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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के समर्थन में सांसद के बाहर धरना पर बैठे चंद्रशेखर आज़ाद, बोले- "लोकतंत्र में लाठियों से असहमति नहीं दबाई जा सकती, बात नहीं सुनी गई तो होगा बड़ा आंदोलन"

 


नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। इस बीच आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में धरना स्थल पर पहुंचकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है, लेकिन लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ को लाठियों और बल प्रयोग से नहीं दबाया जा सकता।

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से प्रदर्शन जारी है और कई लोग लंबे समय से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनके अनुसार सरकार को पहले ही प्रदर्शनकारियों से संवाद करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया, तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

30 दिनों से जारी है प्रदर्शन

चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने संबोधन में कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पिछले लगभग 30 दिनों से जारी है। उन्होंने दावा किया कि कई प्रदर्शनकारी पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं और अपनी मांगों को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या सरकार इस इंतजार में थी कि प्रदर्शनकारी अपनी जान गंवा दें। उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों की बात सुने और समाधान निकालने का प्रयास करे।

उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि वहां असहमति व्यक्त करने की कितनी स्वतंत्रता है और सरकार विरोध की आवाज़ को किस तरह सुनती है।

"युवाओं पर हुई कार्रवाई ने झकझोर दिया"

सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि हाल के घटनाक्रम में जब बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरे, तब उनके साथ जिस प्रकार का व्यवहार हुआ, उसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।

उन्होंने कहा कि उन्होंने युवाओं को भूखे-प्यासे संघर्ष करते देखा और महसूस किया कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका कर्तव्य है कि वे उनके बीच पहुंचें और उनका मनोबल बढ़ाएं।

उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं की आवाज़ को दबाने के बजाय उनकी समस्याओं को समझना और उनका समाधान निकालना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

"मैं अपनी जिम्मेदारी निभाने आया हूं"

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला इसलिए किया क्योंकि वे चुप रहकर इस स्थिति को नहीं देख सकते थे।

उन्होंने कहा,

"मैं यहां उन युवाओं के साथ बैठा हूं जो अब भी अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। मैं सरकार और प्रधानमंत्री से अपील करता हूं कि उनकी बात सुनी जाए और लोकतांत्रिक तरीके से समाधान निकाला जाए।"

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि का दायित्व केवल संसद तक सीमित नहीं होता, बल्कि जनता की समस्याओं को समझना और उनके साथ खड़ा होना भी उसकी जिम्मेदारी है।

"वे राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, छात्र हैं"

अपने संबोधन में सांसद ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में शामिल अधिकांश लोग किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि वे छात्र और युवा हैं जो अपने भविष्य और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे युवाओं को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय उनकी बात सुननी चाहिए।

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि यदि पढ़ाई कर रहे छात्र अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराते हैं, तो उन्हें अपराधी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

"51 प्रतिशत आबादी को कुचलकर क्या मिला?"

सरकार पर निशाना साधते हुए चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि यदि देश के बड़ी संख्या में युवा और छात्र अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं, तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए।

उन्होंने सवाल किया कि यदि इतनी बड़ी आबादी की आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जाएगा, तो इससे लोकतंत्र को क्या संदेश जाएगा।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ा माध्यम होता है और किसी भी विवाद का समाधान बातचीत से ही निकल सकता है।

बाबासाहेब अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे बिताई रात

चंद्रशेखर आज़ाद ने बताया कि उन्होंने पूरी रात डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे बैठकर प्रदर्शनकारियों के साथ समय बिताया।

उन्होंने कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा दिए गए संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से उन्हें इस संघर्ष को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।

उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है और इन अधिकारों की रक्षा करना सभी की जिम्मेदारी है।

लोकसभा अध्यक्ष से की बातचीत

सांसद ने बताया कि उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी लोकसभा अध्यक्ष को भी दी है।

उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों की स्थिति और उनकी मांगों के बारे में विस्तार से अवगत कराया है तथा उम्मीद जताई कि इस मामले में सकारात्मक पहल होगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे संवाद के पक्षधर हैं और किसी भी ऐसे व्यक्ति से बातचीत करने के लिए तैयार हैं जो समाधान निकालने की इच्छा रखता हो।

"सरकार ने नहीं सुना तो आंदोलन और तेज होगा"

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि यदि सरकार लगातार प्रदर्शनकारियों की मांगों को अनदेखा करती रही, तो आंदोलन आगे और व्यापक हो सकता है।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा और जब तक युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक उनकी आवाज़ उठाई जाती रहेगी।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन चलाने के पक्ष में हैं तथा बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना सबसे बेहतर रास्ता मानते हैं।

राजनीतिक बयानबाजी तेज

जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है। विपक्ष सरकार पर प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती बरतने और उनकी मांगों की अनदेखी करने का आरोप लगा रहा है। वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी घटना की जांच तथ्यों के आधार पर की जाएगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद और राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।

आगे क्या?

फिलहाल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है और प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर सरकार से स्पष्ट जवाब चाहते हैं। दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ औपचारिक संवाद शुरू करती है या नहीं। यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो विवाद का समाधान निकल सकता है, लेकिन यदि गतिरोध बना रहता है तो आंदोलन के और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

(नोट: यह समाचार सांसद चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयान पर आधारित है। इसमें व्यक्त आरोप, दावे और राजनीतिक टिप्पणियां संबंधित नेता के कथन हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि इस समाचार में नहीं की गई है।)

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