जब ट्विटर पर गूंजा ‘मधुशाला नहीं पाठशाला दो’, तब सामने आई वो सच्चाई जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया

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हाइलाइट्स

  • School Merger Protest हैशटैग के साथ चलाया गया डिजिटल आंदोलन ट्रेंड हुआ देश में नंबर-1
  • शिक्षकों, शिक्षामित्रों, डीएलएड प्रशिक्षुओं और ग्रामीण अभिभावकों ने साझा कीं भावनात्मक अपीलें
  • रसोइयों, बच्चों और ग्रामीण महिलाओं के वीडियो ने जनभावनाओं को दी नई आवाज
  • “मधुशाला नहीं पाठशाला दो” के नारे से सरकार की स्कूल विलय नीति पर सवाल
  • D.El.Ed नेताओं ने जताई आशंका—बंद स्कूलों से लड़कियों की शिक्षा सबसे ज्यादा प्रभावित

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कम छात्रसंख्या वाले परिषदीय विद्यालयों के विलय (School Pairing) के खिलाफ रविवार को सोशल मीडिया पर एक बड़ा डिजिटल आंदोलन देखने को मिला। ट्विटर (अब एक्स) पर चलाए गए School Merger Protest को हजारों की संख्या में शिक्षकों, प्रशिक्षुओं और ग्रामीण अभिभावकों का समर्थन मिला।

मधुशाला नहीं पाठशाला दो” हैशटैग के साथ उठी यह आवाज, केवल एक ऑनलाइन ट्रेंड नहीं रही, बल्कि यह सरकारी नीतियों के विरुद्ध एक ज़मीन से जुड़ा आंदोलन बन गया। इस अभियान ने न केवल भावनाओं को जगाया, बल्कि सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया।

सोशल मीडिया बना ग्रामीण शिक्षा का मंच

 देशभर में ट्रेंड हुआ School Merger Protest

रविवार को #मधुशाला_नहीं_पाठशाला_दो और School Merger Protest जैसे हैशटैग पूरे दिन ट्विटर पर छाए रहे। इस दौरान हजारों लोगों ने वीडियो, फोटो और अपीलें साझा करते हुए सरकार के स्कूल विलय के फैसले को जनविरोधी करार दिया। पोस्ट में यह बताया गया कि 27,000 से अधिक स्कूल बंद किए जा रहे हैं, जिनकी जगह सरकार शराब की दुकानों (मधुशालाओं) के लाइसेंस बढ़ा रही है।

 भावनात्मक अपीलों ने दी आंदोलन को ताकत

एक वीडियो में एक महिला रसोइया अपने आंसुओं के साथ कहती दिखी—“बच्चे पढ़ेंगे कहां? मुझे रोज़ी कहां से मिलेगी?”
बच्चों ने अपने हाथों में तख्तियां लिए कहा—“स्कूल चाहिए, शराब नहीं!”
इन सैकड़ों वीडियो और पोस्टों ने School Merger Protest को केवल एक डिजिटल घटना नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक जनांदोलन में बदल दिया।

 शिक्षा पर मंडराता खतरा

 स्कूल बंद होने से लड़कियों की शिक्षा प्रभावित

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या कम होने से बालिकाओं को अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है, जिससे कई परिवार लड़कियों को स्कूल भेजने से हिचकेंगे। D.El.Ed प्रशिक्षक रजत सिंह ने कहा, “School Merger Protest केवल स्कूल बचाने का संघर्ष नहीं है, यह बेटियों की शिक्षा बचाने की जंग है।”

 प्रशिक्षुओं का भविष्य अधर में

बीटीसी और बीएड जैसे कोर्स कर चुके लाखों युवाओं को इस समय नौकरी की आशा थी, परंतु जब स्कूल ही घटाए जा रहे हैं तो रिक्तियों की उम्मीद कैसे की जाए? कुछ प्रशिक्षुओं ने ट्वीट किया—“डिग्री को आग लगा दूं क्या? ये कैसा रामराज्य है?”

 नेताओं का बयान: सरकार को करनी चाहिए पुनर्विचार

 शिक्षक नेता सुशील पांडे ने जताई चिंता

सुशील पांडे ने कहा कि सरकार का यह फैसला बच्चों की आधारभूत शिक्षा पर सीधा वार है। उन्होंने बताया कि School Merger Protest किसी राजनीतिक पार्टी का नहीं बल्कि जनता का आंदोलन है, जो शिक्षा को बचाने के लिए लड़ा जा रहा है।

 अटेवा प्रमुख विजय बंधु ने पूछा सवाल

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नारे का क्या होगा जब गांवों में स्कूल ही नहीं रहेंगे?”—विजय बंधु का यह बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि वह जमीनी हकीकत को समझे।

 क्या कहती है सरकार?

राज्य सरकार का कहना है कि जिन विद्यालयों में छात्रसंख्या 20 से कम है, उन्हें नजदीकी स्कूल में विलय किया जाएगा, जिससे संसाधनों का कुशल उपयोग हो सके। हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि विलय के बाद बच्चों की सुविधा, शिक्षक संख्या, तथा महिला रसोइयों और सफाईकर्मियों के रोजगार का क्या होगा।

 विशेषज्ञों की राय

 शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. कंचन मिश्रा का बयान

“गांवों में स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं होते, वे सामाजिक एकजुटता और बालिकाओं की सुरक्षा के प्रतीक भी हैं। School Merger Protest सही समय पर उठी आवाज है, क्योंकि इससे पहले कि हम पीछे लौट जाएं, हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है।”

 आंदोलन से कुछ झलकियां

  • हाथों में तख्तियां लिए बच्चों की तस्वीरें
  • स्कूल के बाहर बैठी रसोइया का आंसुओं भरा वीडियो
  • शिक्षामित्रों द्वारा ‘रामराज्य में शराबराज’ पोस्टर लेकर किया गया प्रदर्शन
  • प्रशिक्षुओं द्वारा डिग्री जलाने की चेतावनी देते हुए ट्वीट्स

यह आंदोलन सिर्फ एक विरोध नहीं, चेतावनी है

School Merger Protest सिर्फ शिक्षकों या प्रशिक्षुओं का नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की शिक्षा व्यवस्था को बचाने का संघर्ष है। सरकार को यह समझना होगा कि स्कूलों का विलय एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव है। अगर बच्चों को स्कूल नहीं मिलेंगे तो न केवल वर्तमान बल्कि देश का भविष्य भी प्रभावित होगा।

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