US-Iran जंग ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन! होर्मुज स्ट्रेट पर संकट, क्या अब 120 डॉलर पार जाएगा क्रूड ऑयल?
अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। पश्चिम एशिया में संघर्ष तेज होने के साथ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है। हाल के कारोबारी सत्रों में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड दोनों कई सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है और तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो दुनिया के कई देशों में ईंधन की कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है। इसका असर केवल तेल आयात करने वाले देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक महंगाई, परिवहन लागत और उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से एशिया, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंचती है।
जब इस समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ जाती है। यही कारण है कि होर्मुज में किसी भी तरह का संकट आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जाती है।
शांति समझौते के बाद फिर बढ़ा तनाव
कुछ समय पहले अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने और बातचीत आगे बढ़ने की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में राहत देखने को मिली थी। उस समय कच्चे तेल की कीमतें गिरकर लगभग 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।
लेकिन अब दोनों देशों के बीच फिर सैन्य टकराव बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता लौट आई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि संघर्ष और गहराता है तो तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है, जिससे कीमतें लगातार बढ़ सकती हैं।
पांच सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचा कच्चा तेल
बाजार में बढ़ती चिंता के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड भी लगभग 85.75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल बाजार में सबसे बड़ी चिंता आपूर्ति बाधित होने की है। यदि होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति और बिगड़ती है तो तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है।
अमेरिका में फिर महंगा हुआ पेट्रोल
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिका के खुदरा ईंधन बाजार पर भी दिखाई देने लगा है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका में रेगुलर गैसोलीन की औसत कीमत लगभग 4 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। हालांकि पूरे अमेरिका में कीमतें समान नहीं हैं। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय टैक्स, परिवहन लागत और सप्लाई की स्थिति के कारण ईंधन की कीमतों में अंतर देखने को मिलता है।
पिछले वर्ष की तुलना में इस बार उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, जिससे महंगाई को लेकर चिंता भी बढ़ी है।
पाकिस्तान में क्यों हो रही है हड़ताल?
महंगे कच्चे तेल और सरकार की नई ईंधन मूल्य निर्धारण नीति को लेकर पाकिस्तान में भी असंतोष बढ़ गया है।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, देशभर के लगभग 15 हजार पेट्रोल पंप संचालकों ने सरकार की नई नीति के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान किया है।
सरकार चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार ईंधन की कीमतें रोजाना अपडेट की जाएं। सरकार का तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और वैश्विक कीमतों का लाभ या असर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा।
वहीं पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि रोजाना कीमत बदलना व्यावहारिक नहीं है। उनका दावा है कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और बड़ी तेल कंपनियों को अधिक फायदा मिलेगा। इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि पिछले तीन वर्षों से उनके कमीशन में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है।
ऐसे में यदि होर्मुज स्ट्रेट में लंबे समय तक तनाव बना रहता है और तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भारत पर भी इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करतीं। इनमें कई अन्य महत्वपूर्ण कारक भी शामिल होते हैं, जैसे—
रुपये और डॉलर की विनिमय दर
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए टैक्स
रिफाइनिंग और परिवहन लागत
तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति
इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत में तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं होता।
क्या 100 से 120 डॉलर तक पहुंच सकता है क्रूड?
ऊर्जा बाजार के कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष और गहराता है तथा होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है।
कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि इसके साथ बाब-अल-मंदेब जैसे अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग भी प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर और अधिक दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं।
हालांकि यह केवल संभावित अनुमान हैं। वास्तविक कीमतें आगे होने वाले सैन्य घटनाक्रम, कूटनीतिक प्रयासों, वैश्विक मांग और तेल उत्पादक देशों के फैसलों पर निर्भर करेंगी।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बढ़ सकता है दबाव
यदि तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है, तो इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, विमानन, शिपिंग, बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत भी बढ़ सकती है।
इसके कारण दुनिया के कई देशों में महंगाई बढ़ने की आशंका है। विकसित और विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संकट लंबे समय तक जारी रहने पर वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
आने वाले दिन रहेंगे बेहद अहम
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी हुई है। यदि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान निकलता है तो तेल बाजार को राहत मिल सकती है। लेकिन यदि संघर्ष और बढ़ता है तथा होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
अभी बाजार अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है और आने वाले दिनों में सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम ही तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होंगी या फिर नया रिकॉर्ड बनाने की ओर बढ़ेंगी।

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