तृणमूल कांग्रेस संकट गहराया: 80 में से सिर्फ 20 विधायक पहुंचे, ममता बनर्जी ने दो विधायकों को किया निष्कासित
हाइलाइट्स
तृणमूल कांग्रेस संकट के बीच ममता बनर्जी ने दो विधायकों को पार्टी से बाहर किया।
संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी को तत्काल प्रभाव से प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित किया गया।
कालीघाट में बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठक में अधिकांश विधायक नहीं पहुंचे।
पार्टी ने दोनों नेताओं पर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाया।
विधानसभा चुनाव 2026 में हार के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की चर्चाएं तेज हुईं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ा तृणमूल कांग्रेस संकट
पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस संकट चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से मिली करारी हार के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर लगातार असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियां सामने आ रही हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा कदम उठाते हुए अपने दो विधायकों, संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी, को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्रवाई केवल दो नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश देने का प्रयास है कि पार्टी नेतृत्व अनुशासन के मुद्दे पर किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। ऐसे समय में जब तृणमूल कांग्रेस संकट गहराता दिखाई दे रहा है, यह फैसला संगठन को एकजुट रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बैठक में विधायकों की अनुपस्थिति बनी विवाद की वजह
80 में से सिर्फ 20 विधायक पहुंचे
सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी विधायकों की एक अहम बैठक बुलाई थी। इस बैठक का उद्देश्य चुनावी हार के बाद संगठन की स्थिति की समीक्षा करना और भविष्य की रणनीति तय करना था।
हालांकि, बैठक में लगभग 80 विधायकों में से केवल 20 विधायक ही पहुंचे। बड़ी संख्या में विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी नेतृत्व को असहज कर दिया। अंततः बैठक को रद्द करना पड़ा। इस घटना ने तृणमूल कांग्रेस संकट को और अधिक उजागर कर दिया।
पार्टी प्रवक्ता ने दी सफाई
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा कि कई विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक कार्यक्रमों और हिंसा विरोधी अभियानों में व्यस्त थे। उन्होंने दावा किया कि अधिकांश विधायकों ने पहले ही अपनी अनुपस्थिति की सूचना दे दी थी।
लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे सामान्य अनुपस्थिति नहीं बल्कि नेतृत्व के प्रति असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस संकट की चर्चा और तेज हो गई है।
निष्कासन नोटिस में क्या कहा गया?
पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप
1 जून को जारी निष्कासन नोटिस में तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी लगातार उन बैठकों से अनुपस्थित रहे जिन्हें पार्टी नेतृत्व ने अधिकृत रूप से बुलाया था।
नोटिस में स्पष्ट कहा गया कि दोनों नेताओं का व्यवहार संगठनात्मक अनुशासन के विरुद्ध है और उन्होंने नेतृत्व के निर्देशों की अवहेलना की है। पार्टी के अनुसार, यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस संकट को और गंभीर बना सकती थी, इसलिए कठोर कार्रवाई जरूरी थी।
सार्वजनिक बयानों पर भी आपत्ति
पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि दोनों विधायक ऐसे सार्वजनिक बयानों और गतिविधियों में शामिल रहे जो संगठन के हितों के प्रतिकूल थे। हालांकि नोटिस में इन गतिविधियों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया।
टीएमसी के आदेश में कहा गया कि मामले पर विचार करने के बाद सक्षम प्राधिकारी ने दोनों नेताओं को तत्काल प्रभाव से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित करने का निर्णय लिया है।
सभी पद और विशेषाधिकार समाप्त
अब पार्टी में नहीं रहेगा कोई अधिकार
निष्कासन के साथ ही संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी पार्टी से जुड़े सभी पदों, जिम्मेदारियों और विशेषाधिकारों से वंचित हो गए हैं। आदेश जारी होने के बाद दोनों नेताओं की पार्टी में सभी आधिकारिक भूमिकाएं समाप्त मानी जाएंगी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह कदम दिखाता है कि तृणमूल कांग्रेस संकट से निपटने के लिए पार्टी नेतृत्व अब सख्त रुख अपनाने लगा है।
शुभेंदु अधिकारी के दावे के बाद बढ़ी हलचल
हस्ताक्षर जालसाजी मामले से जुड़ा विवाद
दिलचस्प बात यह है कि यह कार्रवाई उस समय हुई है जब विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि विधानसभा में कथित हस्ताक्षर जालसाजी मामले की सीआईडी जांच इन्हीं दोनों विधायकों की शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी।
उनके अनुसार, दोनों विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक शिकायत सौंपी थी। इसके बाद जांच प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस घटनाक्रम ने तृणमूल कांग्रेस संकट को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।
विपक्ष अब इसे पार्टी के अंदरूनी मतभेदों का परिणाम बता रहा है, जबकि टीएमसी इसे अनुशासनात्मक कार्रवाई करार दे रही है।
संदीपान साहा कौन हैं?
स्थानीय राजनीति में मजबूत पकड़
संदीपान साहा लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में शामिल रहे हैं। वे संगठन में अपनी सक्रिय भूमिका और क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव के लिए जाने जाते हैं।
पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था और वे जीतकर विधायक बने। हालांकि पिछले कुछ महीनों से उनके और शीर्ष नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ने की चर्चाएं सामने आ रही थीं।
विश्लेषकों का मानना है कि संदीपान साहा का निष्कासन तृणमूल कांग्रेस संकट के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष की ओर संकेत करता है।
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर
छात्र राजनीति से विधानसभा तक
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक करियर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। वे पहले सीपीआई (एम) की छात्र इकाई एसएफआई से जुड़े रहे और संगठन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
बाद में उन्होंने वामपंथी राजनीति छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। वे राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं और पार्टी के श्रमिक संगठन आईएनटीटीयूसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।
2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने उलूबेरिया पूर्व सीट से जीत दर्ज की थी। ऐसे नेता का निष्कासन यह दर्शाता है कि तृणमूल कांग्रेस संकट केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि शीर्ष नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं के बीच भी मतभेद मौजूद हैं।
क्या टीएमसी में बढ़ रही है गुटबाजी?
हार के बाद बढ़ी आंतरिक चुनौतियां
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर कई स्तरों पर असंतोष उभरकर सामने आया है। कई नेताओं को लगता है कि संगठन में फैसले लेने की प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत हो गई है।
वहीं, पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्ती आवश्यक है। यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस संकट के बीच ऐसे नेताओं पर कार्रवाई की जा रही है जो नेतृत्व के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
संगठन को एकजुट रखने की चुनौती
ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट बनाए रखने की है। विपक्ष लगातार टीएमसी के भीतर मतभेदों को मुद्दा बना रहा है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस संकट आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
यदि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं को साथ लाने में सफल रहता है तो संगठन फिर से मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि असंतोष बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी का निष्कासन केवल एक अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे बड़े बदलावों का संकेत भी है। बैठक में विधायकों की भारी अनुपस्थिति, नेतृत्व के खिलाफ उठते सवाल और विपक्ष के आरोप यह दर्शाते हैं कि तृणमूल कांग्रेस संकट फिलहाल समाप्त होता नहीं दिख रहा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इस चुनौती से कैसे निपटती हैं और क्या पार्टी एक बार फिर संगठनात्मक मजबूती हासिल कर पाती है।

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