28 साल तक करते रहे सरकारी नौकरी! रिटायरमेंट के बाद डिग्री की जांच में सामने आई चौंकाने वाली बात
हरियाणा के सोनीपत जिले में एक सरकारी स्कूल के सेवानिवृत्त पूर्व प्रिंसिपल के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज होने से शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। आरोप है कि उन्होंने फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की और लगभग 28 वर्षों तक सेवा करते रहे। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब यह पता लगाया जा रहा है कि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किस तरह किया गया और इतने लंबे समय तक यह मामला विभाग की नजरों से कैसे बचा रहा।
रिटायरमेंट के कुछ दिन बाद दर्ज हुई एफआईआर
जानकारी के अनुसार, गांव बरोदा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से 30 जून 2026 को सेवानिवृत्त हुए पूर्व प्रिंसिपल राजेंद्र सिंह के खिलाफ बरोदा थाना में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का मामला दर्ज किया गया है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की फर्जी डिग्री, अंकतालिका और प्रोविजनल सर्टिफिकेट शिक्षा विभाग में जमा कर सरकारी नौकरी प्राप्त की और वर्षों तक सेवा का लाभ उठाया।
करीब 28 वर्षों तक की सरकारी सेवा
जांच में सामने आया है कि राजेंद्र सिंह की नियुक्ति लगभग 28 वर्ष पहले पीजीटी (पोस्ट ग्रेजुएट टीचर) के पद पर हुई थी। शुरुआत में वे अस्थायी रूप से नियुक्त हुए थे। इसके बाद वर्ष 2003 में उन्हें स्थायी सेवा का लाभ मिला।
बताया जा रहा है कि उन्होंने लगभग 5 वर्ष अस्थायी और करीब 23 वर्ष स्थायी कर्मचारी के रूप में कार्य किया। नवंबर 2024 में उन्हें पदोन्नत कर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, गांव बरोदा का प्रिंसिपल बनाया गया था। इसके बाद 30 जून 2026 को वे सेवानिवृत्त हो गए।
लेकिन रिटायरमेंट के कुछ समय बाद ही उनके खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर ने पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया।
एक शिक्षक की शिकायत से खुला मामला
इस पूरे मामले की शुरुआत अप्रैल 2026 में हुई, जब विद्यालय के ही एक शिक्षक ने सीएम विंडो पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पूर्व प्रिंसिपल द्वारा नौकरी के दौरान जमा किए गए शैक्षणिक दस्तावेज संदिग्ध हैं और उनकी जांच कराई जानी चाहिए।
शिकायत मिलने के बाद शिक्षा विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू कर दी।
विश्वविद्यालय से कराई गई जांच
शिक्षा विभाग ने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की डिग्री, अंकतालिका और प्रोविजनल सर्टिफिकेट का सत्यापन संबंधित विश्वविद्यालय से कराने का निर्णय लिया।
इसके लिए दस्तावेज बिहार के बोधगया स्थित मगध विश्वविद्यालय भेजे गए। विश्वविद्यालय की ओर से भेजी गई सत्यापन रिपोर्ट में संबंधित डिग्री, मार्कशीट और प्रोविजनल सर्टिफिकेट को फर्जी बताया गया।
यही रिपोर्ट इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सबूत मानी जा रही है।
मुख्यालय तक पहुंची जांच रिपोर्ट
विश्वविद्यालय की रिपोर्ट मिलने के बाद शिक्षा विभाग ने पूरी जांच रिपोर्ट मुख्यालय भेजी। मुख्यालय स्तर पर दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद संबंधित अधिकारियों ने मामले को गंभीर मानते हुए कानूनी कार्रवाई के निर्देश जारी किए।
इसके बाद पूर्व प्रिंसिपल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए लिखित आदेश जारी किए गए।
बीईओ ने डीसीपी को सौंपी शिकायत
मुख्यालय के निर्देश मिलने के बाद खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) राजकुमार पंघाल ने पूरे मामले की लिखित शिकायत डीसीपी कार्यालय को भेजी।
डीसीपी ने शिकायत का परीक्षण करने के बाद बरोदा थाना पुलिस को मामला दर्ज करने के आदेश दिए। आदेश मिलते ही पुलिस ने संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
अब पुलिस करेगी गहन जांच
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस अब कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच कर रही है।
जांच में यह पता लगाया जाएगा कि—
फर्जी डिग्री और अन्य दस्तावेज कहां से तैयार कराए गए।
इन दस्तावेजों का इस्तेमाल सरकारी नौकरी प्राप्त करने में किस प्रकार किया गया।
क्या दस्तावेजों का सत्यापन नियुक्ति के समय हुआ था या नहीं।
यदि हुआ था तो फर्जी दस्तावेज विभागीय प्रक्रिया से कैसे पास हो गए।
क्या इस पूरे मामले में किसी अन्य व्यक्ति की भी भूमिका रही है।
पुलिस यह भी जांच करेगी कि सरकारी सेवा के दौरान मिले वेतन, पदोन्नति और अन्य लाभ किन परिस्थितियों में प्राप्त किए गए।
शिक्षा विभाग पर भी उठे सवाल
यह मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि लगभग 28 वर्षों तक किसी भी स्तर पर दस्तावेजों की सत्यता की जांच क्यों नहीं हो सकी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी नियुक्तियों में दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन और समय-समय पर पुनः सत्यापन आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार के मामलों को रोका जा सके।
सरकारी नौकरी में फर्जी दस्तावेज गंभीर अपराध
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है, तो यह गंभीर आपराधिक मामला माना जाता है। ऐसे मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जाती है।
यदि आरोप न्यायालय में सिद्ध हो जाते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी दंड के अलावा सरकारी सेवा से प्राप्त लाभों की समीक्षा भी की जा सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय न्यायालय और सक्षम प्राधिकारी द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही लिया जाता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल बरोदा थाना पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी हुई है। पुलिस विश्वविद्यालय की रिपोर्ट, शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड और नियुक्ति से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच करेगी। इसके अलावा संबंधित अधिकारियों और शिकायतकर्ता के बयान भी दर्ज किए जाएंगे।
जांच पूरी होने के बाद यदि पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो पुलिस अदालत में चार्जशीट दाखिल करेगी और उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
गांव बरोदा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सेवानिवृत्त पूर्व प्रिंसिपल के खिलाफ दर्ज यह मामला शिक्षा व्यवस्था में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। फिलहाल आरोपों की जांच जारी है और मामले में अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। पुलिस और शिक्षा विभाग दोनों इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं।

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