रहस्यमयी मौतों से दहला पन्ना! एक खेत में मिला ऐसा नजारा, जिसने अधिकारियों के उड़ा दिए होश
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक बेहद चिंताजनक और रहस्यमयी मामला सामने आया है। देशभर में गिद्ध संरक्षण के लिए पहचान रखने वाले पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास एक ऐसी घटना हुई है जिसने वन विभाग से लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों तक को चिंता में डाल दिया है। दक्षिण पन्ना वन मंडल से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ीखेड़ा गांव के एक खेत में आठ दुर्लभ गिद्ध और एक सियार मृत अवस्था में मिले हैं।
प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि गिद्धों की मौत सियार के जहरीले या विषाक्त शव का मांस खाने से हुई होगी। हालांकि वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि वास्तविक कारण का पता फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा। फिलहाल इस घटना ने गिद्ध संरक्षण अभियान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खेत में मिला दिल दहला देने वाला दृश्य
जानकारी के अनुसार, पहाड़ीखेड़ा गांव के खेत में स्थानीय लोगों ने कई बड़े पक्षियों को मृत अवस्था में देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची तो वहां आठ गिद्धों और एक सियार के शव पड़े मिले। यह इलाका जंगल की सीमा से बाहर राजस्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन पन्ना के वन क्षेत्र से इसकी दूरी मात्र तीन किलोमीटर है।
वन अधिकारियों ने तुरंत पूरे क्षेत्र को घेरकर जांच शुरू की और सभी मृत वन्यजीवों के शव अपने कब्जे में ले लिए।
दुर्लभ प्रजातियों के गिद्धों की मौत से बढ़ी चिंता
इस घटना में जिन गिद्धों की मौत हुई है, वे सभी सामान्य प्रजाति के नहीं बल्कि अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं। मृत पक्षियों में शामिल हैं—
4 लाल सिर वाले (Red-headed Vulture)
2 सिनेरियस गिद्ध (Cinereous Vulture)
2 मिस्र प्रजाति के गिद्ध (Egyptian Vulture)
इनमें से कई प्रजातियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल मानी जाती हैं। इनकी संख्या पहले ही लगातार घट रही है, ऐसे में एक साथ आठ दुर्लभ गिद्धों की मौत वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है।
एक सप्ताह पुराना था सियार का शव
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि मृत सियार का शव लगभग एक सप्ताह पुराना था। वह घनी झाड़ियों के बीच एक गड्ढे में पड़ा हुआ था, जिसके कारण उस पर किसी की नजर नहीं पड़ी।
भोजन की तलाश में पहुंचे गिद्धों ने जब उस शव को खाना शुरू किया तो कुछ ही समय बाद उनकी भी मौत हो गई। अधिकारियों को आशंका है कि सियार के शरीर में किसी जहरीले पदार्थ के अवशेष मौजूद हो सकते हैं, जिसने गिद्धों को भी अपनी चपेट में ले लिया।
हालांकि यह केवल प्रारंभिक संभावना है और इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है।
क्या सियार की मौत भी जहर से हुई थी?
घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर सियार की मौत कैसे हुई।
वन अधिकारियों का कहना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सियार ने कोई जहरीला पदार्थ खाया था या उसकी मौत किसी अन्य कारण से हुई। यदि सियार किसी जहरीले रसायन या कीटनाशक के संपर्क में आया था, तो वही विष उसके शरीर में मौजूद रह सकता था।
ऐसी स्थिति में उसका मांस खाने वाले गिद्ध भी जहरीले प्रभाव का शिकार हो सकते हैं।
फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए विसरा सैंपल
मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने सभी मृत गिद्धों और सियार के विसरा सैंपल एकत्र किए हैं।
इन नमूनों को विस्तृत जांच के लिए सागर और जबलपुर की फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में भेजा गया है। वैज्ञानिक जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि मौत का वास्तविक कारण क्या था और क्या किसी जहरीले रसायन की मौजूदगी इन वन्यजीवों के शरीर में थी।
रिपोर्ट आने के बाद ही घटना की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।
वन विभाग और पुलिस कर रहे संयुक्त जांच
चूंकि यह घटना राजस्व क्षेत्र में हुई है, इसलिए वन विभाग के साथ-साथ पुलिस भी जांच में शामिल है।
अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) एल. कृष्णमूर्ति ने बताया कि पूरे मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है। किसी भी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है।
यदि जांच में किसी जहरीले पदार्थ के इस्तेमाल की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
पन्ना क्यों है गिद्धों के लिए खास?
पन्ना का जंगल देश के सबसे महत्वपूर्ण गिद्ध संरक्षण क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां कई दुर्लभ प्रजातियों के गिद्ध प्राकृतिक रूप से निवास करते हैं और सफल प्रजनन भी करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, पन्ना का पूरा क्षेत्र "गिद्ध लैंडस्केप" के रूप में विकसित किया गया है, जहां गिद्धों की सुरक्षा, भोजन और प्रजनन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
ऐसे क्षेत्र के पास इस प्रकार की घटना सामने आना संरक्षण कार्यक्रमों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
कीटनाशकों के इस्तेमाल पर उठे सवाल
बुंदेलखंड क्षेत्र में खेतों और आसपास के इलाकों में कई बार फसलों की सुरक्षा या जंगली जानवरों को भगाने के लिए जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
कुछ मामलों में आवारा मवेशियों या जंगली जानवरों को मारने के लिए भी जहरीले पदार्थ का उपयोग किए जाने की शिकायतें मिलती रही हैं।
ऐसे में विशेषज्ञ इस संभावना पर भी विचार कर रहे हैं कि कहीं सियार किसी जहरीले चारे का शिकार तो नहीं हुआ था।
यदि ऐसा हुआ है तो यह न केवल एक सियार बल्कि कई दुर्लभ गिद्धों की मौत का कारण भी बन गया।
गिद्ध क्यों हैं पर्यावरण के लिए जरूरी?
गिद्ध प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माने जाते हैं।
वे जंगलों और खुले इलाकों में मृत पशुओं के शवों को खाकर वातावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं। इससे कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा कम होता है।
यदि गिद्धों की संख्या लगातार घटती है तो मृत जानवर लंबे समय तक खुले में पड़े रहते हैं, जिससे संक्रमण फैलने और अन्य मांसाहारी जीवों की संख्या बढ़ने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
विशेषज्ञों की बढ़ी चिंता
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पहले ही कई गिद्ध प्रजातियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
डाइक्लोफेनाक जैसी पशु दवाओं और जहरीले रसायनों ने बीते वर्षों में गिद्धों की आबादी को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
ऐसे में यदि एक साथ आठ दुर्लभ गिद्धों की मौत जहरीले पदार्थ से हुई है, तो यह संरक्षण प्रयासों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
स्थानीय लोगों में भी चिंता
घटना के बाद आसपास के गांवों में भी चिंता का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत नहीं देखी।
कई लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे क्षेत्र की जांच कराई जाए ताकि यदि कहीं जहरीले पदार्थ का इस्तेमाल हुआ है तो उसे तुरंत रोका जा सके।
रिपोर्ट का इंतजार
फिलहाल पूरे मामले की सच्चाई फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगी।
यदि जांच में जहर की पुष्टि होती है तो यह केवल वन्यजीवों की मौत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन जाएगा।
पन्ना के पास एक साथ आठ दुर्लभ गिद्धों और एक सियार की मौत ने वन विभाग, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। प्रारंभिक जांच में जहरीले शव की आशंका जरूर जताई गई है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आएगा। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी जागरूकता और जिम्मेदारी उतनी ही जरूरी है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो दुर्लभ प्रजातियों को बचाना और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं