क्या अमेरिका के सामने झुक गया भारत? 500 अरब डॉलर के सौदे ने मचा दी हलचल!
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इस समझौते के तहत भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके बदले अमेरिका भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित ऊंचे आयात शुल्क (टैरिफ) में बड़ी राहत देने पर विचार कर रहा है।
हालांकि इस प्रस्तावित समझौते ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। क्या भारत पर अमेरिकी दबाव है? क्या इससे भारतीय उद्योगों पर असर पड़ेगा? क्या आत्मनिर्भर भारत अभियान प्रभावित होगा? या फिर यह भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का हिस्सा है? आइए विस्तार से समझते हैं
क्या है पूरा मामला?
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। दोनों देशों का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना है।
इसी कड़ी में चर्चा है कि भारत अगले पांच वर्षों के दौरान अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों का आयात बढ़ाने की दिशा में काम कर सकता है।
बदले में अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर प्रस्तावित ऊंचे टैरिफ में राहत देने पर विचार कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार यदि समझौता सफल होता है तो कई भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
भारत ऐसा क्यों करना चाहता है?
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार इस प्रस्ताव का अर्थ यह नहीं है कि भारत अपने कुल आयात में 500 अरब डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि करेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत पहले से जिन वस्तुओं का आयात अन्य देशों से करता है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा भविष्य में अमेरिका से खरीदा जा सकता है।
यानी आयात का स्रोत बदल सकता है, लेकिन कुल आयात में उसी अनुपात में वृद्धि होना आवश्यक नहीं है।
सरकार का मानना है कि तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था इस प्रकार के व्यापार संतुलन को संभालने में सक्षम है।
सबसे ज्यादा फायदा किस क्षेत्र को मिलेगा?
1. विमानन उद्योग
इस प्रस्तावित व्यापार समझौते का सबसे बड़ा लाभ विमानन क्षेत्र को मिल सकता है।
भारत में हवाई यात्रा तेजी से बढ़ रही है। नई एयरलाइंस बाजार में आ रही हैं और मौजूदा कंपनियां भी सैकड़ों नए विमानों का ऑर्डर दे रही हैं।
ऐसे में अमेरिका से—
यात्री विमान
विमान इंजन
स्पेयर पार्ट्स
एविएशन उपकरण
की खरीद बड़े पैमाने पर हो सकती है।
अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में केवल विमानन क्षेत्र में ही 100 अरब डॉलर से अधिक का कारोबार हो सकता है।
ऊर्जा आयात में भी बढ़ेगी साझेदारी
भारत अमेरिका से कच्चा तेल, एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस), एलपीजी तथा अन्य ऊर्जा उत्पादों का आयात भी बढ़ाने की योजना बना सकता है।
इसका उद्देश्य भारत के ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ता है तो रूस सहित अन्य देशों से तेल खरीद का अनुपात धीरे-धीरे बदल सकता है। हालांकि यह पूरी तरह वैश्विक बाजार की कीमतों और उपलब्धता पर निर्भर करेगा।
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी रहेगा जोर
भारत आने वाले वर्षों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर तेजी से काम कर रहा है।
इसी वजह से अमेरिका से निम्न क्षेत्रों में आयात बढ़ने की संभावना है—
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक
सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण
एडवांस कंप्यूटिंग सिस्टम
संचार तकनीक
हाई-टेक औद्योगिक मशीनरी
इनका उद्देश्य भारत के विनिर्माण क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।
इस्पात उद्योग को भी मिलेगा लाभ
ऊर्जा और तकनीक के अलावा भारत इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक कच्चे माल जैसे कुकिंग कोल (Coking Coal) का आयात भी अमेरिका से बढ़ा सकता है।
इससे स्टील उत्पादन में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण संसाधनों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।
अमेरिका को क्या फायदा होगा?
यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो अमेरिका को दुनिया के सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में से एक तक अधिक पहुंच मिलेगी।
विशेष रूप से—
विमान निर्माता कंपनियां
ऊर्जा कंपनियां
तकनीकी कंपनियां
कृषि मशीनरी निर्माता
औद्योगिक उपकरण निर्माता
को बड़ा व्यापारिक लाभ मिल सकता है।
भारत को क्या मिलेगा?
भारत की सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि अमेरिका भारतीय निर्यात पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित ऊंचे टैरिफ में राहत देगा।
यदि ऐसा होता है तो भारतीय कंपनियों को अमेरिका में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिल सकता है।
इससे निर्यात बढ़ने और विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी मदद मिल सकती है।
लेकिन क्यों हो रही है आलोचना?
इस प्रस्ताव को लेकर कई अर्थशास्त्रियों और उद्योग विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई है।
उनका कहना है कि यदि आयात बहुत तेजी से बढ़ता है तो—
व्यापार घाटा बढ़ सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आ सकता है।
चालू खाते का घाटा प्रभावित हो सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बड़े पैमाने पर अमेरिकी उत्पाद खरीदने से भारतीय कंपनियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बन सकता है।
क्या आत्मनिर्भर भारत पर पड़ेगा असर?
सबसे बड़ा सवाल यही उठाया जा रहा है कि क्या इतना बड़ा आयात आत्मनिर्भर भारत अभियान के विपरीत होगा?
सरकार का कहना है कि ऐसा नहीं है।
सरकार के अनुसार जिन वस्तुओं की खरीद अमेरिका से प्रस्तावित है, उनमें से अधिकांश का आयात भारत पहले से अन्य देशों से करता है।
यानी घरेलू उत्पादन को प्रतिस्थापित करने के बजाय आयात के स्रोत में बदलाव हो सकता है।
किन क्षेत्रों में भारत ने नहीं मानी अमेरिका की मांग?
भारत ने बातचीत के दौरान कुछ संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा है।
सरकार ने बताया कि—
डेयरी उत्पाद
दूध
पनीर
पोल्ट्री
मांस
जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों के लिए अतिरिक्त बाजार पहुंच देने से इनकार किया गया है।
इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय किसानों और पशुपालकों के हितों की रक्षा करना है।
जीएम फसलों पर भी कायम है रुख
भारत ने आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) खाद्य फसलों के आयात पर अपनी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया है।
हालांकि कुछ कृषि आधारित औद्योगिक उत्पादों को सीमित अनुमति मिलने की संभावना बताई जा रही है।
क्या यह समझौता भारत के लिए फायदेमंद होगा?
विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
कुछ का मानना है कि यदि भारत बेहतर शर्तों पर अमेरिकी बाजार तक पहुंच हासिल कर लेता है तो यह भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
वहीं दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि आयात बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
आगे क्या होगा?
फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है।
व्यापार समझौते की अंतिम शर्तों पर सहमति बनने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि—
भारत वास्तव में कितने स्तर तक अमेरिकी आयात बढ़ाएगा।
अमेरिका भारतीय निर्यात पर कितनी टैरिफ राहत देगा।
किन क्षेत्रों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी को नई दिशा दे सकता है। भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से बड़ी मात्रा में विमान, ऊर्जा, तकनीक और औद्योगिक उत्पाद खरीदने की संभावना पर विचार कर रहा है, जबकि बदले में भारतीय निर्यात पर टैरिफ राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर आत्मनिर्भर भारत, व्यापार घाटे और घरेलू उद्योगों पर संभावित प्रभाव जैसे कई सवाल भी उठ रहे हैं। अंतिम समझौते के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह सौदा भारत के लिए कितना लाभकारी साबित होता है।

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