4 किडनियां, 8 अजनबी और एक ऐसा ऑपरेशन… अगर बीच में कोई एक भी पीछे हटता तो टूट जाती 4 जिंदगियां बचाने वाली पूरी चेन!
किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए सही डोनर मिलना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार परिवार में ऐसा व्यक्ति मौजूद होता है जो किडनी दान करने के लिए तैयार रहता है, लेकिन मेडिकल जांच के दौरान पता चलता है कि उसका ब्लड ग्रुप या इम्यूनोलॉजिकल प्रोफाइल मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे मामलों में परिवार के सामने उम्मीद टूटने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन अगर ऐसे ही कई परिवार एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आएं और हर डोनर किसी दूसरे मरीज को किडनी दे, तो कई जिंदगियां एक साथ बचाई जा सकती हैं।
दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में जुलाई 2026 में ऐसा ही एक बेहद जटिल चार-तरफा किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट हुआ। इसमें चार मरीज और उनके चार इच्छुक डोनर शामिल थे। खास बात यह थी कि किसी भी डोनर की किडनी उसके अपने मरीज के साथ सीधे मैच नहीं हो रही थी, लेकिन क्रॉस-मैच और अन्य जांचों के बाद यह सामने आया कि इन चारों परिवारों के बीच किडनी की अदला-बदली की जाए तो सभी चार मरीजों का ट्रांसप्लांट संभव हो सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में मेडिकल चुनौती के साथ कानूनी अड़चन भी सामने आई। चार परिवारों की उम्मीद दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंची और 26 मई 2026 को जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने उस कानूनी व्याख्या को खारिज किया, जिसके आधार पर चार-तरफा स्वैप को अनुमति नहीं दी जा रही थी। कोर्ट ने कहा कि कानून में ‘पहला दाता’ और ‘दूसरा दाता’ जैसी भाषा प्रक्रिया को समझाने के लिए है और इसे केवल दो जोड़ों तक सीमित मानना उचित नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाकी कानूनी शर्तों और किसी भी व्यावसायिक लेन-देन पर रोक जैसी आवश्यकताओं का पालन करना होगा।
जब अपने मरीज को किडनी नहीं दे पाए डोनर
इस कहानी की शुरुआत चार अलग-अलग मरीजों और उनके परिवारों से हुई। प्रत्येक मरीज के साथ ऐसा डोनर था जो अपने प्रियजन को किडनी देने के लिए तैयार था। लेकिन ट्रांसप्लांट से पहले होने वाली मेडिकल जांच में जैविक असंगतता सामने आई।
किडनी ट्रांसप्लांट में केवल यह जरूरी नहीं होता कि कोई व्यक्ति किडनी देने के लिए तैयार है। डोनर और मरीज के बीच ब्लड ग्रुप, एंटीबॉडी और अन्य इम्यूनोलॉजिकल कारकों की जांच की जाती है। अगर क्रॉस-मैच पॉजिटिव आता है और अस्वीकृति का जोखिम अधिक होता है, तो सीधे ट्रांसप्लांट की योजना मुश्किल हो सकती है।
यहीं से डॉक्टरों के सामने एक अलग संभावना आई—अगर चारों डोनर अपने-अपने मरीज को किडनी देने के बजाय किसी दूसरे मरीज को किडनी दें, तो क्या चारों मरीजों के लिए मैच तैयार हो सकता है?
एक विचार ने बदल दी चार परिवारों की कहानी
अस्पताल की टीम ने चारों डोनर और चारों मरीजों के बीच संभावित मैच की जांच करने का रास्ता अपनाया। इसके बाद जो परिणाम सामने आया, उसने पूरी कहानी बदल दी।
चारों डोनर अपने मूल मरीजों के साथ सीधे ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त नहीं थे, लेकिन अगर किडनी की अदला-बदली की जाए तो प्रत्येक मरीज के लिए दूसरे परिवार का डोनर उपयुक्त पाया जा सकता था।
इसे Kidney Paired Exchange या Kidney Swap Transplantation कहा जाता है। इसका मूल विचार बेहद सरल है—एक व्यक्ति अपने प्रियजन को सीधे किडनी नहीं दे सकता, लेकिन वह किसी दूसरे मरीज को किडनी देता है; बदले में दूसरे परिवार का डोनर उसके प्रियजन को किडनी देता है।
इस मामले में यह प्रक्रिया दो परिवारों तक सीमित नहीं रही। चार डोनर-रिसीवर जोड़ों को जोड़कर चार-तरफा चेन तैयार की गई।
लेकिन मेडिकल सफलता से पहले आया कानून
जब डॉक्टरों और परिवारों को मेडिकल स्तर पर रास्ता दिखाई दिया तो एक नई चुनौती सामने आ गई। तत्कालीन प्रशासनिक व्याख्या के अनुसार, Transplantation of Human Organs and Tissues Act, 1994 की धारा 9(3A) के तहत स्वैप ट्रांसप्लांट को दो जैविक रूप से असंगत डोनर-रिसीवर जोड़ों के बीच समझा जा रहा था।
यानी एक जोड़े का डोनर दूसरे जोड़े के मरीज को किडनी दे और दूसरे जोड़े का डोनर पहले मरीज को—ऐसे दो-तरफा स्वैप की व्यवस्था स्पष्ट थी। चार जोड़ों को एक ही चेन में जोड़ने की अनुमति को लेकर कानूनी व्याख्या में समस्या थी।
अथॉराइजेशन कमेटी और अपीलेट अथॉरिटी ने इसी आधार पर प्रस्तावित चार-तरफा ट्रांसप्लांट को अनुमति देने से इनकार किया था। इसके बाद आठ लोगों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।
26 मई को हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने कानून की भाषा और उसके उद्देश्य पर विचार किया। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने 26 मई 2026 के फैसले में कहा कि कानून में ‘पहला दाता’ और ‘दूसरा दाता’ शब्दों को केवल उदाहरण के रूप में समझा जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, इन शब्दों का इस्तेमाल इस प्रक्रिया को केवल दो जोड़ों तक सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने संबंधित आदेशों को रद्द करते हुए अथॉराइजेशन कमेटी को चार-तरफा स्वैप की व्यवहार्यता पर कानून की सही व्याख्या के अनुसार फिर से विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि ट्रांसप्लांट तभी हो सकता है जब कानून की अन्य सभी शर्तें पूरी हों और किसी प्रकार का व्यावसायिक लेन-देन न हो।
इस फैसले ने चार परिवारों के लिए बंद दरवाजे को फिर खोल दिया।
फिर आया 13 जुलाई का ऐतिहासिक दिन
कोर्ट की अनुमति के बाद अस्पताल की टीम ने पूरी प्रक्रिया को बेहद सावधानी से आगे बढ़ाया। 13 जुलाई 2026 को मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, साकेत में आठ लोग ट्रांसप्लांट प्रक्रिया के लिए शामिल हुए—चार डोनर और चार मरीज।
यह कोई सामान्य ट्रांसप्लांट नहीं था। यहां एक ऑपरेशन सफल होने के बाद ही अगला कदम आगे बढ़ना था और पूरी चेन को इस तरह व्यवस्थित करना था कि कोई कड़ी टूटे नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार, सुबह करीब 7 बजे सर्जरी की प्रक्रिया शुरू हुई और अस्पताल में पांच ऑपरेशन थिएटर एक साथ इस्तेमाल किए गए। टीम ने चार डोनर नेफ्रेक्टॉमी और चार किडनी ट्रांसप्लांट को एक ही दिन में पूरा किया। करीब शाम 6 बजे तक यह जटिल प्रक्रिया पूरी हो गई।
एक ऑपरेशन के साथ दूसरे की तैयारी
इस तरह के स्वैप ट्रांसप्लांट में सबसे बड़ी चुनौती समन्वय की होती है। एक डोनर से किडनी निकाली जाती है और उसे उचित प्रक्रिया के तहत दूसरे मरीज तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद उस मरीज में ट्रांसप्लांट किया जाता है।
यहां चार अलग-अलग डोनर और चार अलग-अलग मरीज थे। इसलिए मेडिकल टीम को समय, सर्जरी, अंग की सुरक्षा और मरीजों की स्थिति का लगातार ध्यान रखना था।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रांसप्लांट टीम ने पांच ऑपरेशन थिएटरों में समानांतर तरीके से काम किया। डोनर से किडनी निकाले जाने के बाद उसे तुरंत संबंधित रिसीवर तक पहुंचाया जाता था, ताकि पूरी प्रक्रिया निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ती रहे।
एक छोटी चूक से टूट सकती थी पूरी चेन
चार-तरफा किडनी स्वैप में जोखिम केवल एक मरीज तक सीमित नहीं रहता। चारों ऑपरेशन आपस में जुड़े होते हैं। इसलिए पूरी प्रक्रिया के दौरान टीम को कई स्तरों पर सावधानी बरतनी पड़ती है।
अगर किसी डोनर की मेडिकल स्थिति अचानक खराब हो जाती, किसी मरीज की स्थिति ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त नहीं रहती या किसी चरण में प्रक्रिया रोकनी पड़ती, तो पूरी चेन प्रभावित हो सकती थी।
यही कारण है कि ऐसे ट्रांसप्लांट में डोनर और मरीज की विस्तृत जांच, क्रॉस-मैचिंग, HLA मैचिंग और इम्यूनोलॉजिकल मूल्यांकन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। मैक्स की टीम ने भी इस प्रक्रिया में विस्तृत इम्यूनोलॉजिकल टेस्टिंग और मैचिंग का इस्तेमाल किया।
चार डोनर, चार मरीज और चार नई उम्मीदें
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा इसका परिणाम रहा। रिपोर्ट के अनुसार, चारों डोनर स्वस्थ रहे और चारों मरीजों को उपयुक्त किडनी मिल सकी। अस्पताल के अनुसार सभी मरीजों की रिकवरी अच्छी रही और उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई।
यानी चार परिवारों के डोनर अपनी किडनी अपने प्रियजन को सीधे नहीं दे सके, लेकिन उन्होंने किसी दूसरे परिवार के मरीज को किडनी देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपने प्रियजन के लिए उपयुक्त किडनी हासिल करने की राह बनाई।
यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें कोई व्यक्ति किसी अनजान इंसान के लिए अंगदान करता है, लेकिन उसी व्यवस्था के जरिए उसके अपने प्रियजन की जान बचाने की संभावना बनती है।
यह सिर्फ मेडिकल तकनीक नहीं, भरोसे की कहानी भी
किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट का सबसे बड़ा आधार केवल मेडिकल विज्ञान नहीं बल्कि आपसी भरोसा भी है। चार अलग-अलग परिवारों के लोगों को एक ऐसी प्रक्रिया में शामिल होना पड़ा जिसमें उनका डोनर किसी दूसरे परिवार के मरीज को किडनी देता है।
इसका मतलब है कि हर परिवार को दूसरे परिवार पर भरोसा करना पड़ता है और अस्पताल की पूरी व्यवस्था पर विश्वास रखना पड़ता है।
यही वजह है कि इस मामले को चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ मानवीय सहयोग का भी उदाहरण माना जा रहा है। रिपोर्ट में शामिल परिवार अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों से आए थे, लेकिन चारों का उद्देश्य एक ही था—अपने प्रियजन को जीवन का दूसरा मौका दिलाना।
आगे और मरीजों के लिए खुल सकता है रास्ता
इस तरह के मामलों से भारत में paired kidney exchange programmes की संभावनाओं पर भी ध्यान जाता है। ऐसे मरीज जिनके पास जीवित डोनर मौजूद है लेकिन जैविक असंगति के कारण सीधा ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता, उनके लिए स्वैप व्यवस्था एक विकल्प बन सकती है।
हालांकि, यह कोई ऐसा रास्ता नहीं है जिसे हर मरीज के लिए स्वतः लागू किया जा सके। डोनर और रिसीवर की मेडिकल स्थिति, ब्लड ग्रुप, इम्यूनोलॉजिकल जांच, कानूनी पात्रता और संबंधित अथॉरिटी की अनुमति जैसी कई शर्तें पूरी करनी होती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में भी यह स्पष्ट किया गया कि चार-तरफा स्वैप को अनुमति का मतलब कानून की बाकी शर्तों को नजरअंदाज करना नहीं है। विशेष रूप से किसी व्यावसायिक लेन-देन की अनुमति नहीं है।
चार किडनियों ने लिखी आठ जिंदगियों की नई कहानी
दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में हुआ यह चार-तरफा किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट इसलिए खास है क्योंकि इसमें मेडिकल विज्ञान, कानूनी प्रक्रिया, तकनीकी विशेषज्ञता और मानवीय भरोसा—चारों एक साथ दिखाई दिए।
चार डोनर अपने-अपने प्रियजन को सीधे किडनी नहीं दे पा रहे थे। क्रॉस-मैच में आई असंगति ने उम्मीद लगभग खत्म कर दी थी। लेकिन डॉक्टरों ने एक अलग संभावना तलाश की और चारों परिवारों के बीच संभावित मैच की जांच की। जब चार-तरफा स्वैप की संभावना सामने आई तो मामला कानूनी बाधा तक पहुंचा। दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 मई 2026 को कानून की अधिक व्यापक व्याख्या करते हुए इस प्रक्रिया पर फिर विचार का रास्ता खोला।
इसके बाद 13 जुलाई को आठ लोगों से जुड़ी आठ सर्जिकल प्रक्रियाएं एक ही दिन में पूरी की गईं और चार मरीजों को उपयुक्त किडनी मिल सकी।
यह कहानी बताती है कि कभी-कभी किसी एक परिवार की उम्मीद दूसरे परिवार के त्याग से जुड़ जाती है। एक डोनर किसी अजनबी की जिंदगी बचाता है और बदले में किसी दूसरे अजनबी की किडनी उसके अपने प्रियजन को नई जिंदगी दे देती है। यही चार-तरफा किडनी स्वैप की सबसे बड़ी ताकत है—अजनबी होते हुए भी चार परिवार एक-दूसरे की जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गए।

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