तुर्की का पाकिस्तान प्रेम फिर आया सामने! भारत को लेकर कही ऐसी बात कि मच गई हलचल
हाइलाइट्स
तुर्की-पाकिस्तान संबंध को लेकर तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने खुलकर रखा अपना पक्ष।
भारत और तुर्की के बीच किसी भी द्विपक्षीय विवाद से किया इनकार।
पाकिस्तान से करीबी रिश्तों का बचाव करते हुए तुर्की ने कई देशों का उदाहरण दिया।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की मदद के आरोपों पर फिर बढ़ी चर्चा।
भारत-तुर्की संबंधों के भविष्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस शुरू।
भारत और तुर्की के रिश्तों के बीच एक बार फिर तनाव की चर्चा तेज हो गई है। इसकी वजह बना है तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने न केवल पाकिस्तान के साथ अपने देश के संबंधों का बचाव किया बल्कि भारत को भी अप्रत्यक्ष रूप से सलाह दे डाली। ऐसे समय में जब तुर्की-पाकिस्तान संबंध लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं, फिदान का यह बयान दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की कूटनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिए गए इस बयान ने उन सवालों को फिर जीवित कर दिया है जो पिछले कुछ वर्षों से भारत और तुर्की के बीच बढ़ती दूरी को लेकर उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान को लेकर तुर्की की नीतियों पर भारत पहले भी चिंता जता चुका है।
तुर्की-पाकिस्तान संबंध पर हाकन फिदान का बड़ा बयान
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटजिक स्टडीज (IISS) के एक कार्यक्रम में बोलते हुए तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई प्रत्यक्ष विवाद नहीं है।
उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच न तो कोई सीमा विवाद है और न ही कोई ऐसा ऐतिहासिक संघर्ष रहा है जो रिश्तों में स्थायी बाधा बने। फिदान ने कहा कि तुर्की भारत के साथ अच्छे संबंध चाहता है और उसके पास ऐसा करने के पर्याप्त कारण हैं।
हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि तुर्की-पाकिस्तान संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं और केवल तुर्की ही ऐसा देश नहीं है जिसके पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते हैं।
भारत को लेकर क्या कहा?
हाकन फिदान ने कहा कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि यदि भारत उन देशों से नाराज होता है जो पाकिस्तान के साथ मित्रता रखते हैं, तो यह सही दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।
उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परिपक्वता का परिचय देते हुए देशों को मतभेदों से ऊपर उठकर सहयोग के नए अवसर तलाशने चाहिए।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब तुर्की-पाकिस्तान संबंध को लेकर भारत में पहले से ही कई सवाल उठ रहे हैं।
ऑपरेशन सिंदूर और तुर्की की भूमिका पर बढ़ी चर्चा
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान तुर्की की भूमिका को लेकर पहले भी कई रिपोर्टें सामने आ चुकी हैं। विशेष रूप से ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मिली कथित विदेशी सहायता पर भारत में व्यापक चर्चा हुई थी।
रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की ने पाकिस्तान को ड्रोन तकनीक और विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध कराई थी। इसी कारण तुर्की-पाकिस्तान संबंध को केवल कूटनीतिक मित्रता नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी के रूप में भी देखा जाने लगा।
ड्रोन सहायता के आरोप
मई 2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि तुर्की ने पाकिस्तान को बड़ी संख्या में ड्रोन और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि तुर्की के कुछ सलाहकारों ने पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को तकनीकी सहयोग दिया।
हालांकि इन दावों पर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं रही हैं, लेकिन इतना जरूर है कि इन घटनाओं ने तुर्की-पाकिस्तान संबंध को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया।
क्या है ऑपरेशन सिंदूर?
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू की थी, जिसे ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया।
इस अभियान के तहत भारतीय सेना ने सीमा पार स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत ने इसे आतंकवाद के खिलाफ आवश्यक और निर्णायक कार्रवाई बताया था।
ऑपरेशन के बाद क्षेत्रीय राजनीति में कई नए समीकरण उभरे और तुर्की-पाकिस्तान संबंध को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गईं।
पाकिस्तान के लिए तुर्की क्यों महत्वपूर्ण है?
तुर्की और पाकिस्तान के बीच संबंध केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग भी लंबे समय से जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की-पाकिस्तान संबंध की जड़ें ऐतिहासिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर मौजूद हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देश अक्सर एक-दूसरे के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
भारत-तुर्की संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापारिक और आर्थिक सहयोग की काफी संभावनाएं हैं। दोनों देश जी-20 जैसे मंचों पर साथ काम करते रहे हैं।
लेकिन जब भी तुर्की-पाकिस्तान संबंध से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं, दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी महसूस की जाती है। भारत की चिंता यह रही है कि पाकिस्तान समर्थक रुख क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।
क्या रिश्तों में सुधार संभव है?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत और तुर्की दोनों ही उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं और वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसलिए दोनों देशों के लिए संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखना जरूरी है।
हाकन फिदान के बयान में भी यही संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि मतभेदों को अलग रखते हुए सहयोग बढ़ाया जाए। हालांकि तुर्की-पाकिस्तान संबंध की मजबूती भारत की रणनीतिक चिंताओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाती।
बदलते वैश्विक समीकरणों में तुर्की की रणनीति
तुर्की हाल के वर्षों में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को लेकर चर्चा में रहा है। रूस, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ मतभेद होने के बावजूद उसने विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश की है।
इसी रणनीति के तहत तुर्की-पाकिस्तान संबंध को भी वह अपनी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। दूसरी ओर, भारत के साथ आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने की इच्छा भी तुर्की लगातार व्यक्त करता रहा है।
हाकन फिदान का हालिया बयान स्पष्ट संकेत देता है कि तुर्की अपने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को लेकर किसी प्रकार की सफाई देने के बजाय उनका खुलकर बचाव करना चाहता है। वहीं भारत के साथ भी वह संवाद और सहयोग बनाए रखने की बात कर रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तुर्की-पाकिस्तान संबंध और भारत-तुर्की कूटनीतिक रिश्तों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। फिलहाल इतना तय है कि इस बयान ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

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