व्हाइट हाउस में मचा हड़कंप! आखिर किस डर ने ट्रंप को पीछे हटने पर किया मजबूर?
वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच अब एक नई रणनीतिक चिंता सामने आई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मध्य पूर्व में लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने के लिए अमेरिका ने बड़ी संख्या में एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। इसके चलते पेंटागन के कुछ महत्वपूर्ण हथियार भंडार पर दबाव बढ़ गया है और इसी कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान को आगे बढ़ाने के बजाय हालात का आकलन करने और कूटनीतिक विकल्पों पर जोर देने का फैसला किया है।
रिपोर्टों के अनुसार, व्हाइट हाउस और पेंटागन के बीच हाल के दिनों में कई उच्चस्तरीय बैठकें हुईं, जिनमें विशेष रूप से Patriot और अन्य एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों के घटते भंडार पर चर्चा की गई। अधिकारियों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो यह केवल मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों में अमेरिका की सैन्य तैयारी को भी प्रभावित कर सकता है।
लगातार हमलों ने बढ़ाया दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दिनों सैन्य गतिविधियां लगातार तेज रही हैं। अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जबकि जवाब में ईरान की ओर से अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगी देशों की दिशा में मिसाइल तथा ड्रोन हमले किए गए। इस दौरान अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम को बड़ी संख्या में इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ीं ताकि आने वाले खतरों को हवा में ही नष्ट किया जा सके।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक एयर डिफेंस युद्ध में हमले से अधिक चुनौती इंटरसेप्टर मिसाइलों की उपलब्धता बनाए रखना होती है। यदि विरोधी लगातार बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन दागता रहे तो अत्याधुनिक इंटरसेप्टर तेजी से खर्च होते हैं और उनकी भरपाई तुरंत संभव नहीं होती।
व्हाइट हाउस में बढ़ी चिंता
अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में हुई बैठकों में अधिकारियों ने राष्ट्रपति ट्रंप को बताया कि मौजूदा गति से इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल जारी रहा तो अमेरिकी सैन्य तैयारियों पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रशासन अब हर सैन्य विकल्प का सावधानी से मूल्यांकन कर रहा है।
बताया जा रहा है कि प्रशासन की चिंता केवल ईरान तक सीमित नहीं है। अमेरिका को दुनिया के अन्य रणनीतिक क्षेत्रों, विशेषकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखनी है। इसलिए किसी एक मोर्चे पर अत्यधिक हथियार खर्च होने को लेकर गंभीर चर्चा हो रही है।
जॉर्डन हमले के बाद बढ़ी सतर्कता
रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए एक हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद सुरक्षा समीक्षा और तेज कर दी गई। इस घटना ने यह चिंता बढ़ा दी कि यदि ईरान या उससे जुड़े समूह लगातार हमले जारी रखते हैं तो अमेरिका को अपनी रक्षा रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
इसी घटनाक्रम के बाद व्हाइट हाउस ने सैन्य और खुफिया एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी, जिसमें संभावित दीर्घकालिक युद्ध की लागत और संसाधनों का आकलन शामिल था।
ट्रंप ने क्यों बदली रणनीति?
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप फिलहाल संघर्ष को और अधिक व्यापक बनाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि यदि पूर्ण युद्ध शुरू होता है तो इंटरसेप्टर मिसाइलों सहित कई महत्वपूर्ण रक्षा संसाधनों का तेजी से उपयोग होगा, जिससे अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिकी सैनिकों, सैन्य अड्डों या सहयोगी देशों पर बड़े हमले होते हैं, तो अमेरिका आवश्यक सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
सैन्य अधिकारियों की चेतावनी
रिपोर्टों के अनुसार, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने व्हाइट हाउस को बताया कि ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन मौजूद हैं। ऐसे में यदि युद्ध लंबे समय तक चलता है तो अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, उत्पादन क्षमता और दीर्घकालिक संसाधनों पर भी निर्भर करता है।
कूटनीति को प्राथमिकता
व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि वर्तमान समय में प्रशासन कूटनीतिक समाधान तलाशने के प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है। उनका कहना है कि सैन्य कार्रवाई हमेशा अंतिम विकल्प होती है और यदि बातचीत के जरिए तनाव कम किया जा सकता है तो उसी दिशा में आगे बढ़ना बेहतर होगा।
हालांकि प्रशासन ने यह भी दोहराया कि यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य या अमेरिकी सहयोगियों के खिलाफ आक्रामक गतिविधियां जारी रखीं तो सभी विकल्प खुले रहेंगे।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलें अत्यधिक महंगी और तकनीकी रूप से जटिल होती हैं। इन्हें बड़ी संख्या में तैयार करने में समय लगता है। इसलिए किसी भी लंबे संघर्ष में केवल सैन्य क्षमता ही नहीं बल्कि उत्पादन और आपूर्ति भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
उनके अनुसार, यदि मिसाइलों का उपयोग लगातार बढ़ता रहा तो अमेरिका को अपने रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता और तेज करनी पड़ सकती है।
वैश्विक असर भी संभव
मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिका के कई सहयोगी देश भी तनाव कम करने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल संकेत यही हैं कि अमेरिका स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और किसी भी बड़े सैन्य निर्णय से पहले सुरक्षा, संसाधनों और कूटनीतिक विकल्पों का विस्तृत आकलन कर रहा है। दूसरी ओर ईरान के साथ तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां जारी हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह तय होगा कि दोनों पक्ष बातचीत का रास्ता चुनते हैं या फिर हालात दोबारा बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ते हैं। फिलहाल व्हाइट हाउस का फोकस युद्ध के विस्तार के बजाय जोखिमों को सीमित रखने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने पर दिखाई दे रहा है।

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