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नेपाल में अचानक आई मौत की लहर! 157 जानें गईं, सैकड़ों लापता… अब भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, आगे क्या होगा?



नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी इलाके में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने तबाही का ऐसा मंजर दिखाया है, जिसने पूरे दक्षिण एशिया को हिला दिया है। बुधवार, 26 अगस्त को अचानक आए बाढ़ के सैलाब ने नेपाल के कई पहाड़ी इलाकों में घरों, पुलों, सड़कों, वाहनों और बिजली परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। शुरुआत में नेपाल में 95 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई थी, लेकिन गुरुवार सुबह तक मृतकों की संख्या बढ़कर 157 हो गई। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी कम से कम तीन मौतों की सूचना है। सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं और राहत-बचाव अभियान लगातार जारी है।

इस आपदा का सबसे ज्यादा असर नेपाल के रसुवा और नुवाकोट समेत कई जिलों में देखने को मिला है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक पानी बढ़ने के बाद नदी किनारे बसे इलाकों में भारी तबाही हुई। कई जगह पानी के साथ चट्टान, मिट्टी और मलबे का इतना तेज बहाव आया कि लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का मौका तक नहीं मिला। सोशल मीडिया और सुरक्षा कैमरों से सामने आए वीडियो में पुल, घर और वाहन कुछ ही पलों में पानी और मलबे में गायब होते दिखाई दे रहे हैं।

अचानक कैसे आई इतनी भयानक बाढ़?

शुरुआती तौर पर इस आपदा को तिब्बत की ओर से आई बाढ़ और भारी बारिश से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन बाद में वैज्ञानिक आकलनों ने एक और गंभीर तस्वीर सामने रखी। विशेषज्ञों के मुताबिक संभवतः ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से नदी में अचानक भारी मात्रा में मलबा और पानी पहुंचा। इससे नीचे की ओर पानी का दबाव बेहद तेजी से बढ़ गया और फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो गई।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सैटेलाइट तस्वीरों में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने के संकेत मिले हैं। यह हिस्सा करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान और मलबे का भारी प्रवाह पैदा हुआ। विशेषज्ञों ने इसे संभावित ice-rock avalanche बताया है। हालांकि इस घटना के अंतिम कारणों की जांच अभी जारी है।

कुछ शुरुआती रिपोर्टों में भूकंपीय गतिविधि की संभावना का भी उल्लेख हुआ था, लेकिन बाद के वैज्ञानिक आकलनों में ग्लेशियर के ढहने को प्रमुख संभावित कारण बताया गया है। इसलिए फिलहाल इसे सीधे किसी भूकंप से जोड़ना उचित नहीं होगा।

कुछ मिनटों में बदल गया पूरा इलाका

रसुवा जिले का यह क्षेत्र हिमालयी पर्यटन और व्यापार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यहां से होकर लोग तिब्बत की ओर जाने वाले रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन बुधवार सुबह नदी का बहाव अचानक इतना तेज हुआ कि पूरा इलाका मलबे की नदी में बदल गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पानी के साथ बड़े-बड़े पत्थर, पेड़ और निर्माण सामग्री बहती हुई आई। नदी किनारे मौजूद घरों और दूसरी संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचा। कई वाहन पानी में फंस गए और कुछ वाहन बहते हुए दिखाई दिए।

वीडियो फुटेज में कई जगहों पर लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर भागते नजर आए। कुछ ही सेकंड में जिस जगह सामान्य गतिविधियां चल रही थीं, वहां पानी और मलबे का सैलाब दिखाई देने लगा। अधिकारियों ने नदी किनारे रहने वाले लोगों से तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की।

पुल और सड़कें हुईं तबाह

फ्लैश फ्लड का सबसे बड़ा असर नेपाल के परिवहन नेटवर्क पर पड़ा है। कई पुल बह गए और महत्वपूर्ण सड़कों को नुकसान पहुंचा है। शुरुआती आकलनों में करीब 40 किलोमीटर सड़क मार्ग के क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है।

हिमालयी इलाकों में सड़क और पुल किसी क्षेत्र की जीवनरेखा होते हैं। इनके टूटने का सीधा मतलब है कि राहत सामग्री पहुंचाना और फंसे लोगों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि कई प्रभावित इलाकों में बचाव दलों को मौसम और टूटे संपर्क मार्गों दोनों से जूझना पड़ रहा है।

बिजली व्यवस्था को भी बड़ा झटका

प्राकृतिक आपदा का असर नेपाल की ऊर्जा व्यवस्था पर भी पड़ा है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार करीब 430 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। इनमें कई जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं। यह नेपाल की कुल हाइड्रोपावर क्षमता का 12 फीसदी से ज्यादा हिस्सा है।

बाढ़ से उत्पादन संयंत्रों के अलावा ट्रांसमिशन और वितरण ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। कुछ परियोजनाओं को सुरक्षा कारणों से ग्रिड से अलग करना पड़ा। इससे प्रभावित इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हुई है।

नेपाल जैसे देश में, जहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा जलविद्युत पर निर्भर है, ऐसी प्राकृतिक आपदा का असर काफी व्यापक हो सकता है।

सैकड़ों लोग अब भी लापता

मृतकों की संख्या बढ़ने के साथ सबसे बड़ी चिंता लापता लोगों को लेकर है। नेपाल सरकार के 27 अगस्त के आंकड़ों के मुताबिक 484 लोग लापता हैं। इनमें 391 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली नागरिक शामिल हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के रिकॉर्ड के अनुसार लापता विदेशी नागरिकों में 134 भारतीय, 47 अमेरिकी, 33 ब्रिटिश और 34 ऑस्ट्रेलियाई नागरिक शामिल हैं।

कई लापता लोग कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़े बताए जा रहे हैं। आपदा के कारण सीमा क्षेत्र में यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच संपर्क टूट गया। कई लोगों की स्थिति का पता लगाने के लिए अधिकारी लगातार स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के साथ संपर्क में हैं।

इसी बीच चीन के तिब्बत क्षेत्र के ग्यिरोंग काउंटी में भी मलबे की चपेट में आने से तीन लोगों की मौत और 265 लोगों के लापता होने की सूचना दी गई है। इससे स्पष्ट है कि इस आपदा का असर सीमा के दोनों ओर पड़ा है।

राहत और बचाव अभियान में जुटी नेपाली सेना

नेपाल सरकार ने राहत और बचाव अभियान तेज कर दिया है। नेपाली सेना और अन्य सुरक्षा बलों को प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया गया है। हेलीकॉप्टरों के जरिए भी लोगों को निकालने और राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि तेज बहाव और खराब मौसम के कारण हेलीकॉप्टरों को कुछ प्रभावित क्षेत्रों में उतरने में मुश्किल हो रही है। जमीन पर भी सड़क और पुल टूट जाने के कारण राहत दलों की आवाजाही प्रभावित हुई है। ऐसे में बचाव अभियान कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने सुरक्षा एजेंसियों को राहत और बचाव अभियान तेज करने के निर्देश दिए हैं। निचले इलाकों और नदी किनारे रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने और लगातार सतर्क रहने को कहा गया है।

PM मोदी ने बालेन शाह को किया फोन

इस मुश्किल घड़ी में भारत ने नेपाल की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से फोन पर बातचीत कर जानमाल के नुकसान पर संवेदना जताई और भारत की ओर से हर संभव मानवीय सहायता देने का भरोसा दिया।

मोदी ने कहा कि भारत इस कठिन समय में नेपाल के लोगों के साथ खड़ा है और दोनों देशों की टीमें राहत एवं बचाव प्रयासों के लिए मिलकर काम कर रही हैं।

इसके बाद भारत ने राहत सामग्री नेपाल भेजी। भारतीय वायुसेना के C-130J विमान से करीब 10 टन राहत सामग्री भेजी गई, जिसमें अस्थायी आश्रय, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और जरूरी दवाएं शामिल हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कहा कि भारत नेपाल की आपदा प्रतिक्रिया में सहयोग के लिए मानवीय सहायता और जरूरी चिकित्सा सामग्री भेज रहा है।

बालेन शाह ने भारत का जताया आभार

प्रधानमंत्री मोदी की फोन पर बातचीत और भारत की सहायता पर नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने आभार जताया। उन्होंने भारत की संवेदनशीलता और सहायता की पेशकश को दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों का प्रतीक बताया।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भी भारत की ओर से भेजी गई मानवीय सहायता और मेडिकल सप्लाई के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने भारत की त्वरित प्रतिक्रिया को दोनों देशों के बीच सहयोग और एकजुटता का उदाहरण बताया।

RSP प्रवक्ता जगदीश खरेल का भारत को संदेश

इस पूरे घटनाक्रम पर नेपाल की सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के प्रवक्ता जगदीश खरेल ने भी भारत के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि भारत की चिंता और मदद के लिए नेपाल तथा RSP की ओर से भारत के लोगों, भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को दिल से धन्यवाद दिया जाता है।

खरेल के मुताबिक नेपाल सरकार फिलहाल शुरुआती आकलन कर रही है कि देश को कितनी और किस तरह की अंतरराष्ट्रीय सहायता की जरूरत है। विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और पार्टी स्तर पर स्थिति का आकलन किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पड़ोसी देशों का सहयोग नेपाल के लिए महत्वपूर्ण है और 2015 के भूकंप के समय भी भारत की सहायता महत्वपूर्ण रही थी।

भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में भी अलर्ट

नेपाल में आई बाढ़ का असर आगे चलकर भारत के कुछ हिस्सों तक पहुंचने की आशंका को देखते हुए बिहार और उत्तर प्रदेश में भी सतर्कता बढ़ाई गई है। खासकर गंडक नदी प्रणाली के जलस्तर पर नजर रखी जा रही है।

केंद्र सरकार ने दोनों राज्यों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। बिहार में पश्चिम चंपारण और मुजफ्फरपुर समेत संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त NDRF टीमों की तैनाती की गई है। उत्तर प्रदेश में भी अतिरिक्त टीमें तैनात की गई हैं।

इसका कारण यह है कि नेपाल से निकलने वाली नदियों का पानी आगे चलकर भारत में प्रवेश करता है। ऐसे में नेपाल में भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ का असर सीमावर्ती भारतीय इलाकों के जलस्तर पर पड़ सकता है।

क्या अभी और खतरा बाकी है?

विशेषज्ञों की चिंता सिर्फ मौजूदा बाढ़ तक सीमित नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अत्यधिक मौसम की घटनाओं के बढ़ने से अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।

रॉयटर्स के अनुसार विशेषज्ञों ने हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव को ऐसे घटनाक्रमों के व्यापक जोखिम से जोड़ा है। नेपाल पिछले तीन दशकों में अपने हिमनदों के एक बड़े हिस्से को खो चुका है और हाल के वर्षों में बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ी है।

यही कारण है कि आने वाले समय में सिर्फ राहत अभियान ही नहीं, बल्कि बेहतर शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षित निर्माण भी बेहद जरूरी हो सकता है।

2015 के भूकंप की याद क्यों आई?

नेपाल में 2015 का विनाशकारी भूकंप देश के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में शामिल रहा है। मौजूदा फ्लैश फ्लड का पैमाना और इससे हुआ नुकसान देखकर कई लोग उस त्रासदी को याद कर रहे हैं। हालांकि दोनों आपदाओं की प्रकृति अलग है और वर्तमान बाढ़ को 2015 के भूकंप के बराबर बताना वैज्ञानिक तुलना नहीं होगी।

फिर भी मौजूदा आपदा ने नेपाल के सामने एक बार फिर यह चुनौती खड़ी कर दी है कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक होने वाली प्राकृतिक घटनाओं से लोगों को कैसे बचाया जाए।

अभी कहानी खत्म नहीं हुई

नेपाल-चीन सीमा पर आई यह फ्लैश फ्लड अभी भी एक विकसित होती हुई आपदा है। मृतकों की संख्या 95 से बढ़कर 157 तक पहुंच चुकी है और सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। कई इलाकों में संपर्क मार्ग टूटे हुए हैं और राहत दल प्रभावित लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत ने राहत सामग्री भेजकर और नेपाल के प्रधानमंत्री से सीधे संपर्क कर सहायता का भरोसा दिया है। वहीं नेपाल की ओर से भी भारत की मदद के लिए आभार जताया गया है।

सबसे बड़ी चुनौती अब उन लोगों को ढूंढना है, जिनका अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। नदियों का उफान भले धीरे-धीरे कम हो, लेकिन इस तबाही के बाद मलबे के नीचे जिंदगी की तलाश और टूटे हुए इलाकों को फिर से खड़ा करने की चुनौती बहुत लंबी होने वाली है।

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