'4.5 करोड़ की स्वर्ण जड़ित रामचरितमानस कहां गई?' पूर्व गृह सचिव के दावे से मचा हड़कंप, रसीद नहीं मिलने का लगाया आरोप
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए उपहारों और बहुमूल्य भेंटों के रखरखाव को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव एस. लक्ष्मीनारायण ने दावा किया है कि उनके परिवार की ओर से श्रीराम मंदिर को भेंट की गई स्वर्ण जड़ित रामचरितमानस का अब तक कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया है। उनका आरोप है कि मंदिर ट्रस्ट को यह भेंट सौंपे जाने के बाद उन्हें न तो उसकी कोई रसीद दी गई और न ही यह बताया गया कि उस बहुमूल्य धरोहर को किस रूप में सुरक्षित रखा गया है।
पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के इन दावों के सामने आने के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, इस संबंध में संबंधित पक्ष की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने तक इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित जांच, आधिकारिक अभिलेखों या ट्रस्ट के स्पष्टीकरण के बाद ही स्पष्ट होगी।
चैनल पर आकर सुनाई पूरी कहानी
एस. लक्ष्मीनारायण ने एक समाचार चैनल से बातचीत में कहा कि वह अप्रैल 2024 में अपनी पत्नी सरस्वती के साथ अयोध्या पहुंचे थे। उनके अनुसार उन्होंने श्रीराम मंदिर निर्माण से जुड़े ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को अपने परिवार की ओर से एक विशेष रामचरितमानस भेंट की थी।
उन्होंने दावा किया कि यह कोई साधारण धार्मिक ग्रंथ नहीं था, बल्कि लगभग 147 किलोग्राम वजनी रामचरितमानस थी, जिसके 522 पन्नों पर सोने की परत चढ़ाई गई थी। उनके अनुसार इसकी अनुमानित कीमत लगभग साढ़े चार करोड़ से पांच करोड़ रुपये के बीच थी।
पूर्व गृह सचिव का कहना है कि उस समय उन्हें बताया गया था कि इस रामचरितमानस को भगवान रामलला के गर्भगृह में रखा जाएगा। इसी भरोसे के साथ उन्होंने यह अनमोल भेंट मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी।
रसीद नहीं मिलने का लगाया आरोप
एस. लक्ष्मीनारायण का सबसे बड़ा आरोप यह है कि इतनी मूल्यवान धार्मिक धरोहर सौंपने के बावजूद उन्हें कोई रसीद नहीं दी गई।
उनका कहना है कि उन्होंने कई बार ट्रस्ट से संपर्क कर रसीद मांगी, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। उन्होंने दावा किया कि पहली बार जब वह रसीद लेने पहुंचे तो उन्हें लगभग नौ घंटे तक इंतजार करना पड़ा। दूसरी बार भी करीब चार घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
उनके अनुसार दोनों अवसरों पर महासचिव से मुलाकात हुई और उन्हें भरोसा दिलाया गया कि रसीद उपलब्ध करा दी जाएगी, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।
पूर्व अधिकारी का कहना है कि किसी भी मूल्यवान वस्तु के दान के बाद उसका आधिकारिक रिकॉर्ड होना आवश्यक है ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।
'यह सिर्फ एक ग्रंथ नहीं, मां की तपस्या थी'
एस. लक्ष्मीनारायण ने इस रामचरितमानस को अपने परिवार की भावनाओं से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं थी, बल्कि उनकी दिवंगत माता की वर्षों की श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक थी।
उनके अनुसार उनकी माता ने लगभग 15 से 18 वर्षों तक निरंतर रामनाम लिखने का कार्य किया था। उसी आध्यात्मिक साधना और पारिवारिक श्रद्धा को सम्मान देने के उद्देश्य से इस विशेष रामचरितमानस का निर्माण कराया गया।
उन्होंने कहा कि परिवार की इच्छा थी कि यह धरोहर भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित हो और आने वाली पीढ़ियां भी इसे आस्था के प्रतीक के रूप में देखें।
राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ाव का भी किया जिक्र
पूर्व गृह सचिव ने अपने परिवार के राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े पुराने संबंधों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि उनका परिवार कई दशकों से इस आंदोलन से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान कन्याकुमारी से भेजी गई पहली ईंट उनके ससुर के घर से भेजी गई थी।
उनका कहना था कि इसी गहरे धार्मिक जुड़ाव और आस्था के कारण उनके परिवार ने इतनी महत्वपूर्ण धार्मिक धरोहर मंदिर को समर्पित करने का निर्णय लिया था।
आरएसएस प्रमुख से भी संपर्क करने का दावा
एस. लक्ष्मीनारायण ने यह भी दावा किया कि जब लगातार प्रयासों के बाद भी उन्हें रसीद नहीं मिली तो उन्होंने अपने एक परिचित की सहायता से हैदराबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत से मुलाकात की।
उनके अनुसार उन्होंने पूरी बात उनके सामने रखी। उनका कहना है कि उन्हें आश्वासन मिला था कि इस विषय पर उचित कार्रवाई होगी और समस्या का समाधान कराया जाएगा।
हालांकि, पूर्व अधिकारी का आरोप है कि इसके बाद भी उन्हें कोई जवाब या रसीद प्राप्त नहीं हुई।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है और संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
उपहारों के रिकॉर्ड को लेकर उठ रहे सवाल
राम मंदिर को देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु विभिन्न प्रकार के उपहार, आभूषण, सोना, चांदी और अन्य धार्मिक वस्तुएं भेंट करते रहे हैं। ऐसे में इन सभी भेंटों के सुरक्षित संरक्षण, सूचीकरण और अभिलेखीकरण को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी धार्मिक संस्थाओं में दान की गई बहुमूल्य वस्तुओं का व्यवस्थित रिकॉर्ड, रसीद प्रणाली और पारदर्शी दस्तावेजीकरण श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
यदि किसी श्रद्धालु को अपने द्वारा दिए गए दान का आधिकारिक प्रमाण नहीं मिलता है, तो स्वाभाविक रूप से कई प्रकार के प्रश्न उठ सकते हैं। हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित संस्था का पक्ष जानना भी उतना ही आवश्यक है।
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार
पूर्व गृह सचिव द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद इस पूरे मामले को लेकर लोगों की उत्सुकता बढ़ गई है। फिलहाल संबंधित मंदिर ट्रस्ट की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है।
यदि ट्रस्ट इस संबंध में कोई दस्तावेज, रसीद, रिकॉर्ड या स्पष्टीकरण जारी करता है, तो मामले की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। वहीं यदि आवश्यक समझा गया तो संबंधित प्रशासनिक अथवा कानूनी स्तर पर भी तथ्यों का परीक्षण किया जा सकता है।
अयोध्या राम मंदिर देश की करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में मंदिर को समर्पित बहुमूल्य उपहारों के संबंध में उठने वाला कोई भी प्रश्न स्वाभाविक रूप से व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव एस. लक्ष्मीनारायण द्वारा लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, लेकिन वर्तमान समय में इन्हें आरोप और दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अंतिम निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड और मंदिर ट्रस्ट की प्रतिक्रिया के बाद ही सामने आएगा। पारदर्शिता और तथ्यात्मक जांच ही इस प्रकार के विवादों का सबसे उचित समाधान मानी जाती है।

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