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मिट्टी के नीचे दफन थी एक नवजात… फिर नाना ने हटाई मिट्टी तो सामने आया ऐसा सच, जिसने बदल दी पूरी जिंदगी!



कभी-कभी जिंदगी की शुरुआत ही ऐसी घटना से होती है, जिसकी कल्पना करना भी किसी के लिए मुश्किल हो सकता है। एक नवजात बच्ची, जिसे दुनिया में आए अभी कुछ ही दिन हुए थे, उसे उसके अपने पिता ने कथित तौर पर जिंदा दफना दिया। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। मिट्टी के नीचे दबाई गई उस बच्ची की सांसें चल रही थीं। उसके नाना ने समय रहते उसे खोज लिया और मिट्टी हटाकर बाहर निकाल लिया। यही बच्ची आगे चलकर बड़ी हुई, पढ़ी-लिखी, नर्स बनी, सामाजिक कार्यकर्ता बनी और महिला शिशु हत्या के खिलाफ आवाज उठाने वाली प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हुई।

यह कहानी है सुनीता अरलीकर की, जिनका जीवन जन्म से ही संघर्ष की ऐसी कहानी बन गया, जिसमें मौत से बचने के बाद उन्होंने समाज की उन बेटियों के लिए आवाज उठाई, जिन्हें जन्म लेने से पहले या जन्म के बाद ही खत्म कर दिया जाता है।

जन्म के सिर्फ 13 दिन बाद मां की मौत

सुनीता की जिंदगी का पहला बड़ा हादसा उनके जन्म के महज 13 दिन बाद हुआ। उनकी मां की अचानक मौत हो गई। परिवार बेहद गरीब था और जिंदगी चलाने के लिए उन्हें जन्म देने के कुछ समय बाद ही काम पर लौटना पड़ा था।

सुनीता की मां गर्भावस्था के दौरान अपने पति से अलग होकर महाराष्ट्र के मौजूदा लातूर जिले के लोडगा गांव स्थित अपने मायके चली आई थीं। एक दिन घर में गोबर से लिपाई करते समय उन्हें उल्टियां हुईं और देखते ही देखते उनकी हालत बिगड़ गई। कुछ ही देर में उनकी मौत हो गई।

सुनीता के नाना ने इस घटना की सूचना उनके पिता को दी, लेकिन वह अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचे। काफी इंतजार करने के बाद परिवार ने नदी के किनारे अंतिम संस्कार कर दिया। अगले दिन जब नाना वहां पहुंचे तो तेज बारिश के कारण नदी का पानी अंतिम संस्कार वाली जगह से बह रहा था। बेटी की राख तक बह जाने से वह बेहद दुखी हुए।

लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ घंटों में उन्हें अपनी बेटी की मौत से भी ज्यादा भयावह मंजर देखने को मिलेगा।

पिता बच्ची को ले गया और नाना को हुआ शक

मां की मौत के बाद सुनीता के पिता और परिवार के कुछ लोग वहां पहुंचे। नवजात बच्ची कपड़े के एक टुकड़े में लिपटी हुई पास में पड़ी थी। नाना ने बच्ची को उसके पिता को सौंपते हुए कहा कि अब वह अपनी बेटी की जिम्मेदारी संभालें।

बताया जाता है कि बच्ची के रोने पर परिवार की ओर से बेहद क्रूर बातें कही गईं। उसकी दादी ने कथित तौर पर यहां तक कहा कि बच्ची अपनी मां की मौत का कारण बनी है और उसे भी चिता पर डाल देना चाहिए था।

सुनीता के पिता बच्ची को लेकर वहां से निकल गए। लेकिन नाना के मन में अचानक डर पैदा हुआ। उन्हें अपनी बेटी के साथ हुए पुराने अत्याचार याद आने लगे। उन्हें वह समय याद था जब गर्भावस्था के दौरान उनकी बेटी को धमकियां और मारपीट झेलनी पड़ी थी। उन्हें यह भी याद था कि बेटी को जिंदा दफन करने की धमकी दी गई थी।

नाना का शक गहराता गया और वह बच्ची के पिता के पीछे दौड़ पड़े।

मिट्टी हटाई तो नीचे से मिली सांसें

नाना ने रास्ते में काफी तलाश की, लेकिन बच्ची और उसके पिता कहीं नजर नहीं आए। आखिरकार वह उसी नदी के पास पहुंचे जहां उनकी बेटी का अंतिम संस्कार हुआ था।

वहां उन्हें मिट्टी में एक उथला गड्ढा दिखाई दिया।

नाना ने बिना देर किए हाथों से मिट्टी हटानी शुरू कर दी। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, उनके सामने एक ऐसा दृश्य आया जिसे देखकर शायद किसी के भी होश उड़ जाएं। मिट्टी के नीचे कपड़े में लिपटी वही नवजात बच्ची मौजूद थी।

लेकिन बच्ची मरी नहीं थी।

नाना ने उसका चेहरा साफ किया और नाक के पास उंगली रखकर सांस जांची। बच्ची सांस ले रही थी। मौत के लिए मिट्टी में छोड़ी गई उस नन्ही जिंदगी ने हार नहीं मानी थी।

नाना उसे तुरंत अपने साथ घर ले आए।

बकरी के बाड़े में बीता बचपन

परिवार के पास न अस्पताल था और न ही इलाज के पर्याप्त साधन। बच्ची को एक फटी हुई साड़ी में लपेटकर बकरी के बाड़े में रखा गया। जानवरों के शरीर से मिलने वाली गर्मी ने उसे ठंड से बचाने में मदद की।

उसे सूती बत्ती के जरिए बकरी का दूध पिलाया जाता था।

इसी बीच नानी चंद्रभागा ने सुनीता के जन्म से लगभग 15 दिन पहले एक और बच्ची को जन्म दिया था। नाना ने उनसे सुनीता को भी अपनी बच्ची की तरह दूध पिलाने का आग्रह किया। इसके बाद दोनों बच्चियां साथ-साथ बड़ी होने लगीं।

नाना ने सुनीता को सिर्फ मिट्टी से नहीं निकाला था, बल्कि अब उनके सामने उसे जिंदगी देने की चुनौती थी। उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की।

गरीबी और छुआछूत के बीच मिली शिक्षा

बाद में परिवार तुपाड़ी चला गया। सुनीता के नाना मोची और चमड़े का काम करते थे। जो भी काम मिलता, वह कर लेते थे। परिवार ने कुछ समय मवेशियों के बाड़े में भी गुजारा।

सुनीता दलित परिवार से थीं। उस समय समाज में छुआछूत का असर बेहद गहरा था। रहने की जगह से लेकर लोगों के व्यवहार और भोजन तक उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

इसके बावजूद नाना की एक जिद थी—सुनीता पढ़ेंगी।

उन्होंने सुनीता और उनकी बहन कावेरा को स्कूल भेजा। नाना ने सुनीता को अपना नाम दिया। उनका नाम शिवकांता कुंडलिकराव माने रखा गया। उन्होंने अपने पिता का नाम या उपनाम इस्तेमाल नहीं किया।

पढ़ाई के लिए उसी घर में रहना पड़ा जहां जान का खतरा था

सुनीता की आगे की पढ़ाई आसान नहीं थी। उन्हें कोटल शिवानी जाना पड़ा। यह वही गांव था जहां उनके पिता रहते थे और उनकी मां ने शादी के बाद अपना जीवन बिताया था।

पढ़ाई जारी रखने के लिए सुनीता को मजबूरी में उसी व्यक्ति के घर रहना पड़ा, जिसने कभी उनकी जान लेने की कोशिश की थी।

वहां उन्हें परिवार का अपनापन नहीं मिला। सौतेली मां कथित तौर पर उन्हें नौकर की तरह रखती थीं। उनकी किताबों से भी उन्हें परेशानी थी और एक बार किताबें जलाने की कोशिश तक की गई।

एक बार सुनीता को ऐसी भाकरी दी गई जिसका स्वाद उन्हें अजीब लगा। उन्हें शक हुआ कि उसमें कुछ मिलाया गया है। वह डरकर उसे लेकर नाना के पास भागीं। इसके बावजूद पढ़ाई छोड़ना उनके लिए विकल्प नहीं था।

उन्हें अपनी मां की जिंदगी का दर्द भी धीरे-धीरे समझ आने लगा—गरीबी, भूख, अत्यधिक काम और घरेलू हिंसा।

नर्स बनीं और जिंदगी ने बदली करवट

एक साल बाद सुनीता उस घर से निकल गईं। नाना ने उनके और कावेरा के लिए पढ़ाई की जगह किराए पर ली।

मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों बहनों को पता चला कि लातूर के विवेकानंद अस्पताल में प्रशिक्षु नर्सों की जरूरत है। दोनों पैदल चलकर शहर पहुंचीं।

पहले दिन ट्रेन देखने के चक्कर में उनका साक्षात्कार छूट गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अगले दिन दोबारा अस्पताल पहुंचीं और आखिरकार उन्हें प्रशिक्षण के लिए स्वीकार कर लिया गया।

अस्पताल में पहली बार सुनीता को उनकी जाति से ज्यादा उनके काम से पहचाना गया। उन्होंने मेहनत की और अपने पैरों पर खड़ी होना शुरू किया।

इसी दौरान उनकी मुलाकात प्रयोगशाला तकनीशियन दिलीप अरलीकर से हुई। दोनों करीब आए और परिवार के विरोध के बावजूद साथ रहने का फैसला किया। बाद में उन्होंने आर्य समाज की रीति से विवाह कर लिया।

मां बनने का दर्द और बच्चों को पढ़ाने का सपना

सुनीता का पहला बच्चा जन्म के कुछ घंटे बाद ही दुनिया से चला गया। यह उनके लिए एक और बड़ा सदमा था। इसके बाद योगेश का जन्म हुआ और तीन साल बाद जमीर उनके जीवन में आया।

कम साधनों के बावजूद सुनीता और दिलीप ने अपने बच्चों की परवरिश की। नाना का मानना था कि शिक्षा ही इंसान की जिंदगी बदल सकती है। इसी सोच को सुनीता ने अपने बच्चों तक पहुंचाया।

समय के साथ योगेश इंजीनियर बने और जमीर बाल मूत्र रोग विशेषज्ञ बने।

अस्पताल से सामाजिक आंदोलन तक पहुंची सुनीता

अस्पताल में काम करने के दौरान सुनीता सामाजिक आंदोलनों से जुड़ने लगीं। 1972 के सूखे के दौरान उन्होंने और दिलीप ने राहत कार्यों में हिस्सा लिया। उन्होंने लोगों की परेशानियों को करीब से देखा और महसूस किया कि सिर्फ अस्पताल में मरीजों का इलाज करना काफी नहीं है।

उसी वर्ष एक जुलूस पर पुलिस की गोलीबारी में दो लोगों की मौत हो गई। घायलों को अस्पताल पहुंचते देख सुनीता के भीतर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला मजबूत हुआ।

धीरे-धीरे उनका घर युवा क्रांति दल के लातूर कार्यालय की तरह इस्तेमाल होने लगा। राशन व्यवस्था, कॉलेज फीस, भ्रष्टाचार और पुलिस हिंसा जैसे मुद्दों पर उन्होंने अभियान चलाए।

आखिरकार उन्होंने नर्सिंग का काम छोड़कर पूरी तरह सामाजिक कार्य को अपना लिया।

राजनीति में कदम रखा और जेल भी गईं

1974 में सुनीता लातूर नगर परिषद की उस सीट से चुनी गईं, जो दलित उम्मीदवार के लिए आरक्षित थी। लेकिन उनका संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ।

आपातकाल के दौरान सुनीता और उनके पति दिलीप को उनके छोटे बच्चों के साथ करीब 11 महीने जेल में रहना पड़ा। इसी दौरान उनके नाना का निधन हो गया।

जेल से बाहर आने के बाद परिवार आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा था। फिर भी सुनीता ने महिलाओं, दलित समुदाय और मजदूरों के अधिकारों के लिए काम जारी रखा।

उन्होंने अंतरजातीय विवाह करने वाले कई जोड़ों की भी मदद की। शायद इसका कारण यह था कि वह खुद जानती थीं कि समाज और परिवार के विरोध के बीच अपनी जिंदगी का फैसला लेना कितना कठिन होता है।

अपनी कहानी लिखी और दूसरों की आवाज बन गईं

जेल के दौरान लिखे गए उनके नोट्स आगे चलकर उनकी मराठी आत्मकथा 'हिरकणीचं बिरहाद' का आधार बने। यह किताब 2010 में प्रकाशित हुई।

इसके बाद सुनीता की मुलाकात उन महिलाओं से भी हुई जो महिला शिशु हत्या या बेटियों के खिलाफ भेदभाव की घटनाओं से प्रभावित रही थीं। अपनी कहानी के जरिए उन्होंने समाज के सामने यह सवाल रखा कि आखिर किसी बच्ची का जन्म उसके लिए अपराध क्यों माना जाए?

सुनीता का कहना है कि उनकी जिंदगी की सबसे भयावह घटना का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं बना। न पुलिस में शिकायत दर्ज हुई और न ही कहीं यह दर्ज हुआ कि एक नवजात बच्ची को जिंदा दफनाया गया था और वह बच गई।

उनका मानना है कि अगर उनके नाना कुछ मिनट और देर कर देते तो शायद वह कहानी कभी सामने ही नहीं आती।

मिट्टी में दबाई गई बच्ची से लेकर आंदोलन की आवाज तक

सुनीता अरलीकर की जिंदगी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ एक जवाब भी है, जो बेटियों के जन्म को बोझ समझती है।

जिस बच्ची को कभी मिट्टी के नीचे मरने के लिए छोड़ दिया गया था, वही आगे चलकर शिक्षा हासिल करती है, अपने पैरों पर खड़ी होती है, सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बनती है और महिला शिशु हत्या के खिलाफ आवाज उठाती है।

उनकी कहानी बताती है कि किसी बेटी की जिंदगी की कीमत तय करने का अधिकार किसी परिवार, समाज या व्यक्ति को नहीं है। एक समय जिस नवजात की सांसें मिट्टी के नीचे दबाने की कोशिश की गई थी, वही सांसें आगे चलकर उन अनगिनत बेटियों की आवाज बन गईं, जिन्हें जन्म लेने और सम्मान के साथ जीने का अधिकार चाहिए।

सुनीता की जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—जिसे समाज ने खत्म समझ लिया था, उसने उसी समाज के सामने जीने की सबसे बड़ी मिसाल कायम कर दी।

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