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19 साल बाद मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बड़ा उलटफेर! पहले फांसी मिली, अब सभी बरी... आखिर जांच में क्या हुआ?

 


मुंबई की जीवनरेखा मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इन धमाकों में 180 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यह भारत के सबसे चर्चित आतंकी मामलों में से एक माना जाता है।

अब, लगभग दो दशक बाद इस मामले में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी दोषियों को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट ने भी इनकार कर दिया है। हालांकि शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट के फैसले को फिलहाल किसी अन्य मामले में कानूनी मिसाल (precedent) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

इस फैसले ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, सबूतों की विश्वसनीयता और आपराधिक न्याय प्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

क्या था 11 जुलाई 2006 का मुंबई ट्रेन ब्लास्ट?

11 जुलाई 2006 की शाम मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर चल रही लोकल ट्रेनों में कुछ ही मिनटों के अंतराल पर सात शक्तिशाली बम विस्फोट हुए थे।

ऑफिस से घर लौट रहे हजारों यात्रियों के बीच हुए इन धमाकों ने पूरे शहर को दहला दिया था। धमाकों में 180 से अधिक लोगों की जान चली गई, जबकि 800 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

घटना के बाद पूरे देश में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया था और जांच की जिम्मेदारी महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ता (ATS) को सौंपी गई थी।

ATS ने 28 लोगों को बनाया था आरोपी

जांच के दौरान ATS ने कुल 28 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें से 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

जांच एजेंसी का दावा था कि इन लोगों ने प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के साथ मिलकर इस हमले की साजिश रची और उसे अंजाम दिया।

मामले में महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) सहित कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया।

2015 में विशेष अदालत ने सुनाई थी फांसी और उम्रकैद

सितंबर 2015 में विशेष MCOCA अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुनाया।

अदालत ने—

  • 5 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई।

  • 7 आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी।

  • 1 आरोपी को बरी कर दिया।

इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने मौत की सजा की पुष्टि के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, जबकि दोषियों ने अपनी सजा को चुनौती दी।

2025 में हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को किया बरी

करीब दस वर्षों तक चली अपीलों की सुनवाई के बाद जुलाई 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने 667 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया।

जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस श्याम सी. चंदक की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

इस दौरान एक आरोपी की कोविड-19 महामारी के समय जेल में मृत्यु भी हो चुकी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

शीर्ष अदालत ने फिलहाल आरोपियों की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि हाईकोर्ट के इस फैसले को अभी किसी अन्य मुकदमे में कानूनी मिसाल के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा।

यानी आरोपियों की रिहाई बरकरार रहेगी, लेकिन फैसले के कानूनी प्रभाव पर अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई में हो सकता है।

हाईकोर्ट ने जांच पर उठाए गंभीर सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ATS की जांच प्रक्रिया पर कई गंभीर टिप्पणियां कीं।

अदालत ने कहा कि—

  • अभियोजन पक्ष पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया।

  • आरोपियों के खिलाफ अपराध संदेह से परे साबित नहीं हुआ।

  • 11 आरोपियों के कथित इकबालिया बयान लगभग एक जैसे थे।

  • इन बयानों की विश्वसनीयता संदिग्ध प्रतीत होती है।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों द्वारा हिरासत में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दिए जाने के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

MCOCA लगाने पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के पास MCOCA जैसी कठोर आतंकवाद विरोधी धाराएं लगाने के लिए पर्याप्त आधार दिखाई नहीं दिया।

अदालत के अनुसार अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि कानून लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी की गई थीं।

जांच एजेंसी को कड़ी टिप्पणी

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि—

केवल किसी मामले को सुलझा हुआ दिखाने के लिए आरोपियों को कटघरे में खड़ा कर देना समाज को न्याय का झूठा एहसास देता है और इससे न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होता है।

यह टिप्पणी पूरे फैसले की सबसे चर्चित टिप्पणियों में शामिल रही।

2008 में सामने आई थी दूसरी थ्योरी

इस मामले में जांच को लेकर विवाद 2008 में ही शुरू हो गया था।

दिल्ली और अहमदाबाद बम धमाकों की जांच के दौरान मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच ने इंडियन मुजाहिदीन (IM) के सदस्य सादिक शेख को गिरफ्तार किया था।

जांच अधिकारियों के अनुसार सादिक शेख ने पूछताछ में दावा किया था कि 2005 के बाद देश में हुए कई धमाकों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन का हाथ था और मुंबई ट्रेन ब्लास्ट भी उसी नेटवर्क ने अंजाम दिया था।

हालांकि उस समय ATS ने इस दावे को पर्याप्त सबूतों के अभाव में स्वीकार नहीं किया।

यासीन भटकल का भी सामने आया था बयान

2013 में भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किए गए इंडियन मुजाहिदीन के सह-संस्थापक यासीन भटकल ने भी पूछताछ के दौरान कथित तौर पर मुंबई ट्रेन धमाकों को लेकर बयान दिया था।

रिपोर्टों के अनुसार उसने दावा किया था कि यह हमला इंडियन मुजाहिदीन ने 2002 गुजरात दंगों के प्रतिशोध के रूप में किया था।

हालांकि इन बयानों और ATS की मूल जांच के बीच अंतर बना रहा।

पूर्व ATS प्रमुख ने टिप्पणी से किया इनकार

जब तत्कालीन ATS प्रमुख के. पी. रघुवंशी से हाईकोर्ट की टिप्पणियों और जांच को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

उन्होंने कहा कि मामला न्यायालय में लंबित है और इस पर सार्वजनिक टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

जांच से जुड़े कुछ अधिकारियों का कहना है कि विशेष MCOCA अदालत ने आरोपियों को दोषी माना था, जबकि हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया। ऐसे में अंतिम कानूनी स्थिति का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही से होगा।

क्या कहता है यह मामला?

मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के सबसे जटिल मामलों में गिना जाता है।

एक ओर विशेष अदालत ने इन्हीं सबूतों के आधार पर फांसी और उम्रकैद जैसी सजा सुनाई, वहीं हाईकोर्ट ने उन्हीं सबूतों को अपर्याप्त बताते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

अब सुप्रीम कोर्ट में आगे की कार्यवाही इस बहुचर्चित मामले की अंतिम कानूनी दिशा तय करेगी।

मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट भारत के इतिहास के सबसे दर्दनाक आतंकी हमलों में से एक रहा है। लगभग 19 वर्ष बाद इस मामले में आए न्यायिक फैसलों ने जांच प्रक्रिया, साक्ष्यों की गुणवत्ता और आतंकवाद संबंधी मुकदमों की जांच पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिलहाल आरोपियों की रिहाई में हस्तक्षेप न करने से मामला एक नए कानूनी चरण में पहुंच गया है। अब देश की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आगे की सुनवाई में शीर्ष अदालत इस मामले पर अंतिम निर्णय कब और किस रूप में देती है।

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