंपनी को उपलब्ध कराए गए। कंपनी ने इन नमूनों को शव से मिलान के लिए आगे भेजा।

परिवार कई दिनों तक इस उम्मीद में रहा कि डीएनए जांच से कम से कम यह स्पष्ट हो जाएगा कि बरामद शव अभिषेक का ही है। हर गुजरते दिन के साथ उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी।

आखिरकार डीएनए मैच होने के बाद अभिषेक की पहचान की पुष्टि हुई। इसके बाद शव को यूक्रेन से भारत लाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

करीब 35 दिन बाद खत्म हुआ इंतजार

अभिषेक के परिवार को अपने बेटे का शव मिलने के लिए करीब 35 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान परिवार लगातार प्रशासन और संबंधित कंपनी से संपर्क में रहा।

रविवार को अभिषेक का शव यूक्रेन से दिल्ली पहुंचा। इसके बाद आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर शव को एंबुलेंस से देवरिया भेजा गया।

सोमवार सुबह जब एंबुलेंस अभिषेक का शव लेकर उसके गांव पहुंची तो माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया। परिवार के सदस्य शव को देखकर खुद को संभाल नहीं सके।

जिस घर में कुछ समय पहले विदेश जाने वाले बेटे को लेकर खुशियां थीं, उसी घर में अब अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई। गांव के लोगों की आंखें भी नम थीं।

इकलौते बेटे के जाने से टूट गया परिवार

अभिषेक अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। परिवार के लिए उनका जाना सिर्फ एक सदस्य को खोना नहीं है, बल्कि पूरे भविष्य की योजनाओं का बिखर जाना है।

पिता कौशल ने बेटे को विदेश इसलिए भेजा था ताकि वह अच्छी कमाई कर सके और परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटा सके। बेटियों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता भी अभिषेक के साथ जुड़ी हुई थी।

परिवार को उम्मीद थी कि नौ महीने का अनुबंध पूरा करने के बाद अभिषेक वापस लौटेगा। वह कमाई करके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करेगा। लेकिन युद्ध क्षेत्र में हुए मिसाइल हमले ने महज 22 साल की उम्र में उसकी जिंदगी छीन ली।

अभिषेक की मौत ने गांव के लोगों को भी झकझोर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि रोजगार की तलाश में विदेश जाने वाले युवाओं के परिवार अक्सर यह उम्मीद करते हैं कि उनका बेटा सुरक्षित लौटेगा। लेकिन युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में काम करने का जोखिम कितना बड़ा हो सकता है, अभिषेक की कहानी इसका दर्दनाक उदाहरण है।

देवरिया में पहले भी सामने आ चुका है ऐसा मामला

यह पहली बार नहीं है जब देवरिया के किसी युवक की विदेश में संघर्ष या सैन्य तनाव के बीच जान गई हो। इससे पहले भी जिले के एक युवक की मौत अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौरान हुई थी।

देवरिया के सुरौली गांव निवासी शिवानंद चौरसिया शिप पर इंजन फिटर के तौर पर काम करते थे। उनके परिवार को इस साल 11 जून को उनकी मौत की खबर मिली थी।

बताया गया था कि शिवानंद जिस जहाज पर काम कर रहे थे, उस पर अमेरिकी नेवी की ओर से हमला हुआ था। जहाज पर कुल 24 क्रू सदस्य मौजूद थे। हमले के बाद तीन लोग लापता हो गए थे, जिनमें शिवानंद भी शामिल थे। बाद में उनका शव बरामद किया गया था।

शिवानंद के भाई दुबई में काम करते थे और उन्होंने परिवार को घटना की जानकारी दी थी।

विदेश में नौकरी का सपना और युद्ध का खतरा

अभिषेक और शिवानंद दोनों की कहानियां अलग-अलग परिस्थितियों से जुड़ी हैं, लेकिन दोनों घटनाओं में एक समान बात है—रोजगार की तलाश में घर से दूर गए युवाओं का अंतरराष्ट्रीय संघर्षों की चपेट में आ जाना।

आज बड़ी संख्या में भारतीय युवा बेहतर रोजगार और आय के लिए विदेशों में जाते हैं। शिपिंग इंडस्ट्री में भी हजारों भारतीय काम करते हैं। कई बार उन्हें ऐसे समुद्री क्षेत्रों से गुजरना पड़ता है जहां युद्ध, मिसाइल हमले, समुद्री संघर्ष या अन्य सुरक्षा जोखिम बने रहते हैं।

ऐसे में किसी भी संघर्ष क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा बन जाती है। अभिषेक का परिवार भी यही सोचकर बैठा था कि बेटा कुछ महीनों में घर लौटेगा। लेकिन एक मिसाइल हमले ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी।

35 दिन का इंतजार, फिर अंतिम विदाई

अभिषेक के परिवार के लिए पिछले 35 दिन किसी लंबे इंतजार से कम नहीं रहे। पहले मौत की खबर, फिर जले हुए शव की पहचान की समस्या, डीएनए जांच और उसके बाद शव को भारत लाने की प्रक्रिया—हर चरण ने परिवार के दर्द को और बढ़ाया।

अब अभिषेक का शव गांव पहुंच चुका है और परिवार उसे अंतिम विदाई देने की तैयारी कर रहा है। घर के बाहर लोगों की भीड़ है, लेकिन जिस घर में बेटे की वापसी का इंतजार था, वहां अब मातम पसरा हुआ है।

22 साल की उम्र में अभिषेक की जिंदगी खत्म हो गई, लेकिन उसके परिवार के लिए उसकी यादें हमेशा बनी रहेंगी। पिता की आंखों में बेटे के लिए देखे गए सपने अब आंसुओं में बदल चुके हैं। बेटियों के सामने भी अब अपने भाई की याद और परिवार को संभालने की बड़ी जिम्मेदारी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच हुई यह घटना एक बार फिर बताती है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। हजारों किलोमीटर दूर बैठे परिवार भी इसकी कीमत चुकाते हैं। देवरिया के अभिषेक निषाद का परिवार इसका दर्दनाक उदाहरण बन गया है—एक ऐसा परिवार जिसने बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपने इकलौते बेटे को विदेश भेजा था, लेकिन करीब 35 दिन बाद वही बेटा हमेशा के लिए ताबूत में घर लौटा।

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