जिस राज का किसी को अंदाजा नहीं था… पति का ऑपरेशन हुआ तो सामने आया पत्नी के प्यार का ऐसा सच, पढ़कर आंखें नम हो जाएंगी!
आगरा: प्यार और रिश्तों की असली परीक्षा अक्सर मुश्किल वक्त में होती है। उत्तर प्रदेश के आगरा से सामने आई एक कहानी ने पति-पत्नी के रिश्ते में भरोसे और त्याग की मिसाल पेश की है। हाथरस के सिकंदराराऊ निवासी 32 वर्षीय शिक्षक महेंद्र कुशवाहा की दोनों किडनियां खराब हो गई थीं और वह लंबे समय से डायलिसिस पर थे। ऐसे मुश्किल समय में उनकी पत्नी मीना ने अपनी एक किडनी दान करने का फैसला किया और पति को नई जिंदगी देने की राह चुनी।
सबसे खास बात यह है कि यह ट्रांसप्लांट आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (SN Medical College) के इतिहास में पहली सफल किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी बताई जा रही है। 22 अगस्त 2026 को महेंद्र का किडनी प्रत्यारोपण किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार शुरुआती सर्जरी एसजीपीजीआई लखनऊ के विशेषज्ञों की निगरानी और सहयोग से की गई। इससे पहले मेडिकल कॉलेज में ट्रांसप्लांट की तैयारियां और मरीजों की कानूनी व चिकित्सकीय जांच की प्रक्रिया पूरी की गई थी।
डेढ़ साल से बीमारी से जूझ रहे थे महेंद्र
महेंद्र कुशवाहा एक निजी स्कूल में शिक्षक हैं। करीब डेढ़ साल पहले उन्हें पता चला कि उनकी दोनों किडनियां ठीक से काम नहीं कर रही हैं। बीमारी बढ़ने के बाद उन्हें नियमित डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगी।
डायलिसिस किसी भी मरीज और उसके परिवार के लिए आसान नहीं होता। बार-बार अस्पताल जाना, इलाज का खर्च और बीमारी के कारण सामान्य जिंदगी प्रभावित होना परिवार के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। महेंद्र के मामले में भी उनकी पत्नी मीना लगातार उनके साथ खड़ी रहीं।
बताई गई जानकारी के अनुसार मीना खुद पति को डायलिसिस के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज लेकर आती थीं। घर में तीन बच्चों की जिम्मेदारी होने के बावजूद उन्होंने पति की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी।
इसी दौरान डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि महेंद्र की स्थिति में किडनी ट्रांसप्लांट एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।
पति को किडनी देने में एक मिनट भी नहीं लगाया
जब महेंद्र के परिवार के सामने किडनी डोनर की बात आई तो मीना ने खुद आगे बढ़कर अपनी किडनी देने की इच्छा जताई। उनके लिए यह फैसला किसी बड़ी दुविधा का विषय नहीं था।
बताया गया है कि मीना ने कहा कि जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने जीवनभर साथ निभाने का वादा किया है, उसके लिए अपनी एक किडनी देना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। उन्होंने पति को किडनी देने का फैसला लगभग एक मिनट में कर लिया।
हालांकि किसी भी जीवित डोनर से अंगदान के पहले विस्तृत चिकित्सकीय जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होता है। मीना की भी जरूरी जांच की गई और रिपोर्ट उपयुक्त पाए जाने के बाद ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
एसएन मेडिकल कॉलेज में किडनी ट्रांसप्लांट शुरू करने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। मार्च 2026 की रिपोर्टों में बताया गया था कि शुरुआती 25 ट्रांसप्लांट एसजीपीजीआई लखनऊ के विशेषज्ञों की निगरानी में किए जाने थे।
22 अगस्त को हुआ पहला ट्रांसप्लांट
एसएन मेडिकल कॉलेज में पहले किडनी ट्रांसप्लांट की तारीख 22 अगस्त तय की गई थी। इससे पहले तीन मरीजों की कानूनी अनुमति और चिकित्सकीय जांच पूरी की गई थी। एसजीपीजीआई की टीम ने रिपोर्टों का मूल्यांकन करने के बाद ऑपरेशन की तारीख तय की थी।
22 अगस्त को महेंद्र का ऑपरेशन किया गया। एक रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त टीम की सर्जरी सुबह करीब 9:30 बजे शुरू हुई और दोपहर करीब 3 बजे तक चली। यह एसएन मेडिकल कॉलेज के इतिहास में पहला सफल किडनी प्रत्यारोपण था।
ऑपरेशन के बाद महेंद्र और उनकी पत्नी मीना दोनों को अस्पताल में निगरानी में रखा गया। संक्रमण से बचाव और ट्रांसप्लांट के बाद की मेडिकल गाइडलाइन के कारण दोनों को अलग रखा गया।
नई किडनी ने काम करना शुरू किया
ट्रांसप्लांट के बाद महेंद्र की स्थिति को लेकर परिवार के लिए सबसे बड़ी राहत की खबर यह रही कि नई किडनी ने काम करना शुरू कर दिया। डॉक्टरों के अनुसार यूरिन बनना शुरू हो गया और उनकी जांचों में भी सुधार देखा गया।
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। डॉक्टर मरीज की किडनी की कार्यक्षमता, संक्रमण और अन्य जरूरी स्वास्थ्य मानकों पर लगातार नजर रखते हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज के किडनी रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अपूर्व जैन के अनुसार मरीज की किडनी और अन्य जांच सामान्य बताई गई हैं। मरीज को फिलहाल लिक्विड डाइट दी जा रही है और डॉक्टर लगातार उसकी निगरानी कर रहे हैं।
अगर स्वास्थ्य में इसी तरह सुधार जारी रहा तो करीब दो सप्ताह के आसपास उन्हें अस्पताल से छुट्टी देने पर विचार किया जा सकता है।
पति-पत्नी आमने-सामने नहीं मिल सके तो हुई वीडियो कॉल
ट्रांसप्लांट के बाद मीना और महेंद्र दोनों अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन संक्रमण से बचाव और चिकित्सा संबंधी सावधानियों के कारण उन्हें आमने-सामने मिलने की अनुमति नहीं थी।
पति-पत्नी के लिए यह समय भावनात्मक रूप से भी काफी कठिन था। जिस पत्नी ने पति को अपनी किडनी दी थी, वह ऑपरेशन के बाद भी उनसे सीधे नहीं मिल पा रही थी।
ऐसे में अस्पताल प्रशासन ने दोनों की वीडियो कॉल के जरिए बातचीत कराई।
वीडियो कॉल पर मीना ने पति से सबसे पहले उनका हाल पूछा—क्या वह ठीक हैं? महेंद्र को स्क्रीन पर देखकर मीना को राहत मिली। बातचीत के दौरान वह भावुक हो गईं और उनकी आंखों में आंसू आ गए।
यह पल उनके लिए सिर्फ एक सामान्य बातचीत नहीं थी। कुछ दिन पहले तक पति बीमारी और डायलिसिस से जूझ रहे थे और अब उनकी जिंदगी में एक नई उम्मीद दिखाई दे रही थी।
ससुर ने बहू को बताया देवी जैसा
महेंद्र के पिता पप्पू सिंह ने अपनी बहू मीना के त्याग की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि बहू ने बेटे के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया है और उनके लिए मीना किसी देवी से कम नहीं हैं।
परिवार के लिए यह सिर्फ एक सफल ऑपरेशन नहीं है, बल्कि वर्षों की चिंता और बीमारी के बाद मिली बड़ी राहत भी है।
महेंद्र की बीमारी के दौरान उनकी पत्नी लगातार उनके साथ रहीं। डायलिसिस से लेकर अस्पताल की प्रक्रिया तक उन्होंने पति का साथ नहीं छोड़ा। आखिरकार जब किडनी दान करने की जरूरत आई तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली।
एसएन मेडिकल कॉलेज के लिए भी ऐतिहासिक उपलब्धि
महेंद्र का ट्रांसप्लांट सिर्फ उनके परिवार के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि एसएन मेडिकल कॉलेज के लिए भी इसे ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।
एसएन मेडिकल कॉलेज में किडनी ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू करने की प्रक्रिया कई महीनों से चल रही थी। अस्पताल में मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, जरूरी मशीनें और ट्रांसप्लांट से संबंधित सुविधाएं तैयार की गई थीं। शुरुआती सर्जरी के लिए एसजीपीजीआई लखनऊ के विशेषज्ञों की सहायता लेने की व्यवस्था की गई थी।
अगस्त की शुरुआत तक ट्रांसप्लांट की तारीख तय नहीं हो सकी थी, लेकिन बाद में एसजीपीजीआई टीम के साथ समन्वय के बाद 22 अगस्त की तारीख तय की गई।
अब इस सुविधा से आगरा और आसपास के जिलों के गंभीर किडनी मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। पहले मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, लखनऊ या जयपुर जैसे शहरों का रुख करना पड़ता था।
गरीब मरीजों को भी मिल सकती है बड़ी राहत
एसएन मेडिकल कॉलेज में किडनी ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू होने का एक बड़ा फायदा आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को हो सकता है। अगस्त में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक आयुष्मान कार्ड, मुख्यमंत्री राहत कोष योजना और बीपीएल कार्डधारकों के लिए निशुल्क सुविधा का प्रावधान बताया गया था, जबकि अन्य मरीजों के लिए खर्च करीब 2.50 लाख रुपये बताया गया। निजी अस्पतालों में इसी तरह की सर्जरी का खर्च इससे काफी अधिक हो सकता है।
इससे उन परिवारों को मदद मिल सकती है जो लंबे समय तक डायलिसिस का खर्च उठाते हुए ट्रांसप्लांट की व्यवस्था नहीं कर पाते।
इस कहानी में सिर्फ इलाज नहीं, एक रिश्ते की ताकत भी है
महेंद्र और मीना की कहानी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें चिकित्सा उपलब्धि के साथ एक मानवीय पहलू भी जुड़ा हुआ है। एक तरफ डॉक्टरों की टीम ने जटिल ट्रांसप्लांट को सफल बनाने के लिए मेहनत की, तो दूसरी तरफ मीना ने अपने पति के लिए अंगदान का फैसला लेकर परिवार को उम्मीद दी।
हालांकि किडनी दान कोई साधारण फैसला नहीं होता। जीवित डोनर के लिए मेडिकल जांच, कानूनी अनुमति और विशेषज्ञों की स्वीकृति जरूरी होती है। इसलिए मीना का निर्णय भावनात्मक होने के साथ-साथ पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही संभव हुआ।
फिलहाल महेंद्र और मीना दोनों डॉक्टरों की निगरानी में हैं और स्वास्थ्य में सुधार बताया जा रहा है। महेंद्र के लिए नई किडनी के काम करने से परिवार में खुशी है, जबकि एसएन मेडिकल कॉलेज के लिए यह पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट एक नई शुरुआत है।
एक पत्नी का यह त्याग, डॉक्टरों की मेहनत और आधुनिक चिकित्सा सुविधा—तीनों ने मिलकर महेंद्र को जिंदगी की नई उम्मीद दी है। अब परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि महेंद्र की नई किडनी इसी तरह काम करती रहे और जल्द ही वह अस्पताल से घर लौटकर अपनी पत्नी और तीनों बच्चों के साथ सामान्य जिंदगी की ओर वापस लौट सकें।

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