क्या सिर्फ मुसलमानों के लिए काम करती है AIMIM? सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल, राजनीतिक दल की मान्यता पर मंडराया खतरा!

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हाइलाइट्स:

  • सुप्रीम कोर्ट में एआईएमआईएम की वैधता पर सवाल उठाती याचिका, Political Party के रूप में मान्यता रद्द करने की मांग।
  • सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार किया, लेकिन रिट पिटीशन दाखिल करने की दी अनुमति।
  • याचिकाकर्ता ने कहा—केवल मुस्लिमों के हित में काम करने वाली Political Party, संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विरुद्ध।
  • जजों ने कहा—अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना संविधान प्रदत्त अधिकार, इसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत या धार्मिक राजनीति पर चिंता जताई, व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल।

याचिका की पृष्ठभूमि: क्यों उठी AIMIM की मान्यता रद्द करने की मांग?

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM), जो स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष Political Party कहती है, एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। इस बार मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जहां याचिकाकर्ता तिरुपति नरसिम्हा मुरारी ने पार्टी के Political Party रजिस्ट्रेशन को रद्द करने की मांग की है। उनका आरोप है कि AIMIM केवल मुस्लिम समुदाय के हित में कार्य करती है और यही इसका घोषित उद्देश्य है, जो भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध है।

याचिका में कहा गया कि अगर कोई Political Party केवल एक धर्म विशेष के लोगों के लिए काम करने की बात करे, तो यह न केवल नैतिक रूप से आपत्तिजनक है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट का जवाब: ‘नाम लिए बिना व्यापक मुद्दे उठाएं’

सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वे इस याचिका पर तत्काल सुनवाई नहीं करेंगे। लेकिन कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वे एक विस्तृत रिट याचिका दाखिल करें जिसमें किसी विशेष Political Party का नाम न हो, बल्कि व्यापक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर कोई Political Party अपने मेनिफेस्टो में कहती है कि वह सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए काम करेगी, तो उसे असंवैधानिक कैसे ठहराया जा सकता है?” उन्होंने कहा कि भारत का संविधान स्वयं अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार प्रदान करता है और उन्हें संरक्षित करता है।

याचिकाकर्ता की दलील: केवल मुस्लिमों के लिए काम, क्या यह उचित है?

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने जोर दिया कि AIMIM का Political Party मेनिफेस्टो धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में Abhiram Singh v. C.D. Commachen (2017) केस का हवाला देते हुए कहा कि चुनावों में धर्म के आधार पर वोट मांगना एक भ्रष्ट प्रथा है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई हिंदू नाम वाली Political Party वेद पढ़ाने की बात कहे, तो उसका रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा, लेकिन मुस्लिम शिक्षा की बात करने वाली Political Party को मान्यता दी जा रही है—यह दोहरा मापदंड है।

क्या वास्तव में AIMIM केवल मुस्लिमों के लिए काम करती है?

AIMIM के मेनिफेस्टो का विश्लेषण किया जाए तो यह केवल मुस्लिमों तक सीमित नहीं है। इसमें पिछड़े वर्गों, दलितों, महिलाओं और युवाओं के लिए काम करने की बात भी कही गई है। हालांकि, इसके अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी द्वारा कई बार दिए गए भाषणों और जनसभाओं में मुस्लिम समुदाय की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी केवल मुस्लिमों के लिए ही कार्य कर रही है। कई चुनाव क्षेत्रों में AIMIM ने गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट भी दिए हैं।

चुनाव आयोग की भूमिका: क्या नियम बदलने की जरूरत है?

रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट की धारा 29ए के तहत किसी Political Party को रजिस्ट्रेशन देते समय यह देखा जाता है कि उसका संविधान भारतीय संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि कोई पार्टी स्पष्ट रूप से कहती है कि वह केवल एक धार्मिक समुदाय के हितों के लिए काम करेगी, तो यह जांच का विषय बन सकता है।

हालांकि, चुनाव आयोग अब तक AIMIM को एक वैध Political Party मानता रहा है। अब जब यह मुद्दा उच्चतम न्यायालय में उठा है, तो इस पर पुनः विचार की मांग भी जोर पकड़ सकती है।

विशेषज्ञों की राय: क्या यह मामला धर्म बनाम राजनीति का है?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कई Political Party ऐसी हैं जो किसी जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष की भावनाओं को आधार बनाकर अपनी राजनीति करती हैं। यह पहली बार नहीं है जब किसी पार्टी पर धार्मिक एजेंडा चलाने का आरोप लगा हो।

दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान प्रोफेसर डॉ. आर. चौधरी का कहना है, “भारत में धर्म और राजनीति का अलगाव होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन दुर्भाग्य से लगभग हर Political Party कभी न कभी इस सीमारेखा को लांघ चुकी है।”

याचिका नए विमर्श की शुरुआत या राजनीतिक एजेंडा?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका ने भारतीय राजनीति में एक पुराने लेकिन महत्वपूर्ण सवाल को फिर से उठा दिया है—क्या कोई Political Party धर्म आधारित हो सकती है?

जहां एक ओर यह याचिका धार्मिक राजनीतिक दलों के पुनर्मूल्यांकन की मांग करती है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करती है कि बिना किसी दल का नाम लिए एक व्यापक रिट याचिका ज़्यादा प्रभावशाली हो सकती है।

अब देखना होगा कि आने वाले समय में यह बहस क्या रूप लेती है—क्या यह धर्म आधारित राजनीति के खिलाफ एक ठोस कदम बनेगी या फिर एक और राजनीतिक हथकंडा साबित होगी?

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