Breaking News

Viral Video : 7 साल तक इंसान के सीने पर पंजा रखकर सोती रही बाघिन... आखिरी कुर्बानी ने पूरी दुनिया को रुला दिया!

 


भुवनेश्वर/सिमलीपाल। क्या कोई खूंखार बाघिन सात वर्षों तक एक इंसान के घर में रह सकती है? क्या वह हर रात अपने मालिक के बिस्तर पर सो सकती है और अपना भारी-भरकम पंजा उसके सीने पर रखकर प्यार जता सकती है? यह सुनने में किसी फिल्म या उपन्यास की कहानी लग सकती है, लेकिन भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में दर्ज ‘खैरी’ की कहानी हकीकत है। यह सिर्फ एक बाघिन की कहानी नहीं, बल्कि इंसान और वन्यजीव के बीच भरोसे, प्रेम, समर्पण और बलिदान की ऐसी मिसाल है, जिसे आज भी लोग भावुक होकर याद करते हैं।

यह कहानी हमें 1974 के ओडिशा के सिमलीपाल टाइगर रिजर्व में ले जाती है, जहां एक अनाथ बाघिन ने इंसानों के बीच पलकर पूरी दुनिया को यह दिखाया कि प्यार भाषा या प्रजाति का मोहताज नहीं होता।

जंगल में मिला अनाथ शावक

5 अक्टूबर 1974 का दिन था। सिमलीपाल के घने जंगलों में खैरी जनजाति के कुछ लोग शहद की तलाश में निकले थे। तभी झाड़ियों के बीच उन्हें एक बाघ के बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।

जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वहां बिल्ली जितना छोटा, डरा-सहमा बाघ का एक शावक पड़ा था। उसकी मां का कहीं पता नहीं था। काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी जब कोई बाघिन वापस नहीं लौटी तो आदिवासियों ने उस बच्चे को सुरक्षित उठाया और सिमलीपाल टाइगर रिजर्व के तत्कालीन निदेशक एवं प्रसिद्ध आईएफएस अधिकारी सरोज राज चौधरी के पास ले आए।

उसी पल से इस अनाथ शावक की जिंदगी बदल गई।

सरोज राज चौधरी कौन थे?

सरोज राज चौधरी भारतीय वन सेवा के उन चुनिंदा अधिकारियों में गिने जाते हैं जिन्होंने भारत में बाघ संरक्षण की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

13 अगस्त 1924 को कटक के पास जन्मे चौधरी बचपन से ही जंगल और वन्यजीवों के बेहद करीब रहे। उन्होंने 1949 में वन विभाग में अपना करियर शुरू किया और अपनी मेहनत, ज्ञान तथा समर्पण के बल पर 1966 में ओडिशा के पहले वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन अधिकारी बने।

भारत में वर्ष 1972 में पहली बार बाघों की राष्ट्रीय गणना जिस ‘पग मार्क’ (पंजों के निशान) तकनीक से की गई थी, उसके विकास का श्रेय भी सरोज राज चौधरी को दिया जाता है।

इसी सर्वेक्षण में पता चला कि पूरे देश में केवल 1827 बाघ ही बचे हैं। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में ऐतिहासिक ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की और देशभर में कई टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए, जिनमें सिमलीपाल भी शामिल था।

खैरी बनी परिवार की बेटी

जिस नदी के किनारे यह बाघिन मिली थी, उसका नाम खैरी नदी था। इसी कारण उसका नाम रखा गया ‘खैरी’

सरोज राज चौधरी और उनकी पत्नी निहार नलिनी स्वाईं ने उसे अपनी बेटी की तरह पालना शुरू किया। उसे बोतल से दूध पिलाया जाता, हाथों से खाना खिलाया जाता और पूरे परिवार का प्यार उसे मिलता।

धीरे-धीरे खैरी का इंसानों पर ऐसा भरोसा बन गया कि वह किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ से खाना तक नहीं खाती थी। वह सिर्फ अपने ‘माता-पिता’ के हाथों से ही भोजन स्वीकार करती थी।

सरकारी बंगला बन गया अनोखा परिवार

सरोज राज चौधरी का सरकारी आवास किसी सामान्य बंगले जैसा नहीं था। वहां कई घायल और बचाए गए वन्यजीव रहते थे।

एक अंधा लकड़बग्घा, भालू का बच्चा, मगरमच्छ, नेवला और ‘ब्लैकी’ नाम का पालतू कुत्ता—ये सभी एक ही परिसर में रहते थे।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इन जानवरों के बीच किसी तरह का डर या हिंसा नहीं थी। ब्लैकी और खैरी घंटों साथ खेलते, दौड़ते और शरारत करते थे। उन्हें देखकर शायद ही कोई विश्वास कर पाता कि इनमें से एक भारत की सबसे खतरनाक शिकारी प्रजाति है।

जंगल ने नहीं अपनाया

समय के साथ खैरी बड़ी होने लगी। उसके शरीर में जंगली बाघों जैसी ताकत और फुर्ती आ गई थी।

वन अधिकारियों ने कई बार कोशिश की कि उसे वापस जंगल में छोड़ दिया जाए ताकि वह प्राकृतिक जीवन जी सके। लेकिन हर बार खैरी वापस लौट आती।

जंगली बाघ उसे अपने समूह का हिस्सा नहीं मानते थे और इंसानों के बीच पली-बढ़ी खैरी भी जंगल की जिंदगी में खुद को ढाल नहीं पाती थी।

आखिरकार यह तय किया गया कि वह चौधरी परिवार के साथ ही रहेगी।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी हुईं प्रभावित

एक बाघिन के इंसानों के साथ रहने की खबर पूरे देश में फैल गई। यह चर्चा दिल्ली तक पहुंची और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस अनोखी कहानी के बारे में जानकारी ली।

बताया जाता है कि खैरी और चौधरी परिवार के बीच बने इस अद्भुत रिश्ते को देखते हुए उसे परिवार के साथ रहने की विशेष अनुमति दी गई।

इसके बाद खैरी सिमलीपाल की पहचान बन गई। देश-विदेश से लोग उसे देखने आते थे।

हर रात सीने पर पंजा रखकर सोती थी खैरी

कहा जाता है कि खैरी का अपने ‘पिता’ सरोज राज चौधरी से बेहद गहरा लगाव था।

वह अक्सर रात में उनके बिस्तर पर जाकर सो जाती थी। उसका पसंदीदा तरीका था कि वह अपना भारी पंजा सरोज बाबू के सीने पर रखकर आराम करती।

किसी बाहरी व्यक्ति को यह दृश्य भयावह लग सकता था, लेकिन चौधरी परिवार के लिए यह खैरी का प्यार जताने का तरीका था।

यही रिश्ता दुनिया भर में इंसान और बाघ के बीच विश्वास की सबसे अनोखी मिसालों में गिना जाने लगा।

फिर आया वह मनहूस दिन

साल 1981 में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।

एक पागल (रेबीज संक्रमित) कुत्ता अचानक बंगले में घुस आया। वह बेकाबू होकर इंसानों और जानवरों पर हमला करने लगा।

पूरा परिवार खतरे में था।

तभी खैरी बिना डरे उस कुत्ते के सामने आ गई। उसने कुत्ते पर हमला कर उसे मार गिराया और अपने परिवार को बचा लिया।

लेकिन इस संघर्ष के दौरान कुत्ते ने खैरी को भी काट लिया था।

रेबीज ने छीन ली जिंदगी

कुछ दिनों बाद खैरी में रेबीज के लक्षण दिखाई देने लगे। उस समय इस बीमारी का प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं था।

करीब दो महीनों तक वह असहनीय पीड़ा से गुजरती रही।

जिस बाघिन की दहाड़ कभी पूरे परिसर में गूंजती थी, वह अब दर्द से तड़प रही थी। डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया कि अब उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है और लगातार पीड़ा देना उचित नहीं होगा।

बताया जाता है कि परिस्थितियों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से विशेष अनुमति लेने के बाद खैरी को मानवीय आधार पर शांतिपूर्वक मृत्यु दी गई।

उसके बाद उसे उसी परिसर में दफनाया गया, जहां उसने अपना बचपन बिताया था और जहां वह पूरे परिवार के साथ खेला करती थी।

बेटी के जाने का गम नहीं सह पाए पिता

खैरी की मौत ने सरोज राज चौधरी को अंदर तक तोड़ दिया।

जिस बाघिन को उन्होंने अपनी बेटी की तरह पाला था, उसके जाने का दुख वह सहन नहीं कर सके।

बताया जाता है कि खैरी की मृत्यु के लगभग एक वर्ष बाद दिल का दौरा पड़ने से उनका भी निधन हो गया।

इसके बाद उनकी पत्नी निहार नलिनी स्वाईं वर्षों तक खैरी की यादों के सहारे जीवन बिताती रहीं और वर्ष 2021 में 88 वर्ष की आयु में उन्होंने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आज भी जिंदा है खैरी की कहानी

वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में खैरी का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। उसकी कहानी यह साबित करती है कि प्रेम, विश्वास और अपनापन केवल इंसानों तक सीमित नहीं है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जंगली जानवरों को प्राकृतिक आवास में ही रहना चाहिए और आज वन्यजीव संरक्षण की नीतियां भी इसी सिद्धांत पर आधारित हैं। फिर भी खैरी की कहानी उस दौर की एक अनोखी घटना थी, जिसने इंसान और वन्यजीव के रिश्ते को दुनिया के सामने एक नए नजरिए से पेश किया।

खैरी ने अपने जीवन में केवल प्यार ही नहीं दिया, बल्कि अंत समय में अपने परिवार की रक्षा के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर दी। शायद यही वजह है कि उसकी कहानी आज भी इतिहास के पन्नों में एक ऐसी भावनात्मक दास्तान बनकर दर्ज है, जिसे समय कभी मिटा नहीं पाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं