96 साल पुराने कानून से ट्रंप के हाथ लगी 'सुपर पावर'! अब किसी भी देश पर गिर सकता है 50% टैरिफ बम
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी व्यापारिक नीतियों को लेकर वैश्विक सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा का केंद्र 1930 के टैरिफ एक्ट (Tariff Act of 1930) की धारा 338 (Section 338) है, जिसे लगभग 96 वर्षों बाद फिर से प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने की तैयारी की जा रही है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह प्रावधान उन देशों के खिलाफ कार्रवाई के लिए है, जो अमेरिकी उत्पादों और व्यापार के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं।
इसी कानून का हवाला देते हुए ट्रंप प्रशासन ने कनाडा से आयात होने वाले कुछ उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है। प्रस्तावित शुल्क लगभग 30 दिनों बाद लागू हो सकता है। इस फैसले ने न केवल अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि चीन, यूरोपीय देशों और अन्य व्यापारिक साझेदारों में भी नई चिंता पैदा कर दी है।
क्या है धारा 338?
धारा 338, Tariff Act of 1930 का एक विशेष प्रावधान है। इसे उस दौर में बनाया गया था, जब दुनिया महामंदी (Great Depression) के प्रभाव से जूझ रही थी और अमेरिका अपने उद्योगों एवं व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए कड़े कानून बना रहा था।
इस धारा के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि कोई देश अमेरिकी उत्पादों के साथ भेदभाव करता है, अनुचित शुल्क लगाता है या अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियां अपनाता है, तो उसके खिलाफ अधिकतम 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रावधान लंबे समय तक कानून की किताबों तक सीमित रहा और आधुनिक व्यापार नीति में इसका उपयोग लगभग नहीं के बराबर हुआ। अब ट्रंप प्रशासन इसे फिर से सक्रिय हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है।
कनाडा क्यों बना पहला निशाना?
व्हाइट हाउस के अनुसार कनाडा लगातार ऐसी व्यापारिक नीतियां अपना रहा है, जिनसे अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हो रहा है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि द्विपक्षीय समझौतों के बावजूद कनाडा ने कई क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंच कठिन बनाई है।
बताया जा रहा है कि नए टैरिफ के दायरे में निम्नलिखित उत्पाद शामिल हो सकते हैं—
वाइन
फर्नीचर
कपड़े
सीमेंट
अन्य औद्योगिक उत्पाद
हालांकि कुछ आवश्यक वस्तुओं, जैसे पोटाश, मछली और महत्वपूर्ण खनिजों को प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क से बाहर रखा गया है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम कनाडा की कथित भेदभावपूर्ण नीतियों का जवाब है, विशेष रूप से डेयरी, ऑटोमोबाइल और शराब उद्योग से जुड़े मामलों में।
ट्रंप प्रशासन को क्यों तलाशना पड़ा नया रास्ता?
ट्रंप पहले भी कई देशों पर व्यापक टैरिफ लागू करने का प्रयास कर चुके हैं। हालांकि उन फैसलों को अमेरिकी अदालतों में चुनौती मिली थी।
कई मामलों में अदालतों ने राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों के आधार पर लगाए गए व्यापक टैरिफ पर सवाल उठाए और प्रशासन की शक्तियों को सीमित किया। इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने ऐसे वैकल्पिक कानूनी प्रावधानों की तलाश शुरू की, जिनके आधार पर व्यापारिक कार्रवाई अधिक मजबूत कानूनी आधार पर की जा सके।
इसी दौरान धारा 338 एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आई।
विशेषज्ञ क्यों बता रहे हैं 'न्यूक्लियर ऑप्शन'?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों में कुछ व्यापार विशेषज्ञों ने धारा 338 को व्यापारिक दुनिया का "न्यूक्लियर ऑप्शन" बताया है।
इसकी वजह यह है कि यदि राष्ट्रपति यह मान लेते हैं कि कोई देश अमेरिका के साथ अनुचित व्यापारिक व्यवहार कर रहा है, तो इस धारा के तहत बड़े पैमाने पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ऐसे फैसले व्यवहार में कई आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक चुनौतियों के साथ आते हैं। किसी भी बड़े टैरिफ का असर केवल संबंधित देश पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, निवेश और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका-कनाडा संबंधों में क्यों बढ़ रहा है तनाव?
अमेरिका और कनाडा दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच प्रतिदिन अरबों डॉलर का व्यापार होता है।
इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बढ़े हैं।
मुख्य विवादों में शामिल हैं—
स्टील और एल्युमीनियम पर शुल्क
डेयरी बाजार तक पहुंच
ऑटोमोबाइल उद्योग
शराब उत्पादों का व्यापार
डिजिटल सेवा कर (Digital Services Tax)
कनाडा द्वारा लागू डिजिटल सर्विसेज टैक्स को लेकर अमेरिका लंबे समय से आपत्ति जताता रहा है। अमेरिकी प्रशासन का कहना था कि इसका सबसे अधिक असर अमेरिकी तकनीकी कंपनियों पर पड़ता है।
हालांकि बाद में कनाडा ने बातचीत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस कर को वापस लेने का फैसला किया, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।
USMCA समझौते पर भी सवाल
तनाव का एक बड़ा कारण USMCA (United States–Mexico–Canada Agreement) भी माना जा रहा है।
यह समझौता अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था।
ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि कनाडा कुछ क्षेत्रों, विशेषकर कृषि और ऑटोमोबाइल उद्योग में संरक्षणवादी नीतियां अपनाकर समझौते की मूल भावना का पालन नहीं कर रहा है।
दूसरी ओर कनाडा का कहना है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए निर्धारित नियमों के तहत ही नीतियां बना रहा है।
दुनिया के अन्य देशों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि धारा 338 का व्यापक उपयोग शुरू होता है तो इसका असर केवल कनाडा तक सीमित नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में अमेरिका उन देशों पर भी इसी प्रकार की कार्रवाई कर सकता है, जिनके साथ उसका व्यापारिक विवाद चल रहा है।
इनमें प्रमुख रूप से—
चीन
यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य देश
मैक्सिको
अन्य बड़े निर्यातक देश
शामिल हो सकते हैं, यदि अमेरिकी प्रशासन को लगे कि उनके व्यापारिक नियम अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं।
हालांकि किसी भी देश पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से पहले अमेरिका को अपने व्यापारिक और कूटनीतिक हितों का भी संतुलन बनाना होगा।
क्या अभी भी समझौते की गुंजाइश है?
घोषित अतिरिक्त टैरिफ तत्काल लागू नहीं हो रहे हैं। इन्हें लागू होने में लगभग एक महीने का समय है।
इस अवधि के दौरान दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और कनाडा कुछ प्रमुख मुद्दों पर सहमति बना लेते हैं तो प्रस्तावित शुल्क में बदलाव या कमी संभव है।
इतिहास बताता है कि कई बार व्यापारिक विवाद बातचीत के माध्यम से सुलझाए गए हैं और अंतिम समय में प्रस्तावित टैरिफ वापस भी लिए गए हैं।
वैश्विक व्यापार पर क्या होगा असर?
यदि अमेरिका धारा 338 का व्यापक उपयोग करता है तो वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
अतिरिक्त टैरिफ से आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों पर असर पड़ेगा। साथ ही अन्य देश भी जवाबी शुल्क (Retaliatory Tariffs) लगा सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापारिक तनाव बढ़ने की आशंका रहेगी।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों, द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संतुलन पर भी इस प्रकार के कदमों का असर पड़ सकता है।
करीब एक सदी पुराने टैरिफ एक्ट की धारा 338 ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कनाडा पर प्रस्तावित 50 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क ने यह संकेत दिया है कि ट्रंप प्रशासन व्यापारिक मामलों में अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने के पक्ष में है।
हालांकि आने वाले हफ्तों में अमेरिका और कनाडा के बीच बातचीत की दिशा यह तय करेगी कि यह विवाद कितना आगे बढ़ता है। यदि दोनों देशों के बीच सहमति बन जाती है तो प्रस्तावित टैरिफ में बदलाव संभव है, लेकिन यदि मतभेद बने रहते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार और आर्थिक संबंधों पर भी देखने को मिल सकता है।

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