गरीब की बेटी IAS-IPS नहीं बन सकती?” उज्जैन में छात्राओं का ऐसा प्रदर्शन कि प्रशासन भी हुआ सवालों के घेरे में! वीडियो में देखें बेटियों की दहाड़
उज्जैन, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के उज्जैन में सरकारी स्कूल की छात्राओं का प्रदर्शन अब शिक्षा व्यवस्था और छात्राओं की सुविधाओं को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। सराफा क्षेत्र स्थित सरकारी स्कूल को दाऊदखेड़ी में स्थानांतरित किए जाने के विरोध में बड़ी संख्या में छात्राएं कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं और वहीं बैठकर प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित नया स्कूल मौजूदा स्थान से करीब 12 से 15 किलोमीटर दूर है।
छात्राओं का कहना है कि स्कूल को इतनी दूर ले जाने से उनके लिए रोजाना स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। आने-जाने का अतिरिक्त समय और खर्च विशेष रूप से उन परिवारों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है।
कलेक्टर कार्यालय के बाहर बैठीं छात्राएं
शुक्रवार को छात्राएं अपनी मांग लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं। उन्होंने स्कूल को मौजूदा स्थान पर ही संचालित रखने की मांग करते हुए नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्राएं भावुक भी नजर आईं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने छात्राओं को लिखित आश्वासन दिया, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।
छात्राओं का सवाल सीधा है—अगर स्कूल शहर से इतनी दूर चला जाएगा, तो वे रोजाना वहां कैसे पहुंचेंगी?
“क्या गरीब की बेटी IAS-IPS नहीं बन सकती?”
प्रदर्शन के बीच छात्राओं की ओर से उठाया गया सवाल सोशल मीडिया पर भी चर्चा में है—“क्या गरीब की बेटी IAS-IPS नहीं बन सकती?”
यह सवाल सिर्फ एक स्कूल की दूरी को लेकर नहीं है। इसके पीछे उन परिवारों की चिंता है जिनके लिए बच्चों की शिक्षा पहले ही कई आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जुड़ी हुई है।
कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च मुश्किल से उठा पाते हैं। ऐसे में यदि स्कूल तक पहुंचने के लिए रोजाना अतिरिक्त किराया देना पड़े या लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और स्कूल आने की नियमितता पर पड़ सकता है।
“शिक्षा हमारा अधिकार है, इसे हमसे मत छीनिए”
प्रदर्शन कर रही छात्राओं ने प्रशासन के सामने शिक्षा के अधिकार और स्कूल की पहुंच का मुद्दा रखा। उनका कहना है कि वे पढ़ना चाहती हैं और अपने भविष्य के लिए आगे बढ़ना चाहती हैं, लेकिन स्कूल को दूर स्थानांतरित करने से उनके सामने नई परेशानी खड़ी हो जाएगी।
छात्राओं की यह मांग शिक्षा के उस व्यापक सवाल से जुड़ती है कि सरकारी स्कूलों तक गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों की आसान पहुंच कैसे सुनिश्चित की जाए।
Gen Alpha की बढ़ती आवाज
उज्जैन की घटना को नई पीढ़ी के बढ़ते आत्मविश्वास के उदाहरण के तौर पर भी देखा जा रहा है। बच्चे अब अपनी समस्याओं को लेकर चुप रहने के बजाय सीधे प्रशासन के सामने अपनी बात रख रहे हैं।
राजस्थान के अलवर में स्कूली बच्चों के प्रदर्शन के बाद अब उज्जैन की छात्राओं का विरोध भी चर्चा में है। दोनों घटनाओं में एक समान सवाल दिखाई देता है—क्या बच्चों को बेहतर शिक्षा और स्कूल तक आसान पहुंच के लिए खुद सड़कों पर उतरना पड़ेगा?
सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती
स्कूल को स्थानांतरित करने के पीछे प्रशासन की क्या वजह है, यह पूरी तरह स्पष्ट होना जरूरी है। यदि स्थानांतरण किसी प्रशासनिक, भवन संबंधी या अन्य आवश्यक कारण से किया जा रहा है, तो उसके साथ छात्राओं की आने-जाने की समस्या का समाधान भी जरूरी होगा।
स्कूल की नई जगह तय करते समय केवल भवन या जमीन की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की पहुंच, परिवहन, सुरक्षा और परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
छात्राओं के सवाल ने अब प्रशासन के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी रख दी है। स्कूल कहां होगा, यह फैसला प्रशासन कर सकता है, लेकिन उस स्कूल तक बच्चे आसानी से पहुंच पाएंगे या नहीं—इस सवाल का जवाब भी उतना ही जरूरी है।
आखिर इन छात्राओं की मांग बहुत बड़ी नहीं है। वे सिर्फ इतना चाहती हैं कि उनकी पढ़ाई बाधित न हो और उनके सपनों के रास्ते में स्कूल की दूरी दीवार न बन जाए।

कोई टिप्पणी नहीं